आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Saturday, December 20, 2008

सत्य मार्ग साधना पद्यति अत्यंत ही सहज है।

श्री रुद्रगिरी जी महाराज द्वारा परिमार्जित की गयी सत्य मार्ग साधना पद्यति अत्यंत ही सहज है। यह कोई नयी पद्यति भी नहीं है। इस पद्यति के अंदर न तो कोई आडम्बर है और न किसी क्रिया का त्याग है। सहज रूप में इसके माध्यम से व्यक्ति अपने मानव जीवन के ध्येय को प्राप्त कर सकता है। गुरुदेव कहते हैं "सुनत, कहत रहत गति पावै'' अर्थात्‌ सुनने, कहने तथा रहने से सद्गति मिलती है। पिछले दो अंकों में गौतमगिरी जी एवं कविता जी ने इस पर काफी प्रकाश डाला है। शारांशतः यह इस प्रकार है- प्रथम चरण में कोई भी दीक्षित शिष्य महाराज जी द्वारा कही गई कथाओं को ध्यान से सुनता है। जब उसकी समझ में वह कथाऐं आ जाती हैं तो अपने साथियों को सुनता है। यह सुनाना वह आपसी सत्यंग के माध्यम से कर सकता है। सत्संग के लिये संख्या महत्वपूर्ण नहीं होती। छोटे और बड़े दोनों प्रकार के सत्संग लाभप्रद हैं। छोटे सत्संग में हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मौका मिलता है। बड़े सत्संग में बात ज्यादा लोगों तक पहुँचती है। जितने ज्यादा लोगों तक गुरु ज्ञान पहुँचे उतना ही अच्छा होता है। जब श्रावक गण इस अवस्था को प्राप्त हो जाते हैं तो उन्हें सत्य के आत्यसाती करण के लिए गुरुदेव के पावन सानिध्य की आवश्यकता होती है। उस अवस्था में केवल गुरु ही हमें पार कर सकते हैं।

4 comments:

Vivek Gupta said...

सुंदर विचार

ashish said...

very nice

Truth Eternal said...

sahaj hai yah path

SANJAY SINGH said...

vivekji, ashishji evam kavitaji ko sadhuvaad.