आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Wednesday, December 26, 2012

बड़े दिन की हार्दिक शुभकामनाएं।


२५ दिसम्बर बड़ा दिन, प्रकाश से जगमग होते गिरिजे तथा गिरिजों में तिमिर के शमन को तथा प्रकाश के आलोक को बिखेरने के लिए स्वयं को तिरोहित करती हुईं जलती मोमबत्तियां। बहुत कुछ कह जाता है है प्रभु यीशु का यह जन्मोत्सव, जिसे दुनियां की बहुत बड़ी आबादी बड़े दिन के रूप में मनाती है। इस बड़े दिन की सभी सुधी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
साथियो, तुलसीदास जी मानस में लिखते हैं- बड़े भाग मानुष तन पावा.। यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिलता है। इस जन्म को पाकर मनुष्य पूर्णता भी प्राप्त कर सकता है और सब कुछ खो भी सकता है। अन्य योनियों में यह सम्भव नहीं है। सूर्य के प्रकाशित रहने की अवधि के काल के अनुसार देखें तो इस दिन से पूर्व सबसे छोटा दिन होता है। अर्थात अंधकार की मात्रा के बढ़ने का जहां चरम आता है, प्रकाश की अवधि जब निम्नतम अवधि पर होती है। तब परमेश्वर अंधकार को तिरोहित करने के लिए अपने पुत्र को धरा पर भेजता है, इस संदेश के साथ अब बहुत हो चुका, जाओ और चहुंओर प्रकाश का आलोक फैला दो। वह आता है प्रकाश फैलाने और अंधकार से स्वयं को ओतप्रोत कर चुके हम अधम पापी जीव उसी को सलीब पर टांग देते हैं। किन्तु वह दयालु फिर भी हम अधमों के कल्याण की कामना करता है और पुनः जी उठता है।
उसको मानने वाले और न मानने वाले दानों ही उसकी पूजा तो शुरु कर देते हैं लेकिन उसके वचनों का पालन करने में बड़े कृपण बने रहते हैं, मोमबत्ती तो जलाते हैं, उसके प्रकाश को देखकर बड़े हर्ष का अनुभव भी करते हैं लेकिन मोमबत्ती के उस मर्म को नहीं समझते कि किस प्रकार हमें प्रकाशित करने के लिए उसने स्वयं को समाप्त कर लिया है। हमें वही मोमबत्ती बनना होगा। स्वयं को जलाकर किसी को राह दिखाने पर ही हम मैरी क्रिसमस कहने वाले सच्चे जीवात्मा हो पाऐंगे।
इसी मास की आखिरी तारीख को वर्ष २०१२ का अंत हा जाएगा। इस अंतिम बेला में हमें स्वयं को आइना दिखाना होगा। हम अधम हैं, पापी हैं, नीचे की ओर गिरना हमारा गुण है। जितने गिरने थे गिर लिए आओ प्रभु यीशु के जन्म का समय है बड़ा दिन है अब गिरना बंद और उठना प्रारम्भ करें तो देर नहीं है।
शेष नियमित फीचर्स एवं महाराजजी द्वारा विरचित श्रीमद् भागवत को समाहित किए यह अंक प्रतिदिन आपके जीवन में बड़ा दिन लेकर आए इसी कामना के साथ..............संजय भइया

Thursday, March 18, 2010

स्वयं का जीवन परमेश्वर को पूर्ण समर्पित कर दें

हमारा परमेश्वर के प्रति समर्पण किसी भय के कारण नहीं है वरन्‌ अपनी सम्पूर्ण इच्छा से है जिसमें कोई दबाव नहीं वरन्‌ अपनी अपनी स्वेच्छा है जिसमें परमेश्वर का दण्ड या न्याय, क्रोध नहीं वरन्‌ करूणा तथा दयामय प्रेम सम्मिलित हैं जो हमारे अपने चालचलन, व्यवहार या कर्मों से नहीं वरन्‌ परमेश्वर के अनुग्रह से है। अब प्रश्न उठता है कि हमारा समर्पण परमेश्वर के प्रति किस रूप में हो तथा इसमें क्या-क्या सम्मिलित होना चाहिये।१। यह स्वेच्छापूर्वक हो बिना किसी बाध्यता या दबाव के।२। यह व्यक्तिगत होः जो कुछ हमारे पास है, जिसे हम अपना कहते हैं उसमें धन-सम्पत्ति, बैर-भाव, क्रोध, पे्रम, अभिलाषाऐं इत्यादि भी शामिल हैं। अतः इन सबका अधिकार केवल परमेश्वर के हाथ में हो। इनका यह मतलब नहीं हम उसके हाथों में कठपुतली है। याद रखें कठपुतली प्राणविहीन होती है उसमें इच्छाभाव नहीं पाया जाता। हम विपरीत है क्योंकि हममें इच्छाभाव तथा प्राण ;जीवनद्ध दोनों पाया जाता है, परंतु यहाँ हम परमेश्वर को अपने प्राण तथा इच्छा का स्वामी बना लें समर्पण द्वारा।३. यह बलिदान हैः बालक जब अपनी अनिच्छा से पिता से दूर हो जाता है तो पार्थिव पिता दुखित होता है, क्योंकि यदि बालक अपने पिता से सुरक्षा, भोजन एवं वस्त्रों की अपेक्षा रखता है तो पिता भी अपने बालक से घनिष्ठ प्रेम और संगति की अपेक्षा रखता है। वर्तमान समय में समर्पण का अर्थ केवल लेन-देन या उपरी वस्तुओं से है। समर्पण है परंतु वह पूर्णतः नहीं है। कभी जीवन का एक क्षेत्र या इससे अधिक परंतु परमेश्वर चाहते हैं कि हम अपना सब कुछ परमेश्वर को समर्पित करें यद्यपि यह गहन त्याग तथा तपस्या है परंतु इसके बाद महान्‌ आनंद है जो परमेश्वर के साथ घनिष्ठ संगति है जिसमें हमें पूर्ण सुरक्षा तथा करुणा एवं दया के साथ -साथ निर्मल प्रेम प्राप्त होता है जो केवल और केवल परमेश्वर ही दे सकता है क्योंकि उपरोक्त सब कुछ उसके पास भरपूरी से है अतः आइये स्वयं का जीवन परमेश्वर को पूर्ण समर्पित कर दें।

प्रस्तुति : संतोष पाण्डेय धर्म पुरोहित चर्च आफ असेन्सन्स अलीगढ़

Monday, March 15, 2010

समर्पण का अर्थ है-अर्पित करना

संतोष पाण्डेय धर्म पुरोहित चर्च आफ असेन्सन्स अलीगढ़

यह शब्द पुरातन नियम का है, जिसका अर्थ है-अर्पित करना या पृथक करना। अपने आपको परमेश्वर की सेवा हेतु अलग कर देना है। नये नियम दो बार यह शब्द प्रयुक्त किया गया है। प्रथमः नियुक्ति से संबंधित है। दूसराः बलिदान से संबंधित है। पौलुस प्रेरित कहते हैं कि "मैं अर्घ की नाई उण्डेला जाता हूँ।'' प्रथमतः जब मनुष्य सूर्य को जल अर्पित करता है और वह जलपात्र से जल उण्डेलता है इसमें केवल जल उण्डेलने का भाव देह, आत्मा और प्राण को सौंपना है। समर्पण से तात्पर्य मानव का स्वयं को पूर्णतः किसी के हाथों में सौंपना है, यदि परमेश्वर को तो इसमें परमेश्वर की इच्छा तथा कार्य सर्वोपरि है इसके अलावा कुछ भी नहीं हैं। संभवतः इस समर्पण में हमारी अपनी इच्छाओं, अभिलाषाओं का दमन शामिल है जो असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है। एक उदाहरण द्वारा इसे समझ सकते है। ÷÷मादा बांदरी अपने अबोध शिशु को अपने पेट से चिपकाकर वृक्षों में ऊँची छलांग लगाती है।'' यहाँ पर शिशु का अपनी माता के प्रति पूर्ण सौंपना या समर्पण है। यद्यपि माता के हाथ और पैर स्वतंत्र हैं, परन्तु माता को यह अहसास है कि उसका शिशु उससे चिपका हुआ है। यहां पर विश्वास एवं भरोसे की मजबूत दीवार है जहां पर सुरक्षा शामिल है। समर्पण हमारे जीवन में अपने प्रभुत्व या स्वामित्व का त्याग करके परमेश्वर प्रभु यीशु को प्रभु या राजा के रूप में सिंहसनारूढ़ करना है, जो स्वयं का प्रभु यीशु के प्रति आत्म समर्पण है। बाइबिल धर्मग्रंथ में रोमियो की पत्री के द्वादश सोपान में प्रथम पद में इसका सम्पूर्ण वर्णन है कि हम मानव आखिर अपने आपको परमेश्वर की इच्छा पर क्यों छोड़ दे क्या हमारी अपनी इच्छा काफी नहीं है?

क्रमशः

Saturday, September 26, 2009

परमेश्वर से मिलने का निश्चित स्थानः

२. परमेश्वर से मिलने का निश्चित स्थानः- मानव को एक ऐसे स्थान की आवश्यकता है जहाँ वह एकांत अनुभव करें और किसी की दखलंदाजी न हो। अपनी बात (प्रार्थना) कर सकें तथा परमेश्वर की बात सुन सकें। बाइबल में एकांत विषयक कई उदाहरण हैं, जहाँ परमेश्वर से मिलाप हेतु मनुष्य बार जाता है। पु. नि. में दानिरमेल नबी ने अपने घर की उपरौठी कोठरी में एक स्थान बनाया था जहाँ वह येरुशलेम की ओर मुख करके दिन में तीन बार प्रातः, दोपहर एवं संध्या को ध्यान-मनन करते थे। स्वयं प्रभु यीशु मसीह एकांत, स्थान में पहाड़ी पर कोलाहल से दूर जाकर ध्यान-मनन (प्रार्थना) किया करते थे।३। इब्राहिम प्रतिदिन ऐसा करते थेः- ध्यान-मनन का अभिन्न अंग है उसकी निरंतरता। परमेश्वर से निरंतर वार्तालाप एवं परमेश्वर की बातों को सुनना, जिसमें " मौन'' का एक महत्वपूर्ण स्थान है। निरंतर सुनना अत्यंत आवश्यक है, और यह शांत रहकर ही जहाँ परमेश्वर की इच्छा। संम्भव है जानने का अवसर प्राप्त होता है।४. वह परमेश्वर के सम्मुख खड़ा रहता और प्रभु के बोलने की प्रतीक्षा करताः- ध्यान-मनन में खड़े रहना, घुटने टेकना या एक विशेष स्थिति में आसन करना अत्यंत आवश्यक है। भौतिक रूप से सुस्ती दूर होती है, साथ आत्मिक बल भी प्राप्त होता है। दूसरा पहलू यह है कि इसमें धीरज एवं संयम का होना दर्शाता है जो ध्यान-मनन का अभिन्न एवं आवश्यक अंग है।मसीही ध्यान-मनन हेतु आवश्यक औज+ारः- भौतिक एवं नश्वर संसार में प्रत्येक कार्य हेतु संबंधित औज+ारों का होना अत्यंत आवश्यक है उसी प्रकार परमेश्वर से संबंध हेतु आत्मिक औज+ारों का होना भी आवश्यक है। पवित्र धर्म ग्रंथ में नये नियम कि इफिसियों की पत्री के सोपान छः में यह पाये जाते हैं: सत्य, धार्मिकता, मेलमिलाप, विश्वास, उ(ार ;मुक्तिद्ध एवं परमेश्वर का वचन ;बाइबलद्ध। ध्यान-मनन के समय पवित्र बाइबिल के साथ साथ पेन, नोटबुक, एक गद्दी, फर्श या चटाई का होना अत्यंत आवश्यक है। मसीही ध्यान-मनन मशीनी न हो जाये अतः भौतिक रूप से खान-पान, सोना इत्यादि तथा आत्मिक रूप से पवित्र जीवन, स्वस्थ्य आचार-व्यवहार एवं कठोर अनुशासन का होना अत्यंत आवश्यक है, तभी वास्तविक मसीही ध्यान-मनन हो सकता है।

Thursday, September 10, 2009

ध्यान और मनन एक दूसरे के पूरक

ध्यान और मनन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, एक दूसरे के पूरक हैं। वर्तमान २१ वीं सदी में जब एकल परिवार तथा आजीविका कमाने की होड़ में मनुष्य एक स्थान से दूसरे स्थान को दौड़ता रहता है, ऐसे में ईश्वर के प्रति अपनी sहृद्धा दर्शाने हेतु ध्यान-मनन की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका है। जब हम वर्तमान संसार की ओर अपनी दृष्टि करते हैं तो पाते हैं मनुष्य कमजोर, असहाय, बीमारियों, तथा अव्यवस्था एवं मानसिक तनाव तथा अवसाद का शिकार है। यद्यपि उसका समाधान जो पूर्णतः अस्थाई है भिन्न-भिन्न क्रियाओं में जैसे योग इत्यादि में देखने में आता है। मानव स्वस्थ्य एवं चैतन्य तो दिखता है, फिर भी परमेश्वर के साथ गहन संबंध नहीं बन पाता और एक समय आता है जब वह निराशा, हताशा एवं कुंठा का शिकार हो जाता है। प्रश्न उठता है कि मानव को कौन सा ध्यान-मनन करना चाहिये जिससे न केवल उसकी काया ;शरीरद्ध निरोगी हो वरन्‌ उसकी आत्मा का गहन संबंध भी परमेश्वर के साथ हो। पवित्र धर्म ग्रंथ बाइबल में ध्यान-मनन हेतु कुछ ऐसे घरेलू पाये जाते हैं, जो शरीर और आत्मा दोनों का मेल परमेश्वर के साथ करवाने का प्रयत्न करते हैं। पवित्र बाइबल की प्रथम पुस्तक उत्पत्ति प्रंथ में पितामह इब्राहिम प्रातः उठकर उस स्थान को गये जहाँ वह परमेश्वर के सम्मुख खड़े रहते थे। [उत्पत्ति १९ह२७ ] उपरोक्त घटना में चार महत्वपूर्ण बातें पाते हैं-

१. इब्राहिम प्रातः काल जल्दी उठेः- प्रातः काल जल्दी उठना एक कठोर अनुशासन है। महानगरों में कॉल सेंटर में कार्य करना, शिफ्ट में नौकरी करना इत्यादि के कारण प्रातः काल उठना बहुत कठिन है, परंतु यही वह उत्तम समय है जहाँ हम शांत एवं बेदखल रह सकते हैं। ध्यान-मनन में प्रतः उठना अत्यंत आवश्यक हैं। क्रमशः

Friday, May 15, 2009

मानव का सर्वोच्च रखवाला, चिंता करने वाला स्वयं परमेश्वर है।

जैसा कि हम पहले कह चुके हैं कि इस पृथ्वी पर हिंसा एवं आतंकवाद का कारण मनुष्य का पाप है। इस सन्दर्भ में बाइबिल धर्मग्रंथ के उत्पत्ति ;प्रथम पुस्तकद्ध के चौथे सोपान में कैन एवं हाबिल नामक दो भाइयों की कहानी है जिसमें क्रोध, स्वार्थ, ईर्ष्या स्वरूप कैन अपने छोटे भाई की हत्या कर देता है और परमेश्वर जब उससे कहते हैं कि - तेरा भाई कहां है? तो वह कहता है कि "क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूं।'' इस घटना में मनुष्य का मनुष्य के प्रति व्यवहार, सम्बन्ध एवं ईश्वर का मनुष्य के साथ व्यवहार की सुन्दर झलक मिलती है। वास्तव में मानव की यही मनोवृत्ति कि "क्या मैं अपने भाई का रखवाला हूं'' आज संसार में हिंसा एवं आतंकवाद का कारण है। स्वार्थ, ईर्ष्या को जन्म देता है और ईर्ष्या मनुष्य को यह सीख देती है कि वह अपने भाई, पड़ौसी, सहधर्मी का रखवाला नहीं है। महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हम इस संसार में एक दूसरे के रखवाले हैं। परमेश्वर ने हमें यह दायित्व सोंपा है और यही परमेश्वर की श्रेष्ठ आज्ञा है। मानव का सर्वोच्च रखवाला, चिंता करने वाला स्वयं परमेश्वर है। इसका प्रमाण हिंसा और आतंकवादी गतिविधियों के मध्य स्वयं प्रभु यीशु में देहधारी होकर कलवरी क्रूस से उन्होंने दिया, जो सम्पूर्ण मानव को पाप से छुटकारा है। प्रिय मित्रो, पवित्र ग्रंथ बाइबिल में हिंसा एवं आतंकवाद का कोई स्थान नहीं है। इसके स्थान पर क्षमा, ईश्वरीय प्रेम तथा आपसी सम्बन्धों की मधुरता/मिठास को सराहा गया है, जो हिंसा एवं आतंकवाद के लिए उचित एवं न्यायोचित जवाब है। प्रार्थना एवं आशीर्वाद के साथ.......................

Tuesday, May 12, 2009

आतंकवाद, हिंसा और युद्ध किसी भी रूप में हो नुकसान हमेशा मानव जीवन का ही हुआ है।

सम्पूर्ण विश्व आतंकवाद एवं हिंसा तथा युद्ध की विभीषिका से रूबरू है। इस महाराक्षस ने मानव अस्तित्व के लिए खतरा पैदा कर दिया है। हिंसक हथियार इतने प्रभावकारी बन चुके हैं कि उनका उपयोग इस पृथ्वी की सतह से जीवन को हमेशा के लिए समाप्त कर सकता है। हिंसा और आतंकवाद का अपना इतिहास रहा है और विश्व के प्रमुख धर्मों में इनको किसी न किसी रूप में स्थान दिया गया है तथा उचित एवं अनुचित युद्ध की संज्ञा दी गई है। आतंकवाद, हिंसा और युद्ध किसी भी रूप में हो नुकसान हमेशा मानव जीवन का ही हुआ है। इनके कारण परमेश्वर की सर्वोत्तम रचना को अपूर्णनीय क्षति पहुंची है। मसाही कलीसिया का इतिहास भी युद्ध एवं आतंकवाद से अछूता नहीं रहा जिसका प्रमाण रहे हैं जो दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा ग्यारहवीं शताब्दी के प्रथम दशक में हुए और सम्पूर्ण यूरोप इसमें झुलस गया। निर्दोषों के खून से सम्पूर्ण यूरोप लाल हो गया। यहां पर एक प्रश्न मानवीय दृष्टिकोण से उठता है कि, क्या मसीही कलीसिया का निर्माण निर्दोषों के रक्त पर हुआ है? मसीही दृष्टिकोण से हिंसा, आतंकवाद का कारण मनुष्य का पाप है। अर्थात ईश्वर की आज्ञाओं के विरुद्ध मानव का विद्रोह तथा परमेश्वर की इच्छा की अवहेलना कर जब मनुष्य अपनी इच्छा का दास बन जाता है तो वह स्वार्थ एवं अहं के मार्ग पर चलने लगता है। जो भी उसके इस मार्ग में बाधा डालता है उसको मार्ग से हटाने हेतु मनुष्य हिंसा और आतंकवाद का सहारा लेता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि जब प्रभु यीशु ने लोगों को यह शिक्षा दी कि वे पाप का मार्ग त्याग कर ईश्वर की क्षमा को स्वीकार करें और ईश्वर के राज्य में प्रवेश करें तो मानव पाप ने, जो उसके स्वार्थ का परिणाम था, इसे स्वीकार न किया और प्रभु यीशु मसीह को क्रूस पर लटका दिया।यह विश्व के इतिहास की सबसे क्रूरतम एवं प्रायोजित आतंकवाद की घटना है। मसीह का क्रूूस पर लटकाया जाना हिंसा और आतंकवाद का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह अन्यत्र कहीं नहीं पाया जाता। इसके विपरीत प्रभु यीशु का क्रूस पर से यह संबोधन कि "हे पिता इन्हें माफ कर क्योंकि यह नहीं जानते कि क्या करते हैं।'' ईश्वरीय दया, क्षमा एवं प्रेम का सवोत्कृष्ट उदाहरण है। शेष कल ......

Monday, April 6, 2009

बाइबिल में तीर्थ का महत्व

पवित्र शास्त्र बाइबल में इसरायली जब मिस्त्र देश में बंधुर गुलाम) थे तथा राजा फिरौन के अत्याचार से पीड़ित थे, परमेश्वर ने अपने दास मूसा को नियुक्त किया कि वह उन्हें इस परतंत्रता से छुटकारा प्रदान कराएं क्योंकि यहाँ वह भौतिक एवं आत्मिक रूप से परतंत्र थे। अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना नहीं कर सकते थे, धार्मिक बलिदान नहीं चढ़ा सकते थे। मूसा के नेतृत्व में समस्त इसरायलियों को मिस्त्र की परतंत्रता से छुटकारा प्रदान किया गया और परमेश्वर ने उन्हें प्रतिज्ञा दी कि "मैं तुम्हें उस देश में स्थापित करूंगा, जहाँ दूध और मधु की नदियाँ बहती हैं।'' लगभग १२०० ई. पू. में इसरायलियों का मिस्त्र से छुटकारा हुआ जिसे ÷निर्गमन की घटना' कहते हैं। प्रतिज्ञा के देश कनान में प्रवेश करने के पूर्व वे लगभग ४० वर्षों तक बियाबान जंगलों, नदियों, पहाड़ों से गुजरते रहे और यहीं पर उन्हें यह संदर्भ मिला की वह परदेशी (तीर्थयात्री) हैं जिन्हें महातीर्थ प्रतिज्ञा के देश में पहुँचना है, जहाँ पर वह अपने परमेश्वर यहोवा की उपासना, बलिदान, धार्मिक उत्सव इत्यादि स्वतंत्र रूप से मना सकते हैं। यहीशू के नेतृत्व में मूसा की मृत्यु पश्चात्‌ समस्त इसरायली प्रतिज्ञात देश ;च्तवउपेम संदकद्ध में पहुँचे। स्थापना पश्चात्‌ कालांतर में एक भव्य मंदिर का निर्माण राजा सुलैमान के द्वारा पवित्र नगरी यरूशलेम में किया गया तथा विशेष प्रार्थना द्वारा भव्य प्रतिष्ठा की गयी जहाँ वाचा का संदूक (मंजूबा) रखा गया। इस मंदिर में प्रत्येक यहूदी भक्त को वर्ष में एक बार 'फसह के पर्व'' के समय आना पडता था तथा बलिदान चढ़ाना, मंदिर का कर एवं अन्य धार्मिक कर्मकांड करना पड़ता था। योसेवस नामक यहूदी इतिहासकार बताते हैं कि इस समय यरूशलेम में तीर्थयात्रियों की संख्या लाखों में होती थी तथा शहर तीर्थयात्रियों से भर जाता था, क्योंकि इसराइल तथा आसपास से लोग मीलों पैदल चलकर इस महातीर्थ में आते थे।

Wednesday, February 25, 2009

परमेश्वर मनुष्य को अपना प्रतिनिधि ठहराता है

इसरायली दृष्टिकोण में परमेश्वर मनुष्य को अपना प्रतिनिधि ठहराता है ताकि वह उन अधिकारों तथा सामर्थ का उपयोग कर सकें। भजन ८ के पद ५ और ६ परमेश्वर द्वारा मनुष्य को सृष्टि में विशेष स्थान दिया गया है। "सब कुछ उसके पावों तले कर दिया।'' इस पद में भजनकार का तात्पर्य है कि अधिकार प्रतिनिधित्व करने हेतु दिया गया है प्रभुता या शासन करने हेतु नहीं। इसके विपरीत कई विद्वान यह आक्षेप लगाते हैं कि बाइबलीय सृष्टि का सि(ान्त पृथ्वी तथा उसके स्त्रोतों के दोहन का कारण है। १९६६ में "लियान व्हाइट'' ने भी अपने शीर्षक "दी हिस्टोरिकल रूट्स आफ इकालॉजिकल क्राइसिस'' में कुछ इसी प्रकार का प्रश्न उठाया हैं। "भजन ८ में हम परमेश्वर विषयक याहवेवादी विचार तथा पर्यावरणीय क्रम पाते हैं न कि पुरोहितीय वादी प्रभाव। पुरोहितीय परंपरा में परमेश्वर पशु राज्य पर भी प्रभुता ;शासनद्ध करता है....... भजन निश्चित रूप से यह विचार प्रगट करता है कि समूचा पर्यावरणीय क्रम परमेश्वर द्वारा संचालित किया जाता है।'' अतः मनुष्य का नैतिक उत्तरदायित्व है पर्यावरण के प्रति, जबकि यह उसका अंतरंग भाग है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य को यह सामर्थ प्रदान की गयी है कि वह प्रकृति को नियंत्रित करे, एक प्रतिनिधि के रूप में। यह मनुष्य के ऊपर है कि वह किस प्रकार प्रकृति को नियंत्रित करता है तथा उसकी चिंता करता है। यह कायनात और इसके जीव सभी वे यंत्र हैं जो परमेश्वर की सत्ता की पहचान कराते हैं।

Sunday, February 22, 2009

आत्मा'' तथा "श्वास'' हेतु एक ही मूल इब्रानी शब्द प्रयोग में लाया जाता है।

इसरायली परमेश्वर को एक संपोषक के रूप में देखते हैं जिसने अपनी सामर्थ से सम्पूर्ण सृष्टि को रचा तथा वह उसकी चिंता करता है। भजन ८ः४-५ तथा १०४ः१०-३० में भजनकार अपने प्रशंसा गीत में परमेश्वर को संपोषक मानता है। संसार को बनाकर केवल उसे ऐसे ही नहीं छोड़ा है परन्तु वह उसे निरंतर संभाले हुए है। ÷÷तू पशु के लिए घास और मनुष्य के लिए वनस्पति उपजाता है, जिससे मनुष्य धरती से भोजन वस्तु उत्पन्न करें।'' उत्पत्ति के प्रथम अध्याय में तीसरे दिन परमेश्वर ने वनस्पतियों तथा वृक्षों को उपजने की आज्ञा दी। इसी सत्य को भजन के उपरोक्त पद में बताया गया है। यहाँ पर जंगली पशुओं तथा मनुष्य दोनों के लिये परमेश्वर ने वनस्पतियों तथा पेड़ पौधों को उपजाया है। ÷÷उपजाना'' हेतु मूल इब्रानी शब्द का अर्थ है ÷÷खेती करना''। तात्पर्य यह है कि मनुष्य का कार्य है खेती करना, नाश करना नहीं तथा परमेश्वर मनुष्य एवं पशुओं का समान रूप से संपोषक है। भजन १०४ः३० में भजनकार एक गम्भीर सत्य को प्रगट करता है जिसमें परमेश्वर सभी जीवों की रखवाली करते हैं। "आत्मा'' तथा "श्वास'' हेतु एक ही मूल इब्रानी शब्द प्रयोग में लाया जाता है। उक्त पद में अर्थात्‌ परमेश्वर का आत्मा के द्वारा पशु तथा वनस्पतियाँ बनाये जाते हैं। यह विचार भी बताया है कि परमेश्वर संपोषक है तथा वह इस प्रक्रिया को निरंतर करता है। "सब कुछ परमेश्वर के आत्मा द्वारा सृजा गया है जो निरंतर पृथ्वी के प्राकृतिक जीवन को साल दर साल नया करता है'' तात्पर्य यह कि परमेश्वर का हस्तक्षेप नियनित रूप से प्रकृति में है अतः हमें प्रकृति का आदर करना चाहिए तथा परमेश्वर की तरह प्रकृति का सम्मान कर उसकी देखभाल करना चाहिए।

Saturday, January 17, 2009

मंत्र की सच्चाई आखिर है क्या जिससे सत्य जीवन व्यतीत किया जाये।

कालांतर में इसरायिलयों ने इस मंत्र को न केवल उच्चारण तथा जाप किया अपितु अपने माथे पर एक डिबिया में रखकर बांधना, तथा बाजुओं पर ताबीज+ चौड़ी करके बांधना आरंभ किया। परंतु एक विशेष बात "मन में रखना'' पूर्णतः दरकिनार कर दिया फलतः मूलतंत्र जानकर, जपकर, उच्चारण करके भी गलतियाँ, बुराईयाँ तथा पाप-दर-पाप करते गये तथा यह सब आडम्बर हो गया और सत्य जीवन के मार्ग से भटक गये। तब प्रश्न उठता है कि मंत्र की सच्चाई आखिर है क्या जिससे सत्य जीवन व्यतीत किया जाये। प्रभु यीशु मसीह ने उपरोक्त मंत्रों को नया आयान तथा वास्तविकता प्रदान की। उन्होंने कहाः "तू अपने प्रभु, अपने परमेश्वर को सम्पूर्ण मन, सम्पूर्ण प्राण, सम्पूर्ण बुद्धि एवं सम्पूर्ण शक्ति से प्रेम कर तथा अपने समान अपने पड़ोसी को प्रेम कर। यही जीवन जीने का 'मूल मंत्र' नई आज्ञा है। ईश्वरीय मंत्र हमारे जीवन का सम्पूर्ण आधार है। इनके माध्यम से न केवल ईश्वरीय रहस्यों का पता चलता है वरन्‌ सत्य जीवन जीने की कला भी आती है परंतु यह स्वयं से नहीं हो सकता जब तक परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त न हो। अनुग्रह प्राप्त करने हेतु हमें परमेश्वर पर निर्भर होना पड़ेगा। निर्भरता से तात्यपर्य है अपने आपको सम्पूर्ण रीति से परमेश्वर को सौंप देना। सौंपना अर्थात्‌ मन, प्राण, बुद्धि, शक्ति से परमेश्वर को प्रेम तथा अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम है।

Friday, January 16, 2009

उहापोह में वह ईश्वरीय मंत्रों का उच्चारण एवं जाप करता है।

वर्तमान युग में प्रत्येक मनुष्य अपने चहुँमुखी विकास हेतु कुछ न कुछ चाहता है जिसके माध्यम से वह न केवल इस संसार में बंिल्क परलोक में भी सुख, समृद्धि तथा दुःख रहित जीवन व्यतीत करें, इस उहापोह में वह ईश्वरीय मंत्रों का उच्चारण एवं जाप करता है। यद्यपि वह भरपूर यत्न करता है कि इनके द्वारा सत्य जीवन जीने की कला सीख लें तथा उसका मार्ग सुधर जाये परंतु ऐसा है नहीं क्योंकि इसमें उसका स्वयं का प्रयास ही होता है। पवित्र बाइबल के पुराने विधान में परमेश्वर ने प्रत्येक यहूदी को एक व्यवस्था मूसा के द्वारा सौंपी जिससे वह सत्य जीवन जियें यह जीवन जीने का मूलतंत्र था। जिसे "शीमा'' कहते हैः "हे इस्त्राइल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है, तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन और अपने सारे जीव, और अपनी सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना। और ये आज्ञाऐं मूलमंत्र जो मैं आज तुझको सुनाता हूँ, वे तेरे मन में बनी रहेऋ और तू उन्हें अपने बाल बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते इनकी चर्चा किया करना, और इन्हें अपने हाथ पर चिन्हानी करके बांधना, और यह तेरी आँखों के बीच टीके का काम दे। और इन्हें अपने-अपने घर की चौखट की बाजुओं और फाटक पर लिखना''

Friday, January 9, 2009

अस्तिव को गर्भ में ही समाप्त करना बाइबिल के अनुसार घृणित कृत्य है।

ईसाई मत भी इस बात को सिद्ध करता है। दूसरी सदी के अन्त में टरटूलियन ने कहा था, "वह भी इन्सान ही हैं जो कि इन्सान बनने वाला है, बीज में ही फल का अस्तित्व भी है।'' प्रभु का प्रेम तो उस अजन्मे च्चिच्चु से भी उतना ही है जितना अन्य किसी मानव से। ईसाई मतानुसार प्रभु ने मनुष्य के स्वयं अपने हाथों से अपना रूप देकर बनाया और उसमें अपनी साँस देकर प्राण फूँके। उस मनुष्य को जो कि भगवान का ही रूप है उसके अस्तिव को गर्भ में ही समाप्त करना बाइबिल के अनुसार घृणित कृत्य है।

Saturday, December 13, 2008

तंत्र मंत्र को बाइबल में नकारा गया है

पवित्र बाइबल में इन तमाम बातों का वर्णन है तथा परिणाम भी स्पष्ट रूप से बताया गया है।

१। शकुन विद्या : परिचित आत्माओं की सहायता से भविष्य को पहले से देख लेना। इस प्रकार का कार्य करने वाले व्यक्ति को पत्थरवाह करके मार डालने का प्रावधान था।

२। भूत-सिद्धः यह एक मृतक व्यक्ति से सम्पर्क स्थापित करना है। शाऊल मानक राजा ने शमूएल नबी से उसके मरणोपरांत एक स्त्री की सहायता से सम्पर्क स्थापित किया था - यह कार्य परमेश्वर की दृष्टि में अर्त्यत घृणित पाप है जिसे वैश्यावृत्ति समान बताया गया है।

३. पूर्वानुमान ;च्तवहतवेजपबंजपवदद्धः यह शकुन विचारना तथा पशु-पक्षियों की अंतड़ियों का निरीक्षण करना सम्मिलन हैः जिसका दण्ड बेबीलोन के राजा को परमेश्वर द्वारा दिया गया - यह मिस्त्र देश का महान विज्ञान था। इसमें विज्ञान ;खगोल एवं फलित ज्योतिषद्ध और परिचित आत्माओं का मिश्रण था वर्तमान काल में इसका प्रयोग सम्मोहन विद्या, मस्तिष्क के उपचार और भविष्य बताने में किया जाता है।

५। जादू टोना - इसमें तीन सूत्र हैं रसायन एवं खगोल विज्ञान तथा परिचित आत्माऐं। इनका वर्णन तथा प्रेरितों के कार्य में पाया जाता है।

६. ओझाई :- यह दुष्टात्माओं के साथ सचेत रूप में सहअपराध करना है। पौलुस प्रेरित अपने पत्रों में इसकी घोर भर्त्सना करते हैं। यह आवश्यक रूप से शैतान की आराधना है और इसे विद्रोह गिना गया है। ऐसा करने पर राजा शाउल का सर्वनाश हुआ तथा उसका राज्य छीन लिया गया।

उपरोक्त सारी विधियों तथा तंत्र मंत्र को बाइबल में नकारा गया है तथा घृणित पाप की संज्ञा दी गयी जैसा कि नीचे उल्लिखत हैः ÷÷तुझमें कोई ऐसा न हो जो...... भावी कहने वाला, व शुभ अशुभ मुहुर्तों का मानने वाला व टोना व तांत्रिक व बाजीगर, व ओझो से पूछने वाला, व भूत साधने वाला, व भूतों को जगाने वाला हो। क्योंकि जितने ऐसे ऐसे काम करते हैं वह सब यहोवा के सम्मुख घृणित हैं........'' । पवित्र धर्मशास्त्र बाइबल में उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट दृष्टिगोचर है कि जो भी विधि या क्रिया-कलाप सर्वज्ञानी, सर्वसामर्थी और सबसे प्रेम करने वाले परमेश्वर की महिमा को घटाती है तथा मनुष्यों के जीवन के प्रति उसके उद्वेश्यों को छिन्न-भिन्न करती है, हमें उनसे हमेशा दूर रहना चाहिए। प्रिय पाठकों! परमेश्वर और मनुष्य का शत्रु शैतान हमेशा यह चाहता है कि मनुष्य परमेश्वर की महिमा न करे या परमेश्वर की सामर्थ को कमतर करके आंके तथा स्वयं के प्रयास से परमेश्वर तक पहुँच सके। ऐसा नहीं हो सकता परमेश्वर को प्राप्त करने का एक ही उपाय है और वह स्वयं का १००ः समर्पण समर्पण, शून्य हो जाना तभी परमेश्वर हमें अपनी सारी शक्तियाँ प्रदान करता है जो मानव एवं प्रकृति के कल्याण हेतु है। उनसे किसी प्राणी का अहित नहीं हो सकता।

Friday, December 12, 2008

बाइबिल और तंत्र

रेव संतोष Paandey (धर्म पुरोहित ) चर्च ऑफ़ अस्सेंसिओंस अलीगढ

वर्तमान संसार में प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी क्षेत्र में अपने से अत्यधिक शक्तिशाली या अदृश्य ताकत की खोज में लगे रहते हैं। यह मानव जीवन के प्रत्येक सोपान में पाया जाता है उदाहरण स्वरूपः युवा किशोर या लड़की का राशिफल देखना, ओझा या तांत्रिक द्वारा किसी अदृश्य शक्ति की खोज तंत्र साधना द्वारा करना। वैज्ञानिकों द्वारा आकाशमंडल में छुपे रहस्यों की खोज+ करना। इसके अलावा ऐसे कई उदाहरण हमारे चारों ओर हैं जिनमें नरबलि तथा पशु बलि इत्यादि का सहारा लेकर तंत्र साधना की जाती है। जितनी कठिन एवं बड़ी साधना होगी उतनी ही अदृश्य ताकत प्राप्त होगी। उपरोक्त साधनाओं में हित के साथ-साथ किसी न किसी का अहित ही होता है और वह मानव ही है। कभी-कभी यह तंत्र-मंत्र जादू-टोना का रूप ले लेता है जिसका अर्थ है लैटिन भाषा में ÷÷छुपा हुआ या ढ़का हुआ।''

Wednesday, October 1, 2008

बाहबिल के अनुसार : सत्य स्वतंत्र करता है।

परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और यह शाश्वत्‌ सत्य है। भिन्न-भिन्न धर्मों में सत्य को कई रूपों में परिभाषित किया गया है। प्रत्येक धर्म एवं विश्वास अपने धर्मवलम्बियों एवं विश्वासियों से यही कामना करता है कि वह 'सत्य' पर चलते हुये अपने नैतिक कार्यों/जीवन को व्यतीत करें। वर्तमान संसार में शाश्वत्‌ सत्य को अधर्म, बुराई अमानुविक कार्यों तथा सामाजिक कुरोतियों द्वारा पूर्णतः दबा दिया गया है तथा आसुरी शक्तियों को बढ़ावा मिला है। समझौतावादी संस्कृति ने 'अर्धसत्य' नामक शब्द का प्रादुर्भाव किया है जो निश्चय ही "शाश्वत्‌ सत्य'' को समाप्त करने का प्रयास है परंतु मनुष्य सांसारिक मायाजाल में यह भूल जाता है कि "शाश्वत्‌ सत्य'' का स्त्रोत स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर है और इसे कोई भी सांसारिक शक्ति मिटा/दबा नहीं सकती है। यह ठीक वैसा है जैसे हम सूर्य को अपनी मुठी में बंद नहीं कर सकते।

प्रश्न उठता है कि यह "शाश्वत्‌ सत्य'' क्या है जिसका मनुष्य को सामाजिक, धार्मिक, आत्मिक अर्थात्‌ पूर्ण छुटकारा प्रदान करता है। बाइबिल धर्मशास्त्र में सत्य के लिये मूल इबानी भाषा में मउमजी (येमेथ) शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका मूल अर्थ स्थामित्व है ;निर्गमन १७ः१२ वहीं यूनानी भाषा में नव विधान में एलेथेसिया एवं पिस्तिस किया गया है जिसका अर्थ विश्वास योग्यता है। (रोमियो की पत्री ३: ३,७)।

प्रभु यीशु ने "शाश्वत्‌ सत्य'' को अपने शब्दों में कहा कि "तुम सत्य को जानोगे और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा (यूहन्ना ८ः३२)।'' यह उद्बोधन स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के ज्ञान के इस संसार में प्रगट होने का पूर्ण प्रमाण है। यह एक गहन संबंध है सत्य और जीवन का। प्रभु यीशु ने कहा "मार्ग सत्य और जीवन मैं ही हूँ, बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।'' इन शब्दों में "शाश्वत्‌ सत्य'' जो परमेश्वर का ज्ञान है स्पष्ट रूप से प्रगट है। यूहन्ना रचित सुसमाचार के प्रथम अध्याय में 'सत्य' का विस्तृत वर्णन है। परमेश्वर का सत्य ज्ञान प्रभु यीशु मसीह के देहधारण में देखा जा सकता है। जहाँ यीशु के जन्म से मृत्यु, तत्पश्चात्‌ तीसरे दिन जी उठना (पुनरूत्थान) देखने को मिलता है।

प्रभु यीशु ने स्वयं को सत्य कहा और यह सत्य इस संसार में पार्थिव रूप में मनुष्यों के बीच चला और फिरा तथा सत्य की गवाही दी जिसका स्पष्ट प्रमाण प्रभु यीशु के जीवन और कार्यों में परिलक्षित है। पापों की क्षमता, भूखों को खिलाना, मुर्दों को जलाना, बुराई एवं असत्य की घोर निंदा, प्रेम, सहनशीलता एवं शैतान पर विजय तथा सम्पूर्ण ब्रह्मांड पर नियंत्रण। यद्यपि संसार ने इस "शाश्वत्‌ सत्य'' जिसमें छुटकारा निहित है, को अधर्म एवं असत्य से दबाना चाहा परंतु दबा नहीं सका। सत्य हमेशा जीवित रहता है और जीवित रहेगा। सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य के रूप में इस संसार में विद्यमान है, यदि न होता तो संसार कब का नष्अ हो चुका होता। प्रिय पाठको! संसार और असत्य, सत्य से कभी भी आगे नहीं हो सकता। जब तक सर्वशक्तिमान परमेश्वर है तब तक सत्य हमेशा रहेगा। अतः हमें हमेशा "शाश्वत्‌ सत्य'' जो स्वयं परमेश्वर है, की खोज में रहना चाहिए तथा सत्य के ज्ञान से स्व-निरीक्षण कर संपूर्ण अंधकार को मिटा डालना चाहिए तभी हमारी देह, आत्मा, प्राण का कल्याण होगा और हमारा जीवन परमेश्वर को ग्रहण योग्य होगा। जिससे पृथ्वी भी सुरक्षित रहेगी तथा चारों ओर का वातावरण प्रदूषित होने से बच जायेगा।

प्रस्तुति : रेव्ह. संतोष पाण्डेय (धर्म पुरोहित)

चर्च ऑफ असेंसन, घंटाघर एवं क्राइस्ट चर्च, नकवी पार्क, अलीगढ़

Thursday, August 14, 2008

बाइबल के अनुसार ज्ञान

मानवीय शरीर में पाँच इन्द्रियाँ पायी जाती हैं जिसके द्वारा मनुष्य इस संसार में अपने ज्ञान को अर्जित करता है जिसका प्रयोग वह इस संसार में करता है। ज्ञान से ही समस्त मानव जगत का तथा स्वयं का कल्याण हो सकता है अन्यथा इसका गलत प्रयोग भी हो सकता है। पवित्र शास्त्र बाइबल में ज्ञान का उद्गम स्वयं परमेश्वर हैं। भजन संहिता ९२ः१० "परमेश्वर मनुष्य को ज्ञान सिखाता है। भजन १९ः१-२ में पाते हैं कि परमेश्वर प्रदत्त सृष्टि (सम्पूर्ण ब्रह्मांड) परमेश्वर के ज्ञान को बताती है। परमेश्वर का वचन
बाइबल भी ज्ञान का अभूतपूर्व उद्गम है। ज्ञान भिन्न-भिन्न प्रकारों में सम्पूर्ण जगत्‌ में पाया जाता है, जिसकी दो प्रमुख धाराऐं हैं: भौतिक ज्ञान एवं अलौकिक या आध्यात्मिक ज्ञान। भौतिक ज्ञान मनुष्य स्वयं अर्जित करता है, जिसमें यह आवश्यक नहीं है कि वह श्रेष्ठ एवं सत्य तथा वास्तविक मानव कल्याण हेतु हो क्योंकि इसमें स्वार्थ एवम्‌ घमंड पाया जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान का स्त्रोत स्वयं परमेश्वर है जिसका अर्जन मानव अपनी भौतिक सामर्थ्य एवं स्वकर्मों से नहीं कर सकता अर्थात्‌ यह ज्ञान परमेश्वर के अनुग्रह द्वारा प्राप्त होता है जिसमें ईश्वरीय सत्य पाया जाता है और ईश्वरीय ज्ञान में स्वतंत्र करने एवं छुटकारे की क्षमता पायी जाती है। परमेश्वर का सत्य ज्ञान इस संसार में पँचमहाभूतों
में दृष्टिगोचर होता है, जिन्हें हम मानवीय आँखों तथा पंच इंद्रियों द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। आकाश, जल, वायु, अग्नि तथा पृथ्वी हमारे वातावरण का अभिन्न अंग है जो परमेश्वर के अनुग्रहकारी ज्ञान को विस्तृत आधार पर प्रगट करते हैं। परमेश्वर अदृश्य हैं वहीं समस्त ब्रह्मांड का कर्त्ता है तथा समस्त वस्तुएँ उसमें निहित हैं। परमेश्वर का अनंत उद्धार एवं छुटकारा जो सम्पूर्ण मानव जाति एवं सृष्टि हेतु है, स्वयं प्रभु यीशु मसीह के देहधारण ;प्दबंतदंजपवदद्ध में प्रगट है। संतयूहन्ना का सुसमाचार का प्रथम अध्याय इस बात को प्रमाणित करता है।'' आदि में वचन (शब्द) था........................................... उसमें ज्योति थी..................... उसने हमारे बीच में निवास किया अर्थात्‌ ठहर गया और मानव जाति का उद्धारकर्त्ता बन गया (यूहन्ना१ः१-१४, बाइबल)। ज्ञान का मूल्य सोने से श्रेष्ठ है (नीति वचन ८ः१०) यह हमारी शक्ति को बढ़ाता है। महर्षि यशायाह कहते हैं कि "ज्ञान मनुष्य को नाश होने से बचाता है तथा स्थिरता प्रदान करता है।'' सत्य ज्ञान जो स्वतंत्र करता है, वह परमेश्वर की ओर से है परंतु जब उसमें मिलावट कर दी जाती है तब वह पतन का कारण बन जाता है। मनुष्य का पापी स्वभाव ज्ञान को मिटा तथा दबा देता है। मनुष्य का अधर्म सत्य को ढाँकने की कोशिश करता है और सृष्टि को देखकर भी परमेश्वर के अनंत छुटकारे को समझ नहीं पाता। उदाहरणस्वरूप सृष्टि की घटना में प्रथम मानव (आदम-हव्वा) ने अपने ज्ञान का गलत उपयोग कर परमेश्वर की आज्ञा की अवहेलना द्वारा "भले एवं बुरे के ज्ञान'' नामक वृक्ष के फल को चख लिया जो उनके जीवन में विनाश एवं श्राप लेकर आया। प्रिय मित्रों हमें हमेशा ऐसे ज्ञान की खोज में रहना चाहिये जो सत्य एवं छुटकारा प्रदान करता है। अधिक ज्ञान कभी-कभी पतन एवं विनाश की ओर ले जाता है यदि उसका समुचित प्रयोग न किया जाये।

प्रस्तुति : रहव् संतोष पाण्डेय क्रिस्ट चर्च अलीगढ

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