आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Thursday, December 11, 2008

देवताओं को समझने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं।

देवताओं को समझने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता ही नहीं। पिंड और ब्रह्माण्ड की रचना तात्विक दृष्टि से एक रूप है। शरीर ही सही अर्थों में श्री चक्र है, इसी में संसार लीन होता हैऋ और शरीर को ही साध करके, इस शरीर को ही चक्र बनाकर, इस शरीर को ही त्रिपुर सुन्दरी में समाहित करके संसार की समस्त चेतना, संसार का समस्त ज्ञान, संसार की सारी कार्य पद्यति को समझा जा सकता है।

मनुष्य जब चेतन्यता को प्राप्त होता है तो वह अनुभव कर सकता है कि वह हाड़ मांस का सामान्य पुतला नहीं। वह महज रक्त और नाड़ियों से उलझा कोई यंत्र नहीं। वरन्‌ उसके अंदर एक विराटता छिपी है- ठीक ऐसी ही विराटता जैसे अर्जुन ने भगवन श्री कृष्ण के अंदर देखी।

2 comments:

Himwant said...

सैद्धांतिक रुप से बुद्धि के स्तर पर इस थ्योरी को माना जा सकता है। लेकिन व्यवहारिक रुप से यह अतेन्द्रिय अनुभव कैसे हो सकता है? क्या आज जगत मे कोई ऐसा सदगुरु है जो एक कण की भी अंतिम सच्चाई को जानता हो ? कोई अगर इस अवस्थाको प्राप्त कर ले तो वह त्रिकालदर्शी हो जाएगा। परमात्मा से उसका भेद हीं मिट जाएगा। आपको कोई ऐसा सदगुरु मिले तो मुझे अवश्य अवगत कराइएगा ।

SANJAY SINGH said...

thanks for comment himwant ji. aapake comment ko maine post kar diyaa hai. agar galat kiyaa ho to excuse me please.