आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Wednesday, April 1, 2009

तीर्थयात्रा का उद्देश्य है- आध्यात्मिक विकास

तीर्थयात्रा का उद्देश्य है- आध्यात्मिक विकास और आध्यात्मिक विकास मनुष्य को आनंद प्रदान करता है। दूसरी ओर, यदि हम किसी व्यक्ति की सहायता करते हैं अथवा उसकी इच्छापूर्ति में सहायक होते हैं, तो हमें अपार सुख एवं संतुष्टि मिलती है। दरअसल, हमारे मन में सद्वृत्तियों का विकास भी तीर्थयात्रा के समान ही है, जिसे हम यहां दी गई कहानी के माध्यम से समझ सकते हैं। लक्ष्मी के जीवन का आधार थी उसकी एकमात्र पुत्री माधवी। उसकी पिता की मृत्यु होने के कारण लक्ष्मी अपनी बेटी की परवरिश के लिए दिन-रात श्रम करती। एक दिन स्कूल से घर लौटते समय माधवी बारिश में भीग गई। भीगने के कारण उसे बुखार आ गया। बुखार के कारण उसकी तबियत दिन-ब-दिन बिगड़ती ही चली गई। चिंतातुर माँ मंदिर गई और ईश्वर से प्रार्थना की कि मेरी बेटी की तबियत को ठीक कर दो। मैं तीर्थयात्रा करूंगी। माधवी दो-चार रोज में भली-चंगी हो गई। उधर लक्ष्मी भी अपने वचनानुसार तीर्थयात्रा पर जाने की तैयारी में लग गई। तीर्थयात्रा पर जाने से एक दिन पहले रात में लक्ष्मी को अपने पड़ोस के घर से सिसकने की आवाज सुनाई दी। लक्ष्मी वहाँ गई, तो देखा कि उसकी पड़ोसन राधा रो रही है। लक्ष्मी ने उससे रोने का कारण पूछा, तो उसने बताया कि उसके पति कई दिनों से बीमार हैं। डॉक्टर ने कई टेस्ट और एक्सरे कराने को कहा है, पर घर में फूटी कौड़ी भी नहीं है। लक्ष्मी ने राधा की सारी बात सुन कर कहा कि बहन घबराओ नहीं, ईश्वर सब ठीक कर देंगे। वह घर गई और तीर्थयात्रा पर जाने के लिए जो पैसे रखे थे, लाकर राधा के हाथ पर रख दिए। राधा ने लक्ष्मी से कहा कि तुम तीर्थयात्रा पर न जाकर यह पैसे मुझे दे रही हो! लक्ष्मी ने कहा कि राधा तीर्थयात्रा तो फिर हो जाएगी! लेकिन इस समय उससे ज्यादा जरूरी है तुम्हारे पति का इलाज, इसलिए तुम अपने पति का इलाज कराओ। वास्तव में, किसी व्यक्ति की मदद या सेवा से बढ़ कर कोई तीर्थयात्रा नहीं होता और जिसने इस 'सत्य' को जान लिया, उसका मन ही सबसे बड़ा तीर्थ बन जाता है।

Thursday, September 25, 2008

सच्चा हीरा तो आप हैं

बगदाद के खलीफा हसन एक खुदापरस्त व रहमदिल इंसान थे। उनका सेवक हाशिम उनके संपर्क में आने के बाद अनेक दुर्गुणों का त्याग कर नेकदिल इंसान बन गया था। वह खलीफा के साथ एक फकीर के पास सत्संग के लिए जाया करता था। फकीर उपदेश में कहा करते थे कि जो व्यक्ति हराम की कमाई तथा पराये धन के लालच से बचा रहता है, वह हमेशा सुखी रहता है। एक बार खलीफा बहुत से सेवकों (गुलामोंद्) के साथ बग्घी में बैठकर कहीं जा रहे थे। अचानक घोड़ा फिसल गया और खलीफा के हाथ की थैली झटका लगने के कारण दूर जा गिरी। उस थैली में कीमती हीरे-पन्ने भरे हुए थे, जो सड़क पर बिखर गए। खलीफा ने गुलामों से कहा, "तुम सब तुरंत हीरे-पन्ने बटोर लो। बदले में सबको इनाम दिया जाएगा।' सभी गुलाम हीरे-पन्ने बटोरने में लग गए। खलीफा ने देखा कि हाशिम उनके पास ही खड़ा है। इनाम के लालच में वह हीरे-पन्ने बटोरने में नहीं जुटा। खलीफा ने हाशिम से पूछा, "तुम हीरे-पन्ने क्यों नहीं बटोर रहे हो?' हाशिम ने जबाब दिया, "सबसे कीमती हीरा तो मेरे बिलकुल पास खड़ा है। आप मेरे लिए हीरा ही नहीं, पारस हैं। आपने तमाम दुर्गुणों से मुक्ति दिलाकर मुझे सच्चा इंसान बना दिया है। फिर, मैं हराम की कमाई इनाम में लेकर पाप का भागी क्यों बनूं?' बादशाह उसकी नेकनीयती से बेहद खुश हुए। उन्होंने उसे सेवक से सलाहकार बना दिया।

प्रस्तुति : मानव

Wednesday, September 24, 2008

अब किससे मिलाने जाते हो

एक बार एक व्यक्ति के मन में विचार आया कि भगवान से कैसे मिला जाए? यहाँ इस घर में पड़े-पड़े इन्तजार करता रहा तो शायद पूरी आयु यूँ ही बीत जाए। ऐसा विचार आने पर उसे लगा कि "घर से निकल कर भगवान को खोजा क्यूँ न जाए? सुना है ऊँचे पर्वतों पर भगवान आसानी से मिल जाते हैं। क्यों न वहीं चलूँ।'' ऐसा निश्चय कर उसने यात्रा की तैयारी शुरू करी। अब वह घर की जो वस्तु देखता उसे लगता इसकी तो बड़ी आवश्यकता है या ये कितनी सुन्दर है या ये किसी की याद दिलाती है वगैरह-वगैरह मतलब ये कि उसे हर सामान उपयोगी व प्रिय लगने लगा सो उसने कुछ मजदूरों को बुलाकर उनसे अपने साथ-साथ सामान लेकर चलने को कहा। अब घर के ढेर सारे सामान के साथ उसकी यात्रा प्रारम्भ हुई।

राह में एक सन्त ने उसे पर्वतों की चढ़ाई इतने सामान के साथ चढ़ते देखा तो कारण पूछ बैठे। इस पर उसने सन्त को बताया कि वह भगवान से मिलने जा रहा है। सन्त ने कहा इतना सामान लेकर चढ़ाई चढ़ोगे तो बहुत कष्ट होगा और समय भी अधिक लगेगा। हो सकता है कि इतनी बाधाएं हों कि तुम वहाँ पहुँच न पाओ। अब वह व्यक्ति बोला ठीक है सामान यहीं आपके पास छोड़ देता हूँ। फिर वो जैसे ही आगे बढ़ने लगा तो सन्त ने उसे रोका और बोले "अब कहाँ जा रहे हो? किससे मिलने जा रहे हो? अब तो तुम स्वयं ही भगवद्स्वरूप हो गए हो। यह सामान का मोह ही तो बाधा था, अब वह बाधा कटते ही भगवान तुम्हें कहीं भी सुलभ हो गए हैं।'' मन में अगर मोह, कामना, वासना पड़ी है तो भक्ति नहीं हो सकती। ज्ञान तथा वैराग्य से जब मोह बन्धन करता है तभी भक्ति हो पाती है, और तभी मुक्ति मिलती है। किसी ने सही ही कहा है-

"चाह, चमारी, चूड़ी............................. तू तो पूरन ब्रह्म था, यदि चाह न होती बीच।''

Saturday, July 26, 2008

संकल्प का फल: कहानी

गौतमगिरिजि महाराज

एक समय की बात है एक बनिया कथा श्रवण करने जाता था। कथाकार महाराज ने उससे कहा- तुम कथा तो सुनते हो सो कुछ अच्छा सा संकल्प करो। सत्य बोलने का संकल्प करो। बनिया बोला वह तो व्यापारी है, सत्य ही बोलेगा तो सारा कारोबार चौपट हो जाएगा। इस पर महाराज ने कहा कि किसी की निन्दा न करने और न सुनने का संकल्प कर लो। बनिया कहने लगा- महाराज, जब तक रात को दो तीन घंटे बातों में न गुजारूँ, मुझे नींद ही नहीं आती है। इसलिए मैं यह संकल्प भी नहीं कर सकता। महाराज जी ने कहा कि चलो तुम जो चाहो संकल्प कर सकते हो, लेकिन उसका पालन नियम पूर्वक करना। बनिया बोला महाराज मैं संकल्प लेता हूँ कि प्रतिदिन अपने घर के सामने रहने वाले कुम्हार का मुँह देखकर ही अपनी दैनिक क्रियाएं प्रारम्भ किया करूँगा। वह रोजाना सुबह जगता तथा कुम्हार का मुँह देख लेता। एक दिन बनिए के जगने से पहले ही कुम्हार मिट्टी लेने गाँव से बाहर चला गया। बनिया जागा तो उसे कुम्हार का मुँह दिखाई नहीं दिया। बनिया अपने संकल्प को पूरा करने के लिए कुम्हार को ढूँढ़ने चल दिया। उधर कुम्हार जब मिट्टी खोद रहा था तो उसे वहाँ गड्ढे में एक सोने से भरा मटका मिला। वह उसे निकाल ही रहा था कि उसी समय बनिया भी कुम्हार का मुँह देखने की नीयत से वहाँ पर पहुँच गया, और मुँह देखकर बोला- चलो मैंने देख लिया। कुम्हार ने समझा कि बनिए ने सोने से भरा मटका देख लिया है। यदि वह राजा से कह देगा तो पूरा का पूरा सोना जब्त हो जाएगा। सो वह बनिए से बोला,- तूने देख तो लिया है पर किसी से कहना मत। मैं तुम्हें आधा भाग देता हूँ। इस प्रकार बनिए को सोना मिल गया।

अब बनिया सोचने लगा कि मैंने इस कुम्हार के मुख दर्शन का संकल्प लिया तो लक्ष्मी जी का आगाज हो गया, अगर मैंने स्वयं प्रभु के दर्शन का संकल्प लिया होता तो कितना अच्छा होता। ऐसे छुल्लक और मजाकिया संकल्प से इतना लाभ हो सकता है तो शुभ संकल्प से कितना लाभ होता। मनुष्य को दो संकल्प तो अवश्य ही करने चाहिए- एक, पाप कर्म न करने का और दूसरा सत्कर्म करने का.

Friday, July 4, 2008

एक कहानी ( जिदगी जियें और उस पार की व्यवस्था भी करें)


एक ऐसा राज्य था जहॉ राजवंश परम्परा नहीं थी, बल्कि हर पॉच वर्षों के बाद राजा पद के प्रार्थना पत्र आमंत्रित किए जाते थे। फिर उन उम्मीदवारों में से एक को चुनकर पॉच वर्ष के लिए राजा बना दिया जाता था। परन्तु ऐसा नहीं था कि राजा बनने के लिए ज्यादा सेख्या में लोग आवेदन करते हों।
ऐसा क्यों? वह इसलिए कि वहॉ का नियम था कि पॉच वर्षों के शासन के उपरांत राजा को राज्य की सीमा पर बहती विशाल नदी के उस पार जंगली जानवरों से भरे निर्जन वन में अकेला छोड़ दिया जाता था, वहॉ वह निश्चय ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता था। अधिकतर वृद्ध जन ही राजा बनने के लिए यह सोचकर आवेदन करते थे कि अब बचु कुचे दिन राजा बनकर आनन्दपूर्वक जीलें, फिर तो मरना है ही। परन्तु एक बार उस राज्य में एक सन्त अपने कुछ शिष्यों के साथ आए। संयोग से उसी समय राजा पद हेतु आवेदन किए जाने की मुनादी हो रही थी। एक नौजवान शिष्य ने जब पूरी बात सुनी तो बोला, ''मैं आवेदन करना चाहता हूँ । '' इस पर आस पास खड़े नागरिकों ने आश्चर्यचकित होकर कहा कि, ''नवयुवक इस अवस्था में ही जीवन से इतना उब गए कि शीघ्र मरना चाहते हो।'' इस पर उस शिष्य ने अपने गुरु की तरफ देखते हुए कहा कि, ''मेरे गुरु ने मुझे मनुष्य जीवन का महत्व ओर उद्देश्य बता रखा है। मैं जानता हूँ कि यह कितना बहुमूल्य है। और मैं धन वैभव के भोग का सुख लेने हेतु नहीं अपितु अपने गुरु का संदेश जन जन तक पहुंचाने हेतु इस राज्य का राजा बनना चाहता हूँ । अंततः हुआ यह कि उसे राजा चुन लिया गया। वह शिष्य राजकाज का काम भली भॉंति करता रहा, पर साथ ही उसने एक ऐसा काम किया जो उसके पूर्ववर्ती किसी राजा ने नहीं किया था। उसने नदी के उस पार जंगल के कुछ हिस्से को साफ करवाकर वहॉं वैसा ही एक राजमहल तथा छोटा सा नगर बनवाया तथा उसके चारों तरफ ऊंची दीवार बनवाकर उसे सुरक्षित करवा लिया। फिर वहॉ कुछ नागरिकों को बसाया। दास दासियों की व्यवस्था भी की। देखते देखते नदी के उस पार भी एक छोटा सा रमणीक नगर बस गया। पॉच वर्षों का अपना कार्यकाल पूरा करने के उपरांत वह शिष्य बड़ी शांति तथा प्रसन्नता के साथ नदी के उस पार जाकर राज करने लगा। विदा होते समय अपने आखिरी भाषण में अपने गुरु का ज्ञान सेदेश प्रजा को देते हुए कहा कि,
''यह मनुष्य जीवन अनमोल है, हमें इसी जीवन में मृत्यु के पश्चात मुक्ति की तैयारी करनी है। वह मृत्यु नहीं महा प्रयाण होगा, जिसके बाद हम जन्म मृत्यु के चक्कर से मुक्त हो जाएंगे। हमें मृत्यु के उपरांत स्वर्ग, नरक, मोक्ष या मुक्ति, क्या मिलेगा यह हमारे जीवन में किए गए कर्मों तथा हमारे मन के भावों पर निर्भर है। अतः हमें ऐसा ध्यान रखकर ही कर्म करने चाहिए कि मृत्यु नजदीक ही है। हमे मृत्यु के बाद की तैयारी ठीक उसी तरह करनी चाहिए जैसी इन पॉंच वर्षों में मैंने नदी के उस पार जाने के लिए की है। मैं अब निडर होकर प्रसन्नता से उस पार जा रहा हूँ न कि डरते और रोते हुए। जीवन में यदि मृत्यु को स्मरण रखा जाए तो हमारे मन, कर्म तथा वचन शुध पवित्र बने रहेंगे। और हमारा परलोक सुधर जाएगा, जैसे मैं उस पार जाकर कष्ट नहीं भोगूंगा वरन राज करूंगा।'' शिष्य ने गुरु के ज्ञान को आत्मसात तो किया ही था। साथ ही उसने उदाहरण प्रस्तुत करके उसे समस्त प्रजा के समक्ष कितना सुबोधगम्य ढंग से प्रस्तु किया। धन्य है वह शिष्य ओर धन्य है उसका गुरु।

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