आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
Showing posts with label female. Show all posts
Showing posts with label female. Show all posts

Monday, January 12, 2009

स्वामीजी रूक ना सके, कुसंस्कार की दौङ


परमात्मा के परम स्नेही उम्मीद सिंह बेधरक साधक जी की बारी सुंदर टिप्पणी प्राप्त हुई । उसे मूल रूप में प्रकाशित कर रहे हैं।

स्वामीजी रूक ना सके, कुसंस्कार की दौङ .

टी.वी। क्या माहौल ही, करे परस्पर हौङ ।

नाकरे परस्पर हौङ, कि संस्कति नष्ट हो कैसे।

भारत-भाग्य-सितारा, जल्दी अस्त हो कैसे।

कह साधक अब करो गुजारिश उसे स्वामीजी।

केवल ईश्वर पलट सके, दुष्चक्र स्वामीजी.

Sunday, January 11, 2009

हम किधर जा रहे हैं?

बच्चों का मन कोमल होता है उस पर पड़ी छाप आजीवन नहीं मिटती। आज बच्चा टी.वी., इंटरनेट आदि के माध्यम से बहुत कुछ जान चुका है, तो बेहतरी इसी में है कि उसे इतना ज्ञान अवच्च्य दिया जाए कि वह इस खुले माहौल में रहते हुए पाप व बदी के रास्ते से बच सके। गर्भपात सिर्फ कुछ अति विच्चेष परिस्थितियों में उचित है, अन्यथा भ्रूण हत्या की ही रोकथाम को जानी चाहिए। कन्याभ्रूण परीक्षण पर और कड़ाई से लगाम लगाने के साथ-साथ उन चिकित्सकीय सुविधाओं पर भी पाबन्दी लगाई जानी चाहिए, जिससे माता-पिता पहले से ही सुनिच्च्िचत कर सकते हैं कि बच्चा किस लिंग का हो इनमें अण्डे तथा वीर्य का निेपवद, चाइना डिच्च में बाहरी रूप नियन्त्रित परिस्थितियों में करवा कर सुनिच्च्िचत किया जाता है कि नर भ्रूण ही तैयार हो फिर इसे माँ के गर्भ में स्थानान्तरित कर दिया जाता है। भ्रूण हत्या से, कन्या भू्रण हत्या और अब एक नई समस्या कि बच्चे का लिंग पूर्व में ही सुनिच्च्िचत करने की सुविधाऐं। हम किधर जा रहे हैं?

Saturday, January 10, 2009

धर्माचार्यों की भूमिका के अतिरिक्त विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा से सुधार सम्भव है।

धर्माचार्यों की भूमिका के अतिरिक्त विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा में भी यदि हम बच्चों को मूल्य परक शिक्षा दें-मानव जीवन का मूल्य बताऐं तथा दूसरों के जीवन का सम्मान करना सिखाऐं, तो बहुत सुधार सम्भव है। विद्यालयों में ही छात्रों को गर्भपात से होने वाले महिलाओं के स्वास्थ्य व कन्याओं की घटती संख्या से उत्पन्न सामाजिक असन्तुलन की भयावह स्थिति को भी बताया जाना चाहिए। और यदि इन छात्र-छात्राओं को गर्भपात के लिए इस्तेमाल होने वाले तरीकों की जानकारी दे दी जाए जो कि इतनी अमानवीय है कि उसका वर्णन रौंगटे खड़े कर दें तो वे शायद इस घृणित अपराध को कभी भी ना करने का संकल्प ले लें।

Wednesday, January 7, 2009

गर्भस्थ शिशु को इस अधिकार से वंचित करके माता-पिता भगवान के ही गुनाहग़ार हो जाते हैं।

वह स्थान बदलता है, दर्द, शोर व रोशनी पर प्रतिक्रिया करता है यहाँ तक कि उसे हिचकियाँ भी आती हैं। उसके बाद तो वह बस आकार में बढ़ता है व उसके बाल आदि उगते हैं। डाक्टरों को गर्भपात कराने आने वाले लागों को इन बातों की पूरी जानकारी देनी चाहिए, जिससे कि उन्हें पता चल सके कि जिसे वह खत्म करवाने आए हैं वह मात्र एक मांस का टुकड़ा नहीं उनका बच्चा है। (इस प्रकार हो सकता है कि उनके हृदय में करुणा, ममता का संचार हो जाए और वह अपने ही बच्चे को मारने का पाप करने से बच सकें।) साथ ही धर्माचार्य भी यदि धर्म, ग्रन्थों में कहीं गर्भ के मूल्य की बातों को विज्ञान की कसौटी पर कस कर लोगों के सामने रखें तथ भू्रण हत्या को एक घिनौना, अक्षम्य, पाप के रूप में सबके सामने रखें तो इस समस्या से छुटकारा पाया जस सकता है। आखिर मानव को भगवान ने कुछ विच्चेष बनाया है उसे विवेक व मन दिया है, जिसका प्रयोग वह प्रभु को स्मरण भजन करने व मोक्ष पाने हेतु कर सकता है। मानव जन्म अनमोल है। इसमें असीम सम्भावनाऐं छुपी हैं। गर्भस्थ शिशु को इस अधिकार से वंचित करके माता-पिता भगवान के ही गुनाहग़ार हो जाते हैं। जब इन्द्र गर्भिणी कयादु का अपहरण कर रहे थे व हिरण्यकच्चिप के शिशु को गर्भ में ही समाप्त करने वाले थे तो नारद मुनि ने उन्हें यही sandesh दिया था कि कयादु के गर्भ में भगवान का भक्त पल रहा था व सही माहौल देकर उन्होंने उस बालक को भक्त प्रहृलाद बना भी दिया। जन-जन तक पहुँचाना आवच्च्यक हो गया है जो कि धर्माचार्य ही कर सकते हैं। माता-पिता बच्चे को जन्म देने का माध्यम हैं उसे सही संस्कार देना महौल देकर उसका सर्वांगणि विकास करना माता-पिता का कर्त्तव्य है जिससे कि बच्चा या बच्ची अपने जीवन में छुपी अपार सम्भावनाओं को साकार कर सके।

Tuesday, January 6, 2009

क्या भू्रण हत्या किसी भी तरह से धर्म संगत है?

एक महत्वपूर्ण बात और जो धर्माचार्यों के मुख से निकलने पर और अधिक महत्वपूर्ण बन जाएगी वह है क्या भू्रण हत्या किसी भी तरह से धर्म संगत है? धर्मों में तो ऐसा माना ही जाता रहा है कि मानव भू्रण को भी एक विकसित मानव के समान सम्मान दिया जाना चाहिए। ऐसे में लिंग परीक्षण व भू्रण हत्या का विचार मात्र क्या पाप नहीं। माता के अण्डे तथा पिता के वीर्य के निेपवद होते ही भ्रूण का जीवन प्रारम्भ हो जाता है ऐसा तो आज विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि (तीन हफ्ते के भू्रण का भी हृदय धड़कना शुरू कर देता है। चार हफ्ते का भू्रण भले ही सिर्फ एक चौथाई इन्च का होता है पर उसके सिर तथा शरीर को देखा जा सकता है और तो और आँखें, कान व मुख भी बनने द्याुरू हो जाते हैं। छः-सात हफ्ते में मस्तिष्क में भी हलचल महसूस की जाती है। तथा आठवें हफते में जब अधिकांच्च गर्भपात होते हैं बच्चे के हाथ पैर यहाँ तक कि उँगलियाँ भी बन चुके होते हैं। नौ दस सप्ताह का भू्रण अपने हाथ से पकड़ सकता है व मुँह से अंगूठा भी चूस सकता है। और तीन माह पूरे होते होते, जब भू्रण परीक्षणों के बाद गर्भपात करवाया जाता है। भ्रूण एक पूरे बच्चे का रूप ले चुका होता है।

Labels