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Saturday, November 8, 2008

भाव ज्यादा सक्षम है सत्य को अपने अंदर समाहित रखने में।

पिछले पोस्ट पर हिम्मत जी की टिपण्णी बहुत सुंदर आई । उसे उसी रूप में प्रकाशित कर रहे हैं।

शब्द "सत्य" नही हो सकते। शब्दो के अर्थ बदलते रहते है। शब्द बुद्धी का विषय है। भाव ज्यादा सक्षम है सत्य को अपने अंदर समाहित रखने में। ये पुस्तके जिनका नाम आपने लिखा है वे मृत पुस्तकें हैं। विकसित मानव के निर्माण मे उनकी कोई भुमिका नही हो सकती है - बल्कि वे बाधक हैं। परम सत्य का दर्षण सिर्फ और सिर्फ आत्मानुभुति से हो सकता है। आज इस दुनिया मे कोई ऐसा नही जो मुझे पार लगा सकता है, सिवाय मेरे खुद के। मेरा ईश्वर, मेरा सत्य मेरे अन्दर है। मेरी प्यास ही सबसे महत्वपुर्ण है। तुम्हारे शब्द बेकार है किसी और के लिए। जब तुम खुद प्रकाशित नही हुए तो औरो को प्रकाश दिखाने ढोंग क्यो करते हो ?

5 comments:

Kusum chaudhary said...

Bat to theek hai lekin ln pustako jinka zikr sanjay singh ne kiya hai unhe dead kah dena bhi shayad uchit nahin.

ashish said...

har vyakti ne saty ko apne tarh se apne samy mai parbhashi kiya hai.
pustak mai likha saty unke samay mai unke nazriye se thik ho sakta hai. magar aaj vo hamare liye sahi ho ye zarrori nahi. parantu iss se un pustko ya un gyaniyo ki likhit rachana ko dead to nahi kaha ja sakta. meri liye jo sahi hai vo aapke ke liye sahi ho ye zarrori to nahin. parantu saty dono hain.

Truth Eternal said...

Bhai Himmat Singh ji,
pahale to aapko bhadai ho ki aap satya ki anubhooti karne mein swayam saksham hain....
parantu sabhi itne jigysu aur aatmvishwasi nahin hain.....zara khul kar bataein ki jis satya ki khoj ke liye sada se pipasu bhatakte rahe uski anubhooti aap itni sahajta se kaise kar sakte hain???????????
kya iske liye Bhagwadkripa aur guru ki kripa aur hamari shraddha ki avashyakta nahin...
yadi hai to Guru ka Gyan shabdon ke roop mein ham tak pahunche yah to achchha hi hai.....
prachin Guruon ke Gyan se alokit pustakon ko yun mrit kahenge....to sansar mein prakash kahan se ayega?
Vaise aapki is baat se ek geet yaad aa gaya- "Maano to main Ganga maa hoon...na maano to bahta paani"

aapka manana hai ki in pustakon ka vikasit manav ke nirmaan mein koi yogdaan nahin....bahut tajjub ka vishay hai ki koi vicharak aisa kahe.... kya ham vastav mein viksit ho sakte hai...aise samaj mein jahan bhay, aatank, avishvaas,eershya, hinsa aadi buraiyon ka raaj ho??????????

in sab vikaron se mukti apne Granthon ko sahi arthon me samajh kar apnane se hi aa sakti hai....
vikas aur sthayitva donon ke liye shanti avashyak hai...aur yah shanti ki mashal adhyatmik roop se unnat log hi sansar ko dikha sakte hai........

Himwant said...

मैने आपके विचारो पर इस लिए प्रहार किया था की सत्य रुढी न बन जाए। शास्त्रो का महत्व बिल्कुल नही है, ऐसा मेरा कहना गलत था। लेकिन कुरान और बाईबल धर्म शास्त्र नही है – वह एक राजनैतिक साम्रज्यवादी उद्देश्य से गढी गई आचार संहिताए है। धर्मांतरीत कर अपने मतावलम्बियो की संख्या बढाने का प्रचारवादी उपक्रम मानवता के लिए त्रासदी हीं है।

सभी ईतने जिज्ञासु कहां है ?
सभी मे जिज्ञासा और प्यास तो होती है, लेकिन इतनी नही की वह उसे परम सत्य की तरफ तेजी से बढा दे। कम है ऐसे लोग जिन की प्यास और जिज्ञासा तीव्र हो। ज्ञानियो के दिखाए मार्ग पर चलने से समय आने पर आदमी की प्यास जगती ही है।

गुरु कृपा, भगवत कृपा और श्रद्धा की आवश्यकता? खुद के अलावा कौन परम गुरु हो सकता है। क्षणीक काल के लिए ढेर सारे गुरु मिलते है, उनसे श्रद्धा पुर्वक ज्ञान प्राप्त करना ही चहिए। लेकिन उस गुरु पर ठहर गए तो खोज अधुरी ही रह जाएगी। जब पकोगे तो भगवत कृपा अवश्य होगी। यह पृकृति का नियम है।

धार्मिक पुस्तको की विकसीत मानव के निर्माण मे कोई भुमिका नही हो सकती। जी मै ऐसा ही सोचता हुं।

आप अगर पुस्तको पर श्रद्धा रखते है तो स्वयं कितनी बार वेद, पुराण, रामायण, माहाभारत, गीता, उपनिषद, बाईबिल और कुरान पढे है?

Anonymous said...

इस परम अस्तित्व को समझने के लिए हमारी ईन्द्रियो की क्षमता अत्यंत सिमीत है। हम सुंघ सकते है, स्वाद अनुभव कर सकते है, स्पर्श महसुस कर सकते है, ध्वनि सुन सकते है, दृष्य देख सकते है, या इन ईन्द्रियो के सिमा के अन्दर कल्पना कर सकते है। ईन्द्रिय भी अपना वह विषय नही महसुस कर सकती जो निरंतर, हरहमेशा या भेदरहित है। हम यह समझ बैठते है की इस थोडी सी बुद्धि के बल पर इस परम अस्तित्व – परम ज्ञान को समझ सकते है। यह बहुत बडा अज्ञान है- इससे मुक्ति आवश्यक है। वह परम सत्य तो हमारे सामने ही होगा, लेकिन हम उसे देख नही पाते। मेरी स्वानुभुति क्षमता सिमीत तो है, लेकिन दुसरे की इन्द्रियातित अनुभुति मेरे लिए खोखले शब्द होगे जब तक वह मेरी अनुभुति पर न उतर जाए। मुझे तो कोई गुरु अब तक नही मिला जो संषय-रहित ढंग से सर्वज्ञ हो। सारे अर्द्ध ज्ञानी दिख पडते है जो थोडा सा जानने पर भी ऐसा दिखावा करते है की वह सब कुछ जानते हो।