आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Saturday, October 4, 2008

हमारे जीवन का स्पष्ट सत्य मृत्यु है


हमारे जीवन का अत्यंत स्पष्ट और घोर सत्य मृत्यु है जो हमारे सम्मुख खड़ी घूर रही है और प्रति दिन हम लोगों में से कितना ही काम तमाम करती रहती है, फिर भी हमें उसका ध्यान भी नहीं रहता कि एक दिन हमें भी मरना है और हम अपने रोज+ के साधारण काम-धंधों में लगे रहते हैं। हमारी इस मनोवृत्ति से हमारी उपेक्षा तथा विचारशून्यता अच्छी तरह प्रकट होता है। मनुष्य इतना पाप करते हैं, इतना दुःख भोगते हैंऋ क्योंकि वे केवल इस भौतिक जीवन को ही सत्य मानकर चलते हैं जो वास्तव में सत्य नहीं है, वरन्‌ एक बाह्य जीवन की इस परिवर्तनशीलता पर ध्यान देना सीख लेते तो निश्चय ही अपने स्वार्थ के लिए अन्याय करना या दूसरों को हानि पहुँचाना छोड़ देते। हमें बहुधा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि किस प्रकार करोड़ों मनुष्य प्रतिदिन भौतिक शरीर धारण करके पैदा होते और मरते हैं तथा कितने असंख्य मनुष्य इस परिवर्तनशील संसार में आये और चले गये होंगे। अपनी भौतिक सत्ता के समाप्त होने पर हम देखते हैं कि जो Vअस्तुएँ दुनिया में बड़ी मूल्यवान्‌ और महान्‌ कही जाती थीं उनका कोई वास्वविक मूल्य नहीं है और न उनमें कोई सार है। बु(मिान्‌ और विचारवान्‌ मनुष्य छाया या सारहीन वस्तु के पीछे नहीं दौड़ते। अपने जीवन की बाह्य घटनाओं पर इस प्रकार गंभीर विचार करने से हम संसार के क्षणिक आकर्षणों से बहुत कुछ दूर रह सकेंगे और हमारे मस्तिष्क में एक प्रकार की गंभीरता तथा समता की भावना पैदा होगी जो उच्चतर जीवन की प्राप्ति के लिए अत्यंत आवश्यक है।

प्रस्तुति : पूजा चौधरी

2 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर विचार प्रेषित किए है।आभार।

Ashish said...

Bahut sundar aur saty likha hai