आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Thursday, August 27, 2009

सूक्ष्म शरीर के लिए कुछ भी दुर्गम नहीं कुछ भी अभेद्य नहीं।

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कहते हैं कि "समाधि में मन वायुरहित स्थान पर स्थित हुई दीपक की लौ के समान स्थिर व शान्त हो जाता है।'' आज के इस अशान्त तथा भौतिकतावादी वातावरण में जो भी साधक ध्यान करते हैं वे विश्व का कल्याण करते हैं क्योंकि "जो पिंडे सो ब्रह्माण्डे''। जब-जब एक भी चित्त शान्त होता है, तो शान्ति से पूर्ण तरंगे ब्रह्माण्ड में भी शान्ति का संचार करती हैं। ऐसे ही यदि अधिक से अधिक लोग ध्यान करें तो जगत में शान्ति स्थापित करने में ये बहुत बड़ा योगदान होगा, क्यूँकि हमारे भीतर की प्रकृति ही बाहर की प्रकृति को निर्धारित करती है। आज के युग में सबसे अधिक जिस वस्तु की आवश्यकता है वह है-शान्ति। तो क्यूँ न हम सब प्रभु के दिए जीवन में से थोड़ा-थोड़ा समय ध्यान के लिए लगाकर स्वयं को तथा विश्व को शान्ति देने का महान कार्य करें? ध्यान करते समय व्यक्ति को कोई विशिष्ट अनुभूतियाँ होती हैं, कुछ सिद्धियाँ भी प्राप्त हो जाती हैं, जिनमें से सबसे अधिक चमत्कृत करने वाली सिद्धि है सूक्ष्म शरीर का स्थूल शरीर से बाहर निकलकर विचरण करना। सूक्ष्म शरीर के लिए कुछ भी दुर्गम नहीं कुछ भी अभेद्य नहीं। वहाँ देशकाल की सीमाऐं पिघल जाती हैं। सूक्ष्म शरीर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों कालों में किसी भी स्थान तक यात्रा कर सकता है। ऐसे में सूक्ष्म शरीर स्थूल के साथ एक चाँदी की तरह चमकती डोर से जुड़ा रहता है। प्राचीनकाल में ऋषि मुनि इसी के माध्यम से बैठे-बैठे ही सभी स्थानों पर घटित होने वाली घटनाओं को जान लेते थे तथा त्रिकालदर्शी हो जाते थे। साथ ही वे विचारों के आदान-प्रदान को भी ध्यान के द्वारा ही बैठे-बैठे कर लेते थे।

Monday, August 24, 2009

उपराम हो जाने का नाम ध्यान है?

अनंत श्री दिव्य रुद्र कहते हैं कि, ध्यान शब्द का अर्थ भौतिक जगत में है-एकाग्रता और इसी एकाग्रता का जब आध्यात्मिक धरातल पर विस्तार किया जाता है, तो इसकी परिणति ध्यान, फिर शनैः शनैः समाधि में होती है। "ध्यानं निर्विषयं मनः'' जब मन में कोई विषय न हो कोई चिन्तन न हो ऐसी अवस्था को ध्यान कहते हैं। मन को किसी एक विषय में एकाग्र करके फिर उससे भी उपराम हो जाने का नाम ध्यान है। ध्यान शून्य से शुरू होता है। ध्यान शरीर के उन चक्रों पर करना चाहिए जहाँ शून्य है- खाली शून्य स्थान है। शरीर में स्थित ३ चक्रों पर शून्य है- अनहद चक्र, सहस्रार चक्र तथा ब्रह्मरंध। जो साधक इन चक्रों पर ध्यान लगाते हैं उन्हें उत्तम लक्ष्य की प्राप्ति होती है। आज्ञाचक्र पर ध्यान करने से परिणाम भले ही तुरंत दिखाई दे, परन्तु वे दूरगामी नहीं होते तथा ऐसे साधक को काम वासना परेशान कर सकती है, अंधकार मिलता है और माया के प्रपंच में फँसने का डर रहता है।

क्रमशः

Saturday, August 15, 2009

राधा उपासना है तो श्रीकृष्ण उपास्य

शशिमुख मुखरय मणिरश्न गुणमनुगुण कंठ निनादम्‌,

मामश्रुति युगले पिकरुत विकले शमय चिरा दव सादम्‌॥६॥

मामति विफलरुषा विकलीकृत मवलोकित मधुनेदम्‌।

मीलित लज्जित मिवनयन मतव विरम विसृज रतिखेदम्‌॥७॥

अर्थात्‌:- हे शशिवदनी! दीर्घसमय से विरह व्यथित तथा कोयल के शब्द सुनकर मेरे विरह व्याकुल कानों में कंठ गीत तरह, मणि जटित स्वर्ण कर्धनी का शब्द करो तो मेरा दुख समाप्त हो जायेगा। हे प्रिये! तेरे युगल नेत्र, अकारण क्रोध से व्याकुल हुये, मुझे देखने को लज्जित की भांति मिचते हैं। अतः इस क्रोध को छोड़कर रतिखेद को त्याग दो अर्थात्‌ प्रीति पूर्वक मेरे साथ रमण करो।

उपरोक्त श्लोकों में, अतिसूक्ष्म भगवान श्रीकृष्ण जी एवं श्री राधा जी को प्रेम प्रसंग की झलक मात्र प्रस्तुत की गयी है। श्री राधा जी आराधना हैं तो भगवान श्री कृष्ण आराध्य।"यः आराधयते सा राधा।'' राधा जी प्रकृति हैं तो श्री कृष्ण जी ब्रह्म। श्री राधा जी प्रेरणा हैं, जगजननीवत हैं तो भगवान कृष्णा संसार के पिता हैं। प्रकृति, सृष्टि (निर्माण) करती है, क्षेत्र है यह, तो कृष्ण क्षेत्रज्ञ हैं। लोक कल्याणार्थ उनकी यह प्रणय लीला अत्यन्त हितकारी है। महा कवि श्री पं। जयदेव जी सृजित यह गीत महाकाव्य संसार के लिए अत्यंत शान्ति प्रदान करने वाला है। इसमें पद पद पर श्री कृष्ण चन्द्र भगवान के आनन्द का वर्णन है। आनन्दकन्द भगवान की महाशक्ति, महाभक्ति राधा का अनन्य समपर्ण प्रभु हिताय एवं जगत हिताय ही है। यह महागीत श्रृंगार रसालिप्त रसिक भक्त जनों को परम शान्ति, विनोद एवं इच्छित प्राप्त कराने वाला है।

Wednesday, August 12, 2009

शीतल जल से पूरित घड़े को रखने से विरहताप अवश्य दूर होता है।

बदन सुधानिधि गलितममृतमिव रचय वचन मनुकूलम्‌,

विरह मिवापन यामि पयोधर रोधक मुरसि दुकूलम॥३॥

प्रिय परिरंभण रमसवलि तमिव पुलकित मन्य दुरापम्‌।

मृदुरस कुच कलशं विनिवेशय शोषयमन सिज तापम्‌॥४॥

अर्थात : हे राधिके! अपने चन्द्रमुख से अमृत वचनों को कहकर, मेरे कानों को तृप्त करो, और मैं विरही उद्वेग से आकुल तुम्हारे अंग वस्त्र (आंगिया) को तुम्हारे वक्षस्थल से हटाऊंगा। हे भामिनी! हे राधे! तुम अब मेरे वक्ष पर अपने युगल स्थूल एवं कड़े स्तनों को रख मेरे साथ कामभोग में आसक्त हो जाओ और मेरी छाती को शीतल कर दो क्योंकि शीतल जल से पूरित घड़े को रखने से विरहताप अवश्य दूर होता है।

Thursday, August 6, 2009

राधा कृष्ण का संवाद

कर कमलेन करोमि चरण महमा गमितासि विदूरम्‌।

क्षणमुप कुरु शयनोपरि मामिवनू पुरमनुगति शूरम्‌॥

अर्थात्‌:- हे सुन्दरी! अनेक प्रकार की विनती करके मैंने तुम्हें इस जगह बुलाया है, इसलिए थोड़े क्षणों के लिए मैं तुम्हारे चरणों को सेवा करूंगा अर्थात्‌ दवाऊंगा। हे राधे! मैं तुम्हारा सेवक, तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे नूपुरों की भांति स्वीकारते हुए, इस अत्यन्त कोमल, पुष्प पल्लवों युक्त शैया पर ग्रहण करो और मुझे अपने नूपुरों की भांति अपने पीछे चलने दो।

Monday, August 3, 2009

मुझे अपने नूपुरों की भांति अपने पीछे चलने दो,

हे राधिके!

मदन महीपति कनकदंड रुचि केशर कुसुम विकासे,

मिलित शिली मुख पाटलि पटलकृत स्मर तूण विलासे॥

कुंजवन में नागकेशर फूल रही है, प्रतीत होता है कि मनोभव ने स्वर्ण मुकुट धारण किया है। पाटलिक के पुष्पों पर भ्रमर गुंजन कर रहे हैं तथा कामदेव का तूण शब्द हो रहा है। ऐसे वासंती वातावरण में इस निकुंज वन में श्री राधा जी श्री कृष्ण जी विनोद करते हुए मुस्कराकर बोलेः-

Sunday, July 26, 2009

गीत गोविन्द का हिन्दी रूपांतरण

और हे सखी!

उन्मद मदन मनोरथ पथिक वधूजन जनित विलापे,

अलिकुल संकुल कुसुम समूह निराकुल वकुल कलापे॥३॥

मृगमद सौरभ रमसवंशवद नवदल माल तमाले,

युवजन हृदय विदारण मनसिज लख रुचि किंशुक जाले॥४॥

अर्थात्‌- इस बसंत ऋतू से समस्त संसार आनन्दित होता है। श्री कृष्ण नारायण स्वरूप जगत के कर्ता- बसंत में दुर्जनादि उदालम्मों से आलिप्त कहे जाते हैं। नारायण प्रोषिताओं की पीड़ा जानते हुए भी इनके विरह जनित विलाप की बसंत के रूप में अनदेखी करते हैं। ये पथिक वधुऐं कामदेव से पीड़ित हुयी जब वकुल पुष्प पर भ्रमर को बैठे देखती है, तो और भी पीड़ित हो जाती हैं। तमाल वृक्षों की कस्तूरी सुगन्ध निकुंज वन में व्याप्त है, जो पलाश पुष्पों से वेष्टित स्वर्ण आभायुक्त हो रहा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कामाग्नि से दहन हृदयों को और विदीर्ण करने के लिए निज नखों को और भी तीव्र एवं विस्तृत कर रहा है।