आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Sunday, May 3, 2009

सारे जग का गुरू आधार, निराकार हो या साकार


वाणी जब कठोर हो जाए, दम्भ-द्वेष-पाखण्ड छुड़ाए॥

शिष्य पे गुरू की करुणा भारी, भक्त सदा रहे आभारी॥

जापर कृपा रुद्र की होई, सो उसको भय नाहिं कोई॥

मोह माया के फंद काट दें, मन के पंच विकार छाँट दें।

सारे जग का गुरू आधार, निराकार हो या साकार ॥

No comments: