Sunday, February 28, 2010
रंग तो लेकिन रस नहीं
रसिया तो अब बिलकुल खो ही गए हें। एक फागुनी का फोन आया और उसने भी कहा हैप्पी होली । मैंने अपनी इस फागुनी को एक रसिया सुनाया तो बोली -- ये क्या हे। अरे रसिया नहीं समझोगी तो रस कहाँ से आएगा । और यदि रस नहीं तो क्या जीवन ।
फागुन का महीना तो रस का महीना हे । और रसिया हे रसों का राजा। तो आओ आज एक रसिया की अन्तर ही गा लेते हें-----
पर्यो पायो रे पर्यो पायो नाथ मिलमा गाल पर्यो पायो।----------
कौन गाँव के बिछुआ कही प्यारे कौन गाँव को साँचो हे
बिछुवन को अजब तमाशो हे-----------
Saturday, February 27, 2010
Friday, January 1, 2010
प्रायश्चित्त से आदमी पाप से दूर होता है,
Friday, December 25, 2009
जो जिन्दगी भर कुकर्म करे वह कैसे मुक्त हो?
प्र्रकृति का दर्शन है प्रवृत्ति व्यवहार का स्वरूप। और निवृत्ति आत्मा का पुरुष का। महाराज, ये आपने वर्णन तो कर दिया कथा का। हकीकत में क्या है? कथा तो बहुत अच्छी है। बहुत बारीक चीजें हैं जो सत्संग करते हैं-गहराई से, वे इनकी बारीकियों को समझते हैं। और तो अधूरे लोग हैं वह तो कुतर्क करके आँखें निकाल कर लड़ने को तैयार हो जायेंगे। बच्चों की किताब नहीं है, न्दपअमतेपजल के बवनतेम की बात नहीं है। ये तो अपनी हकीकत है और हकीकत के लिए, वही हकीकत चाहिए। साढ़े छः अरब आदमी हैं, दुनियां में, एक भी पूरा प्रवृत्ति मार्ग वाला है? और साढ़े छः अरब आदमियों में एक भी पूर्ण निवृत्त है? नहीं है। तो महाराज, मुझे तो ये बताओ जो जिन्दगी भर कुकर्म करे वह कैसे मुक्त हो? क्योंकि गल्तियाँ तो सबसे होती हैं। राम से, कृष्ण से, राधा से, सीता से, रुक्मिणी से जितने भी महापुरुष हुए गल्तियाँ सबसे हुई हैं। नर और नारायण निवृत्त हैं, वह भी प्रवृत्त हो जाते हैं। सनकादि प्रवृत्त हैं, वह भी निवृत्त हो जाते हैं। प्रवृत्ति में निवृत्ति है, निवृत्ति में प्रवृत्ति है, न प्रवृत्ति है, न निवृत्ति है, प्रवृत्ति भी है और निवृत्ति भी है। ये जो ज्ञान का रास्ता है-निवृत्ति और प्रवृत्ति ये तो अप्राप्य है, मैं तो वह हकीकत पूछ रहा हूँ आपसे।
हर-हर महादेव शम्भो। काशी-विश्वनाथ शम्भो।
Monday, December 14, 2009
सौ प्रतिशत प्रवृत्त कोई है तो प्रकृति है
बैठ कर भोजन करें, खड़े होकर कभी भी नहीं करें। इस तरह से मैंने तुम्हें बैकुण्ठ बताए, स्वर्ग बताए, नर्क बताए और मुक्ति भी बताई। प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग दोनों मार्ग बताए। ये शास्त्रों की कथा है तो बहुत सुन्दर है महाराज। लेकिन आप खुद जानते हैं कितने लोग हैं जो प्रवृत्ति को जानते हैं और प्रवृत्ति पर चले हैं? है कोई एकाध? शास्त्र में जो प्रवृत्ति बतलाई हैं, कोई एक भी आदमी दुनियाँ में हैं जो उस प्रवृत्ति मार्ग पर चला है। नहीं है। हो ही नहीं सकता। और जो निवृत्ति बताई है कोई एक भी है, जो पूरी तरह निवृत्त हो। सत्य यह है कि सौ प्रतिशत प्रवृत्त कोई है तो प्रकृति है, सौ प्रतिशत निवृत्त कोई है तो-पुरुष है तीसरा तो कोई न हुआ, न है, न होगा। हरे रामा.........................................
Sunday, December 13, 2009
जैसा खाते हैं वैसी बुद्धि बनती है .
भगवान को स्मरण करे अपने भोजन में से पाँच आहुतियाँ अग्नि देव को अर्पित करें। फिर भोजन देवताओं को निवेदन करें
'त्वदीयमस्तु गोविन्दम् तुभ्यमेव समर्पये''।
ऐसे भोजन करने से हृदय के रोग, ब्लड़ के रोग और दिमागी परेशानी कम होती है। ये डायबिटीज+, सुगर, ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, ये क्यों हो रही हैं? बिना नहाए-धोए, बैठे-उठे, लोग भोजन करते हैं। खड़े होकर पानी पियोगे तो डायबिटीज+, सुगर और ल्यूकोरिया बनेगा। आज-कल ज्यादातर आदमी खड़े होकर ही खाते हैं। बाजार में खड़े-खड़े बोतल पियेंगे तो बीमार शरीर बनेगा ही। डायबिटीज+ बनेगा, ल्यूकोरिया बनेगा, किड़नी और लीवर खराब होंगे। क्योंकि जो तुमने खड़े होकर खाया और पिया है वह सीधा जाकर आँतों पर बोझ बन जाता है, आँतें कमजोर होती हैं तथा ेमगनंस नाड़ियों पर वजन पड़ता है ये खराब होती हैं। इसीलिए जो आदमी ज्यादा मौडर्न है वह ज्यादा खतरनाक है, खराब है। बैठे करके भोजन करने से पेट की आँतें पूरा काम करती हैं। बैठकर भोजन करें, लेकिन अपने घुटने और पंजे को पेट से चिपका के नहीं दूर रख के। खड़े होकर भोजन करने से गधे जैसी बुद्धि बनती है। आज-कल आदमी जल्दी बूढ़ा हो जाता है जैसे गधा जल्दी बूढ़ा हो जाता है। पहले सत्तर साल का आदमी भी जवान है और आज का सत्रह साल का लड़का भी बूढ़ा हो गया।
हरे रामा.........................................
Thursday, November 26, 2009
चित्त क्या है ?
अंतः चतुष्टय का प्रमुख अंग है चित्त। महाराजजी कहते हैं, चित्त ही बंधन है और निर्विषय होकर आत्मा में लय हुआ तो मुक्ति है। इसकी ग्यारह वृत्तियाँ होती हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, एक ग्यारहवाँ अहंकार। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पाँच ज्ञानेन्द्रियों के विषय हैं। मलत्याग, सम्भोग, गमन, भाषण, लेन-देन ये पांच कर्मेन्द्रियों के विषय। मैं- मेरा, तू-तेरा ये अहंकार के विषय। ये सब इनका क्षेत्रज्ञ आत्मा से कोई लेना देना नहीं है। ये चित्त में से ही पैदा होती है। चित्त पर अंकित छाप ही जीव को विभिन्न योनियों में भटकाती है। अलग अलग सम्प्रदाय अलग अलग तरीके से पूजा के तरीके अपनाते हैं। अगर गम्भीरता से चिंतन करें तो पाते हैं कि विभिन्न नामकरण होते के बाद भी सभी यह अवश्य स्वीकारते हैं कि चित्त पर अंकित छाप के अनुसार ही जीव के कर्मों के लेखे जोखे का फल मिलता है। कयामत के दिन नेकी और बदी के फरिश्ते जिस बही को लेकर बैठेंगे क्या वह हमारा चित्त ही है? पतांजलि ने भी चित्त वृत्ति निरोध को ही योग कहा है।
