Monday, April 27, 2009
गीता आज भी उपयुक्त व अनुकरणीय है।
गीता आज भी उपयुक्त व अनुकरणीय है।
Monday, February 9, 2009
श्रीमद् भगवद् गीता से उद्धृत
अध्याय १७ श्लोक १६
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भाव संशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥
अनुवादः- मन की प्रसन्नता, सौम्यता का भाव, मनन शीलता, मन का निग्रह और भावों की भली भाँति शुद्धि, यही मन का तप कहलाता है।
गूढ़ार्थः- भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि तप तीन प्रकार के होते हैं- मन, शरीर तथा वाणी के। इनमें से वाणी का तप के विषय में प्रभु श्रीकृष्ण के द्वारा कहे गए श्लोक का गूढ़ार्थ अक्टूबर माह में प्रकाशित हो चुका है। प्रभु कहते हैं कि मन को हर परिस्थिति, घटना, देश, काल, वस्तु, व्यक्ति आदि के संयोग अथवा वियोग में प्रसन्न रखना मन का सबसे बड़ा तप है। ऐसा तब सम्भव है कि जब व्यक्ति स्वयं को दुर्गुण दुराचारों से मुक्त कर ले। संसार में हर वस्तु, व्यक्ति चलायमान है आने-जाने वाले हैं। जब हम इन्हें अपनी प्रसन्नता का आधार बनाते हैं तो इनके आने जाने से प्रसन्नता भी अस्थायी हो जाती है। मन में हलचल होती है। तो हमें अनित्य को छोड़ नित्य निरन्तर रहने वाले प्रभु का सहारा लेना चाहिए। मन जब राग, द्वेष, स्वार्थ, अभिमान जैसे नकारात्मक भावों से मुक्त हो जाता है तथा मन में दया, क्षमा, उदारता तथा सभी के हित के सकारात्मक भावों का संचार होता है, तब मन में सौम्य हो जाता है। फिर मान-अपमान, लाभ-हानि, दोषारोपण आदि का साधक को कोई फर्क नहीं पड़ता वह हर हाल में सौम्य तथा सम रहता है। 'मौन' का अर्थ यहाँ वाणी के मौन से नहीं 'मन के मौन' से है ÷वाणी के मौन' से नहीं अन्यथा यह वाणी के तप के अन्तर्गत आता। इसका अर्थ है मन में द्वन्द्व ना हो कोई हलचल ना हो। शास्त्रों, पुराणों तथा सन्त-महापुरुषों की वाणियों का तथा उनके गहरे भावों का मनन होता रहे, सद्विचार तथा सभी के कल्याण का भाव मन में सदा बना रहे यही मन का मौन है। 'आम्तविनिग्रह' का अर्थ है मन तेल की धार के समान सतत एक ही प्रभु का चिन्तन करे मन सांसारिकता से हटकर स्वतः ही प्रभु की ओर लगे। उस पर साधक का इतना नियन्त्रण हो कि वह उस जहाँ से हटाना चाहे हटा ले तथा जहाँ भी लगाना चाहे, लगा ले। 'भाव संशुद्धिः' का अर्थ अपने स्वार्थ तथा अभिमान का त्याग तथा परहित का भाव होना। इस प्रकार मन की मुख्यता जिस तप में होती है उसे मन का तप कहते हैं।
Saturday, November 29, 2008
मुझको मेरी पहचान पाने में क्या बाधा है?
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
अनुवादः- प्रभु श्री कृष्ण कहते हैं कि जो आत्मा इस संसार में जीव रूप में है वह मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन तथा पाँचों इन्द्रियों को अपना मान लेता है।
गूढ़ार्थः- यह श्लोक अति महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रत्येक जिज्ञासु की इस जिज्ञासा को शान्त करता है कि मैं कौन हूँ? मेरा क्या है? मैं कहाँ से आया हूँ? और मुझको मेरी पहचान पाने में क्या बाधा है? यहाँ भगवान कहते हैं कि जीव परमात्मा का शाश्वत अंश है "ईश्वर अंश जीव अविनाशी" उसकी इस संसार से कोई एकता नहीं क्योंकि यह तो प्रकृति है, उसी का कार्य है। जीवात्मा इस संसार में जब शरीर धारण करता है तभी से उसे संसार के बंधनों में जकड़ा जाने लगता है। उस पर अपने माता-पिता के नाम, जाति, कुल, गोत्र, देश, रिश्ते आदि के लेबल लग जाते हैं। यह सब इतनी सहजता से होता है कि जीवात्मा भ्रमित हो जाता है और अज्ञानवश इस शरीर की इन पहचानों को ही अपनी पहचान मानने लगता है। वह शरीर, मन, इन्द्रियाँ आदि से एकता मान कर परमात्मा के अंशी आत्मा से जीव बन जाता है। यहाँ जब श्री हरि स्वयं यह कहें कि प्रत्येक जीवात्मा मेरा ही अंश है तो यह हम सबके लिए कितने हर्ष का विषय है! परमात्मा हमें कितना प्रेम करते हैं। हमसे कितनी आत्मीयता रखते हैं। परन्तु हमारी निष्ठुरता तो देखिए। हम परमात्मा से विमुख होकर संसार की ओर आकर्षित हो जाते हैं व मन-इन्द्रियों के दास बन जाते हैं। मन व इन्द्रियाँ हमारी कभी सगी नहीं होतीं। हम चाहें कितना भी प्रयास करें वे संतुष्ट नहीं होतीं हमारी सारी ऊर्जा, समय व धन हम इन्हीं को सन्तुष्ट करने पर लुटा देते हैं, जबकि इन सब पर असल अधिकार परमात्मा का है, जिसकी कृपा से हमें यह सब प्राप्त हुआ है। परन्तु स्वरूप के विस्मरण के कारण ही हम संसार में भ्रमित होते फिरते हैं। सच यह है कि संसार सत्य है ही नहीं क्योंकि सत्य तो शाश्वत होता है जबकि संसार में सब कुछ चलायमान व क्षणभंगुर है। अपने पद, मान, सामान, मकान, जमीन, सौंदर्य, शक्ति, कुल आदि का अभिमान मिथ्या है ये हमारी असली पहचान नहीं बन सकते क्योंकि ये हमारे विजातीय है इनसे हमारा सम्बन्ध हो ही नहीं सकता। हम परमात्मा का अंश है तो हममें भी उसी के गुण व्याप्त हैं- परमात्मा अजर, अमर, अविनाशी, अकर्त्ता, अभोक्ता है जबकि इन सभी उपरिलिखित वस्तुओं में जरा, मृत्यु, विनाश, कर्तापन व भोक्तापन है। अतः हमारी पहचान कुछ और ही है जो इस संसार में पहचानी जाने वाली हमारी पहचान से परे हैं। वह है हमारी आत्मा-शुद्ध चैतन्य, सत्चित् आनन्द स्वरूप, अजर-अमर अविनाशी
मुझे मेरे स्वरूप के ज्ञान में क्या बाधा है? इस प्रश्न का उत्तर भी इस श्लोक में है- यहाँ यह जान लें कि हम हैं ही आत्मा, बस हमें अपने स्वरूप का विस्मरण हो गया है। अर्जुन ने कहा है-"स्मृतिर्लाब्धा नष्येमोहः।'' अर्थात् अब मुझे स्मृति हो गई है ;अपने स्वरूप की और मेरा मोह रूपी अज्ञान नष्ट हो गया है। स्मरण हो जाने से विस्मरण स्वतः ही चला जाता है बस बाधा है मोह की, अज्ञान की। यह अज्ञान भी क्या है? जीव संसार के सम्मुख हो गया इसमें संसार कारण नहीं, और परमात्मा से विमुख हो गया इसमें परमात्मा कारण नहीं दोनों ही दशाओं में जीव स्वयं ही कारण है। परमात्मा का अंश होने के कारण स्वतंत्रता उस जीव का गुण है। उसे मानने न मानने का अधिकार है। और इसी का दुरुपयोग उसने किया अब उसका सदुपयोग भी उसे ही करना होगा। इसके लिए साधक को श्री भगवान द्वारा तीन मार्ग बताए गए हैं- पहला जो संसार से मिला है उसे संसार की सेवा में लगा दे, निष्काम व निरहंकार होकर। यह मार्ग है कर्मयोग। दूसरा- स्वयं को शरीर और संसार से बिलकुल अलग कर ले अर्थात् ज्ञान योग। तीसरा- स्वयं को ही भगवान के अर्पण कर दे जो है भक्ति योग। तीनों में से कोई भी मार्ग अपना ले फल एक ही-मुक्ति।
Wednesday, November 5, 2008
Shrimad Bhagawat Gita Chapter 17 Verse 15
Swadhyayabhyasanam chaiv vangmayam tap uchyate.
Translation : -
The speech that is truthful, pleasing, beneficial and does not agitate anyone and also reading and reciting sacred text from scriptures are called Austerity of speech.
Purport :-
In this verse describing the austerity of speech the supreme Lord says that one's speech should be such that it does not arouse in anyone at any time any agitation or disturbance; which is true and is told without vanity or selfishness to others to make them understand; which is loving, sweet, simple and peaceful; which displays the qualities of love, kindness, forbearance and benevolence and which is not meant to harm any one at any time.
As is said Man should speak truth and pleasing words. He should utter words which are true but not unpleasant; and which are pleasant but not untrue. This is Sanatan Dharma (Eternal Religion).
The Guru tells story in this connection. Once a sage saw a cow rushing madly near his Ashram. A man also came running after the cow. seeing the sage he asked him if he had seen the cow. The sage understood in one glance that he was a butcher and if he told him in which direction the cow had gone he would surely kill her. But he could not utter a lie. so he said "One who saw (the eye saw) can not speak, and the one who can speak (the tongne can speak), did not see. Thus in spite of telling the truth he saved the cow.
Now, on examining we shall find that it is possible to speak such words only if man's heart is free from violence, jealousy, hatred or enmity and he is averse to talking ill about others or insulting other. such a person is always full of divine love for all.
Besides, studying and teaching scriptures, Vedas, Upnishadan, Bhagwat, Mahabharat etc. for spiritnal development of self and others is called svadhyaya or self-study.
Reciting and repeating such text over and over again, to memorise it, chanting the holy name and praying to god again and again is called abhyas or 'practise'.
practising all these and exercising restrain in speech (ie neither speaking nor reading anything nonsense) is called penance (Tapah) of speech.
Monday, September 22, 2008
कर्म करो तो भगवान दूर नही
भटके हम भगवान से नहीं, अपने फ़र्ज़ से भटक गए हैं। हम भगवान से दूर नहीं हुए हैं, अपने-अपने फ़र्ज़ को भूल गए हैं। इसलिए उससे दूर हो गए ऐसा अनुभव करते हैं। बस फ़र्ज़ को पकड़ लें, वो तो हैं ही हमारे पास में। अपने कर्म को करो, भगवान दूर नहीं हैं। ब्रह्मा ने तप किया। भगवान ने उनके हृदय में दर्शन देकर ब्रह्मा को आदेश दिया कि मेरा ध्यान करते हुए सृष्टि की रचना करो।
ब्रह्मा ने अविद्यादि पाँच वृत्तियों को उत्पन्न किया- सनकादि रिषि उत्पन्न किए, जो सन्यासी हो गए। क्रोध उनके भौंहों के बीच से उत्पन्न हुआ, लाल और नीले रंग के रूप में जिससे रुद्र भगवान प्रकट हुए। रुद्र बोलते हैं- कम्पन को, ध्वनि को। जानते हो दुनियाँ क्या है? एक कम्पन है। जिन्दगी क्या है? कम्पन है। कम्पन है तो जीवन है, नहीं तो जीवन खत्म हो गया। कोई भी चीज खत्म नहीं होती। कम्पन से उत्पन्न होती है, कम्पन से ही समाप्त हो जाती है। कम्पन हर समय, हर जगह है। कम्पन ही धरती में, गगन में, वायु में, खाली स्थान में भी है। इसलिए खाली जगह छोड़ना धर्म है। जगह को भरना धर्म नहीं है। अपने दिमाग को जितना खाली रखोगे, उतने ही धर्मात्मा होते जाओगे। यही रुद्र भगवान का कहना है। जगह को खाली नहीं छोड़ोगे तो रोओगे, पछताओगे। झगड़ा किसका? जगह को भरने, पकड़ने का ही तो झगड़ा है। कोई कुर्सी चाहता है, कोई जमीन, कोई मकान को जकड़ना चाहता है, पकड़ना चाहता है। इसी से सारी क्लेष है।
साधु कौन है? जिसने किसी को पकड़ा हुआ - जकड़ा हुआ नहीं है। जो किसी से जकड़ा हुआ नहीं है, वही साधु है और नहीं तो स्वादु है। तीन चीजों के लिए रोता है आदमी- एक नाम के लिए, एक जमीन के लिए, एक ब्याह के लिए। तीन ही तरह के रोने हैं। रुद्र भगवान भी रोए, बोले मुझे नाम दो, जमीन दो और मेरा ब्याह करो। तो उन्हें ग्यारह नाम दिए गए, ग्यारह स्थान दिये और ग्यारह शक्तियाँ दी गईं। जमीन के लिए जो रो रहा है वह साधु नहीं है, मान के लिए या स्त्री के लिए रो रहा है वो भी साधु नहीं। जिसने नाम, जमीन और स्त्री तीन चीजों की पकड़ छोड़ दी, वह सन्त हो गया। ब्रह्मा जी ने देखा कि इनकी सृष्टि तो आपस में झगड़ा कर रही है, तो बोले "बेटा! जिस घर में झगड़ा हो, वह घर छोड़ देना चाहिए।'' तो शमशान में बैठ गए और आत्म चिन्तन करने लगे। फिर ब्रह्मा जी ने मानसी सृष्टि की। जिसमें वाणी की देवी सरस्वती उत्पन्न हुईं। अपनी मानसी पुत्री पर ब्रह्मा जी मुग्ध हो गए, मोहित हो गए। सरस-रसीली.... सरस्वती पर। ब्रह्मा कहते हैं-बुद्धि को।
बुद्धि अगर रसीली बातों में घूमी हुई है, तो समझो बर्बाद है। जिन बातों से रस टपकता है, उनमें बुद्धि रत हो जाए तो बुद्धि का नाश होता है। जिन गीतों में से रस टपकता ह,ै उनसे बुद्धि का नाश होता है और आज कल जो आदमी फोन लगाकर या माइक लगा कर या कैसे भी रसीले, स्वाद-स्वाद के गीत सुनते हैं, उनमें बुद्धि मिलेगी ही नहीं। बुद्धि वो जो उलझे हुए विषय को सुलझाए और आजकल का आदमी.... जिसमें बुद्धि से काम करना पड़ता है उसे सुनना नहीं चाहता है और आज कल के गीत भी ऐसे ही हैं जिनमें दिमाग न लगाना पड़े जो सीधे-सीधे यूँ ही पहुँच जाएं। जिसमें दिमाग़ लगाना पड़े, जिनमें ज्ञान की बात मिलती हो वो गीत ही खत्म हो गए हैं। सब गीत हैं, सीधे-सीधे, सपाट-सपाट, गँवारपने के। इसलिए आदमी में बुद्धि नहीं रही। रसीले, स्वादभरे गीत सुन रहा है। और उसे उनमें स्वाद आ रहा है तो समझना कि यह लड़का, यह आदमी बर्बाद हो गया।
यदि तुम चाहते हो कि हम समझदार बनें, ज्ञानी बनें तो स्वाद के गीत और बात छोड़ देना जिनमें दिमाग़ लगाना पड़े, वही बात सीखना, वही गीत सुनना। ब्रह्मा का जीवन बर्बाद हो गया। बुद्धि खत्म हो गई। फिर रिषियों के कहने पर ब्रह्माजी ने शरीर छोड़ दिया और दूसरा शरीर धारण किया। अर्थात दूसरी बात, दूसरा तरीका पकड़ा। जिसमें दिमाग़ लगाना पड़ता है वही बात करो, वही बात सुनो और जिसमें दिमाग़ नहीं लगाना पड़ता वो बात छोड़ दो, वो गति छोड़ दो।
Sunday, September 14, 2008
भागवत कथा अंक 14
जैसे पानी से लहर पैदा होती है, पर अलग दिखती है। ऐसे ही जगत परमात्मा से उत्पन्न होकर दिखता है।
मैं' कौन हूँ, इसको जानने के लिए, पहले जानो कि मुझे क्या करना है?
अपने-अपने कर्त्तव्य को पकड़ लें तो भगवान तो दूर हैं ही नहीं।
जाकी रही भावना जैसी.......... प्रभु मूरती देखी तिन तैसी।
......... जब भी बताने वालों ने बताया कि ये परमात्मा जगत रूप में कैसे दिखा? जैसे चिंगारी और आग क्या अलग-अलग हैं? नहीं! फिर भी आग चिंगारी के रूप में दिखती है। जैसे-जल और लहर दो हैं क्या? नहीं हैं न! फिर लहर क्यूँ दिखती हैं। ऐसे ही, "है परमात्मा ही परमात्मा'' फिर भी जगत दीखता है। जैसे पानी से लहर पैदा होती है पर अलग दिखती है। जैसे आग से चिंगारी पैदा होती है फिर भी अलग दिखती है। ऐसे ही जगत परमात्मा से उत्पन्न होकर अलग दिखता है लेकिन कुछ अलग नहीं हुआ। पानी ही पानी है, आग ही आग है, कुछ अलग नहीं है। ऐसे ही परमात्मा ही परमात्मा है, जगत अलग नहीं है।............. विस्त्रत के लिए देखें.......http://bhagawat-katha.blogspot.com/
Thursday, August 7, 2008
श्रीमद भागवत कथा अंक 13
गतांक से आगे....
...........जो ज्ञानी होता है, वह अपने से बड़ी आयु और बड़ी जाति वालों में भी पूज्यनीय होता है। ज्ञानी चाहे किसी भी जाति का हो पूज्य है। क्योंकि बिरादरी चमड़ी की होती है और ज्ञान बुद्धि का। बुद्धि किसी जाति विशेष की नहीं होती ज्ञान से होती है।
जाति न पूछो सन्त की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान॥
ज्ञान के लिए बुद्धि देखनी चाहिए और भोग के लिए जाति देखनी चाहिए। लड़के लड़की का रिश्ता करना है, तो जाति कुल, अंश-वंश इनको देखो। परन्तुु यदि ज्ञान प्राप्त करना है तो जाति कुल नहीं सिर्फ बुद्धि को देखो। ...... विस्त्रत के लिए इस लिंक पर क्लिक करें ................ http://www.bhagawat-katha.blogspot.com/
