आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Saturday, March 21, 2009

जिज्ञासा और समाधान 2

जिज्ञासा- महाराजजी नीतिवान और धर्मज्ञ भी क्यों अपने ज्ञान के विपरीत कार्य कर जाता है? धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति परेशान रहते है और बेईमान मजे मार रहे है, ऐसा क्यों हो रहा है? -कविता उपाध्याय, अलीगढ़

समाधान- स्वभाव के कारण ऐसा हो जाता है। मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों से उसका स्वभाव बन जाता है। उसका यह स्वभाव उससे ज्ञान के विपरीत कार्य करा देता है। इसीलिए तो गोस्वामी जी ने कर्म को प्रधानता दी है। ÷÷कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ............... ........'' सब कुछ इस पर आधारित है। कर्म जो हो चुका वह प्रत्यक्ष में हमें नहीं दिख रहा। हमें प्रत्यक्ष में वह स्वभाव रूप में दिखता है, लेकिन उसका मूल तो कर्म ही है। प्रारब्ध को तो स्वीकारना पड़ेगा। लेकिन प्रारब्ध के मूल में भी तो कर्म ही है। इसलिए सद्कर्म करो। क्योंकि पुरुषार्थ सर्वदा श्रेष्ठ है। हमें दिखने वाली परेशानियां उसके प्रारब्ध हो सकते हैं। लेकिन पुरुषार्थ के बल पर स्वयं के तेज से प्रारब्ध को निस्तेज किया जा सकता है।

Thursday, March 19, 2009

जिज्ञासा और समाधान


जज्ञासा- महाराजजी, धर्म को लेकर बहुत सी बातें कही जाती हैं। वेद कुछ कहते हैं, लोकाचार कुछ कहता है जबकि व्यवहार में देखने पर कुछ और ही सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए। किसे वरीयता दें? -कु० पूनम नई दिल्ली

समाधान- जिनके जीवन में धर्म श्रेष्ठ है, उन महापुरुषों का संग करो। धार्मिक व्यक्ति के जीवन में इन तीनों की एकरूपता होगी। जिस के जीवन में इन तीनों की एकरूपता नहीं वह धार्मिक नहीं हो सकता। हां धर्मान्ध हो सकता है। सूक्ष्मतत्व इन्द्रियों की पकड़ से बाहर है। बुद्धि ज्ञान पर आधारित होने के कारण धर्म का निर्णय करने में सक्षम नहीं है। इसलिए सद्शास्त्र सम्मत जीवन जीने वाले सद्पुरुष का सत्संग को वरीयता दें।

जिज्ञासा- माराजश्री कृपया यह बजाएं कि आध्यात्मिकता और धार्मिकता में क्या अंतर है। -बचन सिंह तेवतिया

समाधान- मंजिल और रास्ते का। आध्यात्मिक होना लक्ष्य है जबकि धर्म के रास्ते पर चलकर व्यक्ति नैतिक होता है और वही आध्यात्मिकता सिखाती है।

Tuesday, October 7, 2008

जिज्ञासा और समाधान

जिज्ञासाः- महाराजश्री, रामचरित मानस में एक चौपाई "संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अतिप्रिय लागे॥'' में शिव के १५ नेत्रों का वर्णन किस आधार पर महाकवि तुलसी दास ने लिखा है -योगेन्द्र सिंह, नगला संतोषी।

समाधानः- भगवान शिव के पांच मुख हैं तथा प्रत्येक मुख पर तीन नेत्र इस प्रकार पांच गुणा तीन अर्थात शिव के पंद्रह नेत्रों का वर्णन महाकवि तुलसीदास ने किया है, जो अत्यंत प्रिय लग रहे हैं।

जिज्ञासाः- महाराजश्री स्वास्तिक चिह्‌न का विश्लेषण तथा अर्थ बताने की अनुकम्पा करें। साथ ही यह भी बताने की अनुकम्पा करें कि आप अब तक कितनी कथाओं को विरचित कर चुके हैं? -रघुराज सिंह बैनीवाल, हिन्दौन

समाधानः-स्वास्तिक शब्द दो शब्दों का मेल है। स्व एवं अस्ति। यह स्वयं के अस्तित्व का प्रतीक है। यह मंगल चिह्‌न माना जाता है। इसमें चारों ओर निकलने वाली रेखाएं चारों दिशाओं की द्योतक हैं, जो प्रत्येक दिशा में बढ़ती हुई उर्ध्व की ओर प्रयासरत होती प्रतीती होती हैं। इसके केन्द्र में आत्मा का स्थान है। इस प्रकार यह सत्य का प्रतीक भी है। जहां तक कथाओं की गिनती का प्रश्न है उसके बारे में बस इतना कह सकते हैं कि संख्या बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण है कि कितने लोगों ने उस पर अमल किया। फिर भी आपकी जिज्ञासा के लिए लगभग ६५० कथाएं अब तक हो चुकी हैं।

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