आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Monday, April 19, 2010

आएगा जब तू संतों के द्वार...............


तू इधर जो निकले, तेरे मिट जाऐं सारे अंधेरे,

तू नहीं अकेला, सब मिल के हैं यहाँ जुटे रे।

सन्तों की महफिल में रह, फिर ना भटक पाएगा॥

सुन अभिमानी...

जीवन सँवर जाएगा, सुन अभिमानी।

आएगा जब तू संतों के द्वार...............

जानता नहीं है, सारी दुनियाँ है मतलब का फेरा,

कोई ना किसी का, ये जीवन है जोगी का फेरा।

क्या तेरा, क्या मेरा? अमरत को पा जाएगा॥

सुन अभिमानी.... जीवन सँवर जाएगा, सुन अभिमानी।

आएगा जब तू संतों के द्वार.................

हंस वर्ण है तेरा, क्यूँ चलता है कागा की चालें,

धीर सिन्धु तज के, क्यूँ पकड़े बबूलों की डालें।

भूल नहीं, कबूल यही हरे रुद्र पा जाएगा॥

सुन अभिमानी.........

आएगा जब तू संतों के द्वार महक उठेगा तेरा सब संसार

जीवन सुधर जाएगा, सुन अभिमानी॥

Thursday, April 8, 2010

सब कुछ मिला है, आपके भण्डार से गुरु।


रिक्त लौटा है न कोई, आपके इस द्वार से तो।

आत्म-बल टूटे न मेरा, प्रार्थना है ये गुरु जी।

आत्म-सुख सन्तोष पाने, मैं यहाँ पर आ गई हूँ॥

दिव्य अभिनव ज्योति पाकर धन्य हो गयी हूँ॥

सब समय, सब कुछ मिला है, आपके भण्डार से गुरु।

क्यों रुके हम? साधना के, क्षेत्र में बढ़ने से आगे।

सत्य, शिव, सुन्दर सभी तो, मैं यहाँ पर पा गई हूँ॥

दिव्य अभिनव ज्योति पाकर धन्य हो गयी हूँ॥

प्रस्तुति : अंजलि शर्मा अलीगढ

Tuesday, April 6, 2010

दिव्य अभिनव ज्योति पाकर धन्य हो गयी हूँ॥


गुरु द्वार पर अब तो मैं आ गई हूँ।

दिव्य अभिनव ज्योति पाकर धन्य हो गयी हूँ॥

कामना मेरी यही है, गुरु कृपा मुझ पर बनी रह।

चिर अमां की रात में भी, ज्योति पूनम सी बनी रह।

आपके चरणों में गुरु जी, स्वयं अर्पित हो गई हूँ॥

दिव्य अभिनव ज्योति पाकर धन्य हो गयी हूँ॥

ज्ञान गंगा में नहा कर, जी उठे हैं प्राण मेरे।

त्याग-तप-निष्ठा सभी तो, आपने सिखला दिए हैं।

कुछ नहीं है कामना बस, आपके दर आ गई हूँ॥

दिव्य अभिनव ज्योति पाकर धन्य हो गयी हूँ॥

प्रस्तुति : अंजलि शर्मा अलीगढ

Sunday, July 5, 2009

रुद्रवानी

तेरौ अचला चल चल डौले, कहा करि लेगी लगोंटिया रे।
बाहिर ओढ़ै भीतर छोड़ै। बाहिर जोड़ै भीतर तोड़ै॥
अन्तर पट नां खोलै, कहा करि लेगी लगोंटिया रे॥ १॥
बाहिर साधू, भीतर स्वादू। बाहिर ब्रह्म, ज्ञान मन व्यादू॥
काम क्रोध झक झोरै, कहा करि लेगी लगोंटिया रे॥ २॥
बाहिर कौ कछु काम न आवै। राम के नाम हराम कमावै॥
ये तराजू न तौले, कहा करि लेगी लगोंटिया रे॥ ३॥
अन्त समय जो भरियौ सो आबै। चतुराई छूटै फिरि पछि तावे॥
काल करम जब घोलै, कहा करि लेगी लगोंटिया रे॥ ४॥
मन कौ संयम अचला होवै। प्रज्ञा बुद्धि लंगोंटी होबै॥
'रुद्र' प्रमाणित बोलै, कहा करि लेगी लगोंटिया रे।
तेरौ अचला..............................................

Friday, April 24, 2009

तुम्हारे प्रेम का सागर, उमड़ता है हृदय में अब।


अंधेरा छोड़ कर मैंने, उजाला पा लिया देखो।

जो विष के घूँट चिर पीऐ, वही अमृत बना देखो॥

अंधेरा..........................

अंधेरा जब भी घिर आए, पुकारो नाम तुम उनका।

तुम्हें अपना बनाने को, जमीं पर आऐंगे देखो॥

अंधेरा.........................

तेरी रहमत से हे! भगवन्‌, तुम्हारी मैं पुजारिन हूँ।

शरण में आ गई देखो, प्रभु अजमा के तुम देखो॥

अंधेरा..........................

यहीं श्र(ा की गाड़ी में, किनारा पा लिया मैंने।

द्वेष सब मिट गए मन से, सहारा पा लिया मैंने॥

अंधेरा............................

तुम्हारे प्रेम का सागर, उमड़ता है हृदय में अब।

मनुजता की मलाई का, करम करके तो तुम देखो॥

अंधेरा..............................

लिखी है कृष्ण ने गीता, और तुलसी ने भी रामायण।

महाभारत लिखी जिसने, उसे पढ़ कर तो तुम देखो॥

Wednesday, April 22, 2009

अंधेरा छोड़ कर मैंने, उजाला पा लिया देखो।

अंधेरा छोड़ कर मैंने,

उजाला पा लिया देखो।

जो विष के घूँट चिर पीऐ,

वही अमृत बना देखो॥

अंधेरा..........................

अंधेरा जब भी घिर आए,

पुकारो नाम तुम उनका।

तुम्हें अपना बनाने को,

जमीं पर आऐंगे देखो॥

अंधेरा.........................

तेरी रहमत से हे! भगवन्‌,

तुम्हारी मैं पुजारिन हूँ।

शरण में आ गई देखो,

प्रभु अजमा के तुम देखो॥

अंधेरा..........................

प्रस्तुति : श्रीमती अंजलि शर्मा

Tuesday, April 14, 2009

विष न घोलो प्यार में, चलते बनो ......

विष न घोलो प्यार में, चलते बनो।
जीत मानो हार में, चलते बनो॥
धूप, बरखा या कि फूलों का मौसम।
प्यार हो व्यवहार में, चलते बनो॥
तरह-तरह की सज गयी हैं दुकाने।
क्रेता आते कार में, चलते बनो॥
जागने के लिये उपवास करते।
सो लिये संसार में, चलते बनो॥
तितलियों के फूल सपने देखते।
झाँको न मन के द्वार में, चलते बनो॥
गाँव वाले मुझे अपना समझते।
प्यार मुश्किल प्यार में, चलते बनो॥
यह नया युग है, नये हैं लोग भी।
सुख न काम-विकार में, चलते बनो॥
प्रस्तुति : रमेशचंद्र शर्मा 'चन्द्र'डी-४, उदय हाउसिंग सोसाइटीबैजलपुर, अहमदाबाद

Tuesday, March 10, 2009

भूले न 'रुद्र' तेरी भक्ति,

दामन में कभी काँटों से
जीवन को सआना होगा।
पतझड़ में बसा दिल अपना
कलियाँ को भुलाना होगा।
लहरों को बनाकर कस्ती,
हर क्षण तेरी याद की मस्ती
भूले न 'रुद्र' तेरी भक्ति,
तेरे चरणों सी हस्ती॥
जीवन..................................

Sunday, March 8, 2009

जीवन तो धर्म का जीवन है,


जीवन तो धर्म का जीवन है, कर्मों का बन्धन है

धारा कब दूर नदी से, ईश्वर कब दूर खुदी से।

संयम कब दूर हदी से, कब जीव है दूर गति से।

जीवन....................................

जीवन के सफर में जानें कितने मकाम आते हैं

कितने आँसू दे जाते, कितने बहार लाते हैं।

प्यारे प्यारे दुःख डो, हँसते रोते मुखड़ों से

दिल के हंसीन टुकड़ों से खमोश खिले अधरों से।

जीवन.....................................

Sunday, February 8, 2009

धरा स्वर्ग सी बने


बने हम सभी सृष्टि के सिपाही।

धरा स्वर्ग सी बने और

सुंदर बन जाये संसार॥

प्रेम....................

प्यार ही है जगत में सार।

प्राणी को दो ये सुन्दर वरदान॥

प्रेम....................

सच्चा प्यार अमर कर दो।

प्रेम की मदिरा हमें पिला दो॥

प्रेम....................

गुरु की सेवा राम की पूजा।

गुरु पद रज की सादर, पूजा करा दो॥

प्रेम....................

स्वर्ग रत्नों की नहीं चाहना।

गुरु को गले लगा लो गुरु जी॥

जोइँ दोनों हीथ।

प्रेम का दो हम को वरदान॥

Thursday, January 8, 2009

मुझको अपने गले लगलो ...............


प्रस्तुती : शशि बाला अग्रवाल,

33, सरस्वती विहार अलीगढ़ 0571-2743847

यहाँ मैं अपनी एक कविता प्रस्तुत करना चाहती हूँ:

भ्रूण हत्या पर गर्भा से कन्या कह रही है {यह कल्पना की गई है}

मुझको अपने गले लगले ईया मेरी प्यारी मां

तुमको क्या बतलौं मैं की तुमसे कितना प्यार है॥

भाई से कुच्छ ना मंगु मैं,ना पापा से आस करूँ।

अपने बाल पेर जिंदा रहकर, जीवन से संघर्ष करूँ॥

कभी किरण बेदी बनकर सेवा से नाता जोड़ू।

तुमको क्या समझौं मैं की तुमसे कितना प्यार है,

मुझको अपने गले लगलो...............

कभी बनू शुषमा स्वराज मैं, और काबी इंदिरा गाँधी,

कभी बनू मैं मायावती तो, और कभी सनसनी पारी।

कभी बनू मैं प्रतिभा पाटिल,टन मान तुझ पेर वरुण॥

तुमको क्या बतलौं मैं की तुमसे कितना प्यार है।

मुझको अपने गले लगलो....................

मान मेरी टू कहा मान ले, तेरा मान हर्षित कर डून,

दुनिया मैं आ जाने दे टू, उँचे पद पेर कम करू,

चाहे कुच्छ भी बन जौन मैं, मनसा प्युरे कर डून॥

कैसए हो एहसास तुम्हे की, तुमसे कितना प्यार है।

मुझको अपने गले लगलो ...............

Friday, January 2, 2009

क्रान्ति मशाल मेरे राष्ट्र को थमा दो।


अपने ही बीजों का बोयेगें पौधा।

पौधों से निर्मित वृक्ष बनेंगे॥

रूपान्तर अपने को करते रहेंगे।

दिशा........................................॥

त्याग और बलिदान का भाव हैं आप तो।

क्रान्ति मशाल मेरे 'राष्ट्र' को थमा दो॥

क्रान्ति मशाल मेरे राष्ट्र को थमा दो।

दिशा.........................................॥

Thursday, January 1, 2009

पीड़ा पतन प्रभु मेरे मिटा दो।


प्रेम और पौरुष की ज्योति हैं आप तो।

पीड़ा पतन प्रभु मेरे मिटा दो॥

पीड़ा पतन प्रभु मेरे मिटा दो।

दिशा......................................॥

हम भी खिले थे कभी मुरझा गए हैं।

मुरझा गए पर, गिरे तो नहीं हैं॥

अधिक और निर्माण करके रहेंगे।

दिशा......................................॥

प्रस्तुति : अंजलि शर्मा

Tuesday, December 30, 2008

मरुस्थल को मेरे मधुवन बना दो।


शक्ति पराक्रम प्रतिमा हैं आप तो।

सद्गुणों की भावना हम में जगा दो॥

सद्गुणों की भावना हम में जगा दो।

दिशा.................................॥

शौर्य और साहस का संगम हैं आप तो।

मरुस्थल को मेरे मधुवन बना दो॥

मरुस्थल को मेरे मधुवन बना दो।

दिशा.....................................॥

Monday, December 29, 2008

वाणी का अमृत हमें भी पिला दो।


दिशा हीन है हम दिशा खोजते हैं।

दृष्टि लगाए हम, तुम्हें देखते हैं॥

दिशा......................॥

धरती पे देखा मानवता लुप्त है।

पोषण ज़रा तुम उसे तो करा दो॥

पोषण ज़रा तुम उसे तो करा दो।

दिशा........................॥

अमृत कलंश है आपकी वाणी।

वाणी का अमृत हमें भी पिला दो॥

वाणी का अमृत हमें भी पिला दो।

दिशा............................॥

प्रस्तुति : अंजलि शर्मा

Thursday, December 25, 2008

ए लव्य तू मन को सँभाल जरा,


दल दल को थल समझ रहा

गहरे में ना धँस जाना,

जब 'रुद्र' तुम्हें पुकारें तो

तुम ढूड़े से ना मिलो वहाँ।

ए मन मौजी.............॥

'रुद्र' ने तुम्हें आगाह किया

ए लव्य तू मन को सँभाल जरा,

क्यों इसको इतना बिगाड़ लिया

ना इस पर तुमने विचार किया।

एै मन मौजी..........................॥

आगरा से कु. लव्यता द्वारा प्रेषित भजन

Wednesday, December 24, 2008

ऐ मन मौजी मनुआ मेरे मेरे साथ भी वक्त गुजार

ऐ मन मौजी मनुआ मेरे

अब मेरे साथ भी वक्त गुजार,

बहुत दिनों से तेरी मेरी

मिल जुल कर ना बात हुई।

भोगो की इस दुनियाँ में

तू तो इतना मस्त हुआ,

नेकी का जो काम मिला

वो भी तूने भुला दिया।

एै मन मौजी............॥

Tuesday, December 23, 2008

खून के प्यासे हैवानों ने दुनिया में आतंक मचाया।


खून के प्यासे हैवानों ने दुनिया में आतंक मचाया।

मजहब के ठेकेदारों ने मौत का खेल रचाया॥

अमरीका ने इन आतंकी पिल्लों को पाल बढ़ाया।

जिन्होंने बदले में पेंटागन पर ही जहाज चलाया।

इसमें जलता रहा है भारतवर्ष अनेको वर्षों से।

पश्चिमियों को चिन्ता हुई है केवल कल परसों से॥

खुदगर्जी वो चाह रहे हैं दुनिया की बरबादी।

दुनिया को इन हत्यारों से कब मिलेगी आजादी॥

प्रस्तुति : राजकुमार बघेल

Wednesday, December 17, 2008

प्रभु की लीला अपरम्पार


प्रभु की लीला अपरम्पार,जिसका है नहीं कोई बखान।

उंच नीच का भेद नहीं कुछ,वो प्राणी मात्र में है एक समान।

कण कण में वो बसा हुआ,तिनके तिनके में है, उसकी जान।

दुनिया का जीवन दाता है,उसकी दया मेहर का है प्रमान।

उसकी मर्जी के बिना,चल नहीं सकता ये जहान।

उसे हर दिल हर पल की खबर,उसकी सत्ता है महान।

वो अपने अंतर में मिलता है,ग्रन्थ शास्त्रों में है पहिचान।

चौरासी के चक्कर से छूट जाएगा,गर सन्त वचन को लेगा मान॥

प्रस्तुति : राज कुमार बघेल

Friday, December 12, 2008

बारम्बार नमन [ विकल की कविता]


कवि विकल जी की लेखनी से रचित भारत भूमि को अभिनंदित एक कविता

हे ऋषियों की तपोभूमि तेरा शत्‌ शत्‌ वन्दन,

तेरे कण-कण को है मेरा बारम्बार नमन्‌।

गंगा यमुना सरस्वती मिलि, कल कल नाद करें,

धर्म अर्थ औ काम मोक्ष-श्रुति में संवाद भरें।

सत्यम्‌ शिवम्‌ सुन्दर करते तुझसे परिरम्भ्ण.....

हे ऋषियों की तपोभूमि....॥१॥

देवभूमि! हैं तुझे समर्पित ऋद्धि सिद्धि औ निद्धि,

करती निर्मल सदा ज्ञान से, सकल विश्व की बुद्धि।

मनसा वाचा और कर्मणा शिव संकल्पित मन.....

हे ऋषियों की तपोभूमि....॥२॥

परम पवित्र स्वर्ग सीढ़ी, पीढ़ी-पीढ़ी पावन,

तेरी रज ऋषियों-मुनियों के माथे का चन्दन।

करते प्रकृति विराट् अहर्निशि तेरा अभिनंदन.....

हे ऋषियों की तपोभूमि....॥३॥

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