आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Wednesday, December 26, 2012

बड़े दिन की हार्दिक शुभकामनाएं।


२५ दिसम्बर बड़ा दिन, प्रकाश से जगमग होते गिरिजे तथा गिरिजों में तिमिर के शमन को तथा प्रकाश के आलोक को बिखेरने के लिए स्वयं को तिरोहित करती हुईं जलती मोमबत्तियां। बहुत कुछ कह जाता है है प्रभु यीशु का यह जन्मोत्सव, जिसे दुनियां की बहुत बड़ी आबादी बड़े दिन के रूप में मनाती है। इस बड़े दिन की सभी सुधी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
साथियो, तुलसीदास जी मानस में लिखते हैं- बड़े भाग मानुष तन पावा.। यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिलता है। इस जन्म को पाकर मनुष्य पूर्णता भी प्राप्त कर सकता है और सब कुछ खो भी सकता है। अन्य योनियों में यह सम्भव नहीं है। सूर्य के प्रकाशित रहने की अवधि के काल के अनुसार देखें तो इस दिन से पूर्व सबसे छोटा दिन होता है। अर्थात अंधकार की मात्रा के बढ़ने का जहां चरम आता है, प्रकाश की अवधि जब निम्नतम अवधि पर होती है। तब परमेश्वर अंधकार को तिरोहित करने के लिए अपने पुत्र को धरा पर भेजता है, इस संदेश के साथ अब बहुत हो चुका, जाओ और चहुंओर प्रकाश का आलोक फैला दो। वह आता है प्रकाश फैलाने और अंधकार से स्वयं को ओतप्रोत कर चुके हम अधम पापी जीव उसी को सलीब पर टांग देते हैं। किन्तु वह दयालु फिर भी हम अधमों के कल्याण की कामना करता है और पुनः जी उठता है।
उसको मानने वाले और न मानने वाले दानों ही उसकी पूजा तो शुरु कर देते हैं लेकिन उसके वचनों का पालन करने में बड़े कृपण बने रहते हैं, मोमबत्ती तो जलाते हैं, उसके प्रकाश को देखकर बड़े हर्ष का अनुभव भी करते हैं लेकिन मोमबत्ती के उस मर्म को नहीं समझते कि किस प्रकार हमें प्रकाशित करने के लिए उसने स्वयं को समाप्त कर लिया है। हमें वही मोमबत्ती बनना होगा। स्वयं को जलाकर किसी को राह दिखाने पर ही हम मैरी क्रिसमस कहने वाले सच्चे जीवात्मा हो पाऐंगे।
इसी मास की आखिरी तारीख को वर्ष २०१२ का अंत हा जाएगा। इस अंतिम बेला में हमें स्वयं को आइना दिखाना होगा। हम अधम हैं, पापी हैं, नीचे की ओर गिरना हमारा गुण है। जितने गिरने थे गिर लिए आओ प्रभु यीशु के जन्म का समय है बड़ा दिन है अब गिरना बंद और उठना प्रारम्भ करें तो देर नहीं है।
शेष नियमित फीचर्स एवं महाराजजी द्वारा विरचित श्रीमद् भागवत को समाहित किए यह अंक प्रतिदिन आपके जीवन में बड़ा दिन लेकर आए इसी कामना के साथ..............संजय भइया

Wednesday, November 14, 2012

एक दीप जलाना ही होगा


दीपावली के पावन पर्व पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। दीपावली का पर्व, पर्वों का समूह है तथा भिन्न भिन्न आधारों पर भिन्न भिन्न सम्प्रदायों द्वारा एक ही स्वरूप से मनाया जाने वाला त्यौहार है। दुनिया भर के लोग इस स्याह रात के तिमिर को दीप जलाकर तिरोहित करते हैं।
दुनिया के सभी धर्मों में अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की बात कही गयी है। अंधकार का स्वामी शैतान माना जाता है और प्रकाश का गुरु। अंधकार झूठ का प्रतीक है और प्रकाश सत्य का। सार्वभौम जगतगुरु सूर्य अपने दैदीप्तमान प्रकाश के कारण ही सर्वत्र पूज्य है।
सूक्त वाक्य ÷तमसोमा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्ममा अमृतगमय' कहता है कि हमारी यात्रा अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर होनी चाहिए। जब जन्म है तो मृत्यु निश्चित है। अतः अमरत्व तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम जन्म को प्राप्त न हों। और बार बार जन्म लेने से बचना तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम स्वयं पूर्ण प्रकाशित न हों। पूर्ण प्रकाशित होकर ही स्वयं को उस दिव्य प्रकाश में समा पाना सम्भव है।
दीपावली के पर्व पर हम केवल दरवाजों पर दीप ही नहीं जलाते वरन अपने घरों की सफाई भी करते हैं। हमारे घरों में जमे हुए कबाड़ को निकालकर इस दिन हम बाहर फैंक देते हैं। दीपावली की रात्रि में पूजन के उपरांत प्रातः पौ फटने से पहले हमारे घरों की माताएं सूप को पीटकर आवाज देती हैं कि लक्ष्मी का आगमन हो रहा है अतः दरिद्र तू चला जा।
कचरा निकलने पर ही मां लक्ष्मी घर में प्रवास करती हैं। दीप जलने से   अंधकार भाग जाता है। यह व्यवस्था जिस प्रकार घर में है ठीक उसी प्रकार हमारे अंदर भी है। अंदर अगर पूवाग्रहों का कचरा भरा है तो मां लक्ष्मी कहां निवास करेंगी। पहले हमें अपने अंदर से कचरा निकालना होगा। यह कचरा है हमारे संस्कारों का। कई लोग कहते हैं कि ये संस्कार तो हमें विरासत में मिले हैं या कि हमने बड़े जतन से एकत्रित किए हैं, इन्हें कैसे निकाल दें। क्या घर में से जो कबाड़ निकाला है, वह भी जतन से ही एकत्रित किया था। हमें आगे बढ़ना है, प्रकाश लाना है तो एक दीप जलाना ही होगा.................................संजय भइया

Monday, June 13, 2011

हर जगह ज्ञान है हर जगह आनन्द है

.....बजह यही है कि मछली के अन्दर पानी पहुँच नहीं पा रहा है। पानी में है, बाहर भीतर पानी है। कबीर दास जी ने कहा है, कि
"पानी बिच मीन प्यासी, मोहे सुन सुुन आवत हाँसी''
हर जगह ज्ञान है हर जगह आनन्द है फिर भी आदमी मूर्ख है और दुखी है। वजह क्या है? कि मछली उलटेगी तो उसके मुँह में पानी आऐगा। मछली नहीं उलटेगी तो भले ही पानी में ही है, पर प्यासी मरेगी। हर जगह परमात्मा है, हर जगह ज्ञान है फिर भी मूर्ख होकर, दुःख से आदमी मर रहा है। उलटना नहीं जानता।
उलटना यही है-"मैं' को छोड़कर के, गुरु की तरफ। कोई भी महापुरुष हो जो हमारी दिशा को बदल सकते हों, उनकी तरफ समर्पित होना चाहिए। इस लालच से नहीं कि इन्होंने मुझे दिया है तभी मैं इनके लिए समर्पित होऊँ। कोई भी ज्ञानी पुरुष हो, कहीं भी हो सभी के लिए समर्पित होना चाहिए। ये उन के लिए समर्पण नहीं है ये अपनी आत्मा के लिए, अपने ज्ञान के लिए अपने आप के लिए समर्पण होता है। अपनी जिन्दगी के लिए होता है।
बात वहीं पर चल रही थी। जिन्दगी को चलाना बड़ी बात नहीं है। मक्खी, मच्छर भी जी लेते हैं। गधा होता है, वह भी पूरी जिन्दगी जी लेता है, बड़े मजे से जीता है। सबसे बुरा सुअर होता है, वह भी पूरी जिन्दगी जी लेता है, बड़े मजे से जीता है लेकिन जिन्दगी किसके लिए? उलटने के लिए। जो उलटना सीख गया। उलटना कहो या सुनना कहो एक ही बात है, ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है जैसे ही तुम उलटे तुम्हारा कल्याण हुआ।
"उल्टा नाम जपा जग जाना''
बाल्मीकी चोरी डकैती, बदमाशी करते थे, किसी की सुनते ही नहीं थे। महात्मा आऐ-ऐ ठहरो, ठहर गए। क्या है तुम्हारे पास? यहीं रख दो। उन्होंने कहा भईया हम तो अपनी लड़की की शादी के लिए जमीन बेच करके लाए हैं, मर जाऐंगे, बारात आई है। कोई सुननी नहीं है, दूसरे को समझना ही नहीं है। जब दूसरे को सुनना नहीं है और फिर जब सुना और समझा तो-
"बाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।''
शास्त्रों को सुनों और समझो। हम से जो बड़े बूड़े है, उनसे सुनो और समझो। बड़े लोगों को सुनना और समझना। हर माँ-बाप को अपने बच्चे को यही सिखाना चाहिए। लेकिन माँ क्या सिखाती है-चाची से मत बोलियो, चाचा से मत बोलना, अम्मा बहुत दुष्ट है, चाचा के लिए पचती है। बाबा तेरा बहुत खराब है, उसे गाली देता है। मम्मी खुद बाहियात है तो औलाद तो वही बनेगी। गुरु खुद बाहियात है कहता है,÷÷उस कथा में मत जाना।'' कुछ ऐसे गुरु हो गए हैं, जो कहते हैं कि गीता मत सुनना, रामायण मत सुनना, मन्दिर मत जाना, वेद मत सुनना, घण्टा मत बजाना, बाबा जी के पास मत जाना। बाहियात मम्मी-पापा, बाहियात हो गए बाबा जी और गुरु। चेला और औलाद का फिर क्या होगा?

Monday, May 23, 2011

ज्ञान तो सब में है, उसका अभाव नहीं है.....


बादल होते हैं, मौसम बनता है, हमारे भीतर भावना के बादल बनेंगे और वो बादल क्या करते हैं? पता है। आसमान को ढ़क लेते हैं फिर आसमान क्या करता है, पता है उसके भीतर जो भी है वो बादलों का देकर वर्षा देता है। तो उससे तुम्हारे भीतर छिपा हुआ जो सतगुरु हो वो तुम्हारे कल्याण के लिए जितनी भी अमृत की छींटें हैं, जितनी भी बारिस है, जितनी भी उसके पास है, उसको देगा, भर देगा उसको। आज तक कोई भी ज्ञान को पैदा करने वाला नहीं हुआ। ज्ञान तो अनन्त है, अखण्ड़ हैं, शाश्वत है, उसके कोई टुकड़े नहीं हो सकते, उसका कोई अभाव नहीं हो सकता।
"नासतोविद्यतेभावः नाभावोविद्यते सतः॥''
असत्य वस्तु की कोई सत्ता नहीं, सत्य वस्तु का कोई अभाव नहीं। ज्ञान तो सब में है, उसका अभाव नहीं है। कोई विद्वान है, कोई गुरु है, कोई संत है, समझदार है, ये सब क्यों है? ये ऐसे ही हैं जैसे पानी समुद्र में है। पानी के भीतर मछली प्यासी है। ऐसा नहीं है मछली को पानी नहीं मिल रहा है, जब कि पानी के बिना मछली हो ही नहीं सकती है। ज्ञान के बिना कोई जीवन हो ही नहीं सकता है। ज्ञान चेतना है, जीवन भी चेतना है। अरे जहाँ जिन्दगी है, वहाँ ज्ञान जरूर होगा और लेकिन नहीं दीख रहा है, तो बजह क्या हो सकती है?

Saturday, April 23, 2011

शब्द की विस्मृति याद है...........

याद रखना! शब्द का याद रहना याद नहीं है। शब्द की विस्मृति याद है। जब तक हमारे दिमांग में शब्द बन रहे हैं, तब तक कपड़े हैं। जब तक हमारे दिमांग में विचार बन रहे हैं, तब तक कपड़े हैं और तुम शब्दों को और विचारों को उतार दोगे, तो गुरु तो तुम्हारे भीतर बैठा हुआ है। ये कपड़े हैं, गुरु थोड़े ही है, ये तो ठवकल है। गुरु तो भीतर है। भगवान कहते हैं कि सुदामा सद्गुरु सबके हृदय में बसा हुआ है।
ये तो ठवकल है, ये तो धोखा भी हो सकता है, गुरु तो अमर होता है, साश्वत होता है। गुरु का मतलब होता है, ऐसी चीज जो तुम्हें अपनी तरफ खींच ले। जिसे हतंअपजंजपवद कहते हैं, जिसे गुरुत्वाकर्षण शक्ति कहते हैं, जिस में ज्यादा शक्ति होती है, जो चीज ज्यादा ताकतवर होती है, जो चीज ज्यादा वजनदार होती है, उसी चीज को खींच लेती है। जब तुम नियम से रहोगे, सुनोगे तो गुरु के पर्व पर जाओ। तब गुरु के कहते ही तुम कपड़े उतरे हुए मेरे पास आओ तो मैं तुम्हें वहीं दुंगा जो तुम्हारे कल्याण के लिए है, जो तुम्हें चाहिए, फिर तुम्हें किसी की जरूरत नहीं पड़ेगी।
एक दिन गोपियाँ डर रही हैं कपड़े के बिना, पर हम डरते हैं कि अपनी बात नहीं कही तो हम गुरु की सुन नहीं पाऐंगे। गुरु नहीं समझ पाऐगा कि मेरा चेला बहुुत पढ़ा लिखा विद्वान था। हम अपने आप को दिखाना चाहते हैं वो भी अपने आपको दिखाना चाहती हैं, अपनी हकीकत को सुनाना चाहती हैं। जब तक हम आपको अपने दिल से जीवन का कल्याण होगा उसे छुपाऐंगे तो कुछ नहीं मिलेगा। और जब सोचेंगे कि इनको हमारी गलती दिख गयी है तो दुनियाँ भरके शब्द जोडेंगे, दुनियाँ भर की बात जोड़ोगे। तुम सीख क्या रहे हो, तुम तो गुरु के गुरु बन रहे हो, पापा के पापा बन रहे हो, मम्मी की मम्मी बन रहे हो, बड़ो के बड़े बन रहे हो।
जब तक बड़े बन रहे हो, मत आना, घर ही रहो। और जब बड़ों की मानना सीख लो तब सन्त शरण में आना।
"संत मिलन को जाइए, तजि माया अभिमान।
ज्यों-ज्यों पग आगे बढ़े, कोटिन्ह यज्ञ समान॥
माया अभिमान त्यागने का मतलब ये थोड़े ही है कि अपनी मकान, दुकान, जमीन, जायदाद, गुरु के नाम कर दो। ऐसा नहीं है! मन में जो तुम्हारे में भरा हुआ है कि "मैं', 'मेरा', 'मैं बढ़िया हूँ', ये सारी बात छोड़कर जाना। ये है आषाढ़ की गर्मी, कपड़े उतारने पडेंगे, न सुन्दर हो, न पढ़ा लिखा हो, न विद्वान हो, न जमींदार हो, न नम्बरदार हो, ये सब उतार सकते हो तो ही जाना।

Thursday, February 17, 2011

सुनाने की इच्छा को छोड़ दो......


बुद्धि को सुधारने की जरूरत नहीं है। गलत आदत को सुधारने की जरूरत नहीं है, केवल सुनाने की इच्छा को छोड़ दो तो तुम्हारे अन्दर कोई गलत आदत नहीं है। जो हमारे यहाँ ज्ञान है, वह श्रवण से आता है, सुनने से आता है। ज्ञान कहाँ से आता है? सुनने से। जब बच्चे को तुम स्कूल भेजते हैं, तो कॉलेज के सारे नियमों पर चलता है कि कैसे कपड़े होने चाहिए, कब आना चाहिए, कैसे बैठना चाहिए, सारे कानून को, सारे नियम को जब अपने ऊपर ओढ़ लेता है, तो उसी तरीके से जैसे मास्टर उसको पढ़ाते हैं, उनको जैसे सिखाते हैं, बैठना, बोलना, उसी तरीके से क्लास में करता है। और फिर उसके गुरु का, टीचर का दिया हुआ जो पूरा का पूरा ज्ञान है, उसको भीतर कर लेता है। कुछ नहीं करना है, गुरु को सुनने वाले बन जाओ, केवल सुनने वाले।
तुम कथा सुनते हो परीक्षित की। परीक्षित ने कुछ नहीं किया केवल सुना और मुक्त हो गया। सुनने से ही मोक्ष होगा। और सुनाने से ही आदमी गंवार होगा। सुनाने से ही आदमी कीबुद्धि के अन्दर जो कॉन्सन्ट्रेशन होता है, जो बुद्धि के अन्दर ऐकाग्रता होती है, जो दिल के अन्दर बहुत गहराईयाँ होती हैं, वो डिस्टर्व हो जाती हैं।
तुम कहोगे कि शुकदेव जी से तो परिक्षत ने सुना और उसका मोक्ष हो गया। शुक देव जी ने सुनाई? शुक देव जी ने नहीं सुनाई, जो घटना होती है उसे बताते जाते हैं, सुनाते नहीं हैं। शुक देव जी ने सुनाया नहीं। जो उनके अन्दर हो रहा था उसको बता देंगे, देखा ऐसा-ऐसा हुआ है, ऐसा-ऐसा होता है। ऐसा आदमी जब अपनी बात को कहता है तो उसमें खोया हुआ होता है। उसको सोचने की जरूरत नहीं है। शुक देव जी ने कुछ सोचा नहीं है, जो कुछ उनके अन्दर घटित होता रहता था, उसको बताते रहते थे। वही बात सबके अन्दर एक जैसी घटित होती है।
जरूरी नहीं है कि मेरे भीतर कुछ और, और तुम्हारे भीतर कुछ और, तीसरे के भीतर कुछ और हो। सब को भूख लगती है, सबको प्यास लगती है, सबको दर्द होता है, सबको दुःख होता है, तकलीफ होती है, सब एक जैसी चीज है, कोई अलग नहीं है, तो शुक देव जी के अन्दर जो घटित हो रहा था, उनके अन्दर जो चल रहा था, उसको परिक्षत को कह रहे थे। कहते-कहते चुप भी होगए, क्योंकि जहाँ दर्द और दिल दो होते हैं, तो बात होती है और जहाँ दिल ही बोल जाता है, दर्द ही दर्द रह जाता है, तो कौन किससे मिले। कथा बन्द हो गई।
भगवान शंकर पार्वती जी को कथा बता रहे हैं। प्रवचन नहीं कर रहे हैं, बता रहे हैं कि "पार्वती हनुमान जी लंका जलाकर के सीता जी को राम जी की खबर देकर के लौट कर के आए, भगवान के शरण में पहुँचे, दण्डवत किया, प्रणाम किया प्रभु के चरणों में। राम जी ने उनको आर्शीवाद दिया। शंकर जी बता रहे हैं- प्रभु कर पंकज कपि के दीशा, सुन कथा मगन गौरी सा। 'प्रभु कर पंकज कपि के दीशा' प्रभु के कर कमल हनुमान जी के सिर पर। 'सुन कथा मगन गौरी सा' कथा बन्द हो गई शंकर जी की समाधी लग गई। दर्द ही दर्द रह गया, दिल खो गया। दर्द क्या था?
भगवान शंकर राम जी के भक्त थे। और हनुमान जी शंकर जी तो बने राम जी की सेवा करी। भक्त को अपने भगवान की शरण मिल जाए। जो शिष्य अपने गुरु के लिए तड़पता है, उसे अपने गुरु की शरण मिल जाए, खतम हो गया सब कुछ, उसकी दौड़ खतम हो गई। एक नदी चल रही थी। बडे-बड़े पहाड़ों से जूझती हुई पेड़ों से जूझती हुई, और बड़े-बड़े ऊँचे नीचे रास्ते और ऊँचाईयों से जूझती हुई कहीं नहीं रुकती। बड़े-बड़े बांध बनाऐंगे नहीं रुकती, लेकिन जब समुद्र मिल गया, तब रुकेगी। जब गुरु मिले बात खतम हो गई, प्रभु मिले बात खतम हो गई, समुद्र मिला बात खतम हो गई।
भगवान कृष्ण कहते हैं कि "अर्जुन जब तक गढ्ढ़े मिलते हैं। डोलते रहते हैं। जब प्रभु मिलते हैं फिर कोई पाप नहीं रहता, फिर कुछ नहीं रहता। जब तक नींद नहीं आती है, तो बेचैन रहते हैं और जब नींद आ जाती है, तो कुछ करते हो? कुछ नहीं करते। फिर करना खतम हो जाता है, तो शुक देव जी ने कहा नहीं है, शंकर जी ने कहा नहीं है, तुलसीदास जी ने कहा नहीं है, संतों ने कोई प्रवचन नहीं दिया। जो हुआ है जो उनको पता है, देखा है ऐसा होगा, जो हो रहा है उसको कह रहा है वो सन्त है।
जिसके अन्दर हुआ नहीं उसको कह रहा है, वह कहना है उसमें तुम्हें कुछ मिले या नहीं मिले कोई जरूरी नहीं है। संत वो जिसके अन्दर कुछ घटित होता है, जिसके अन्दर वो चीज चल रही है, जिसके भीतर सारे के सारे अनुभव हैं तो शुक देव जी ने भी सुना। शंकर जी बता भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं। शुक देव जी बता भी रहे हैं और सुन भी रहे हैं क्योंकि आनन्द ले रहे हैं पूरा। अगर कहने का आनन्द नहीं लेते, बताने का आनन्द नहीं लेते तो समाधी कैसे लग जाती। शुक देव जी, शंकर जी की समाधी कैसे लग जाती, आनन्द कैसे आता है।
दर्द कैसे आता है, भाव कैसे बनता है, जो कहने में धर्म है, वो कह नहीं रहा है। कहने में अहंकार आ रहा है। कितनी बढ़िया कथा कह रहा है। होई कहेगा मैंने ऐसा प्रवचन किया कि सुनने वाले लोग कन्नी काट गए, उंगली दबा गए ऐसा। खुद ही जो रास्ते से भटक जाऐं, खुद ही जिनकी बुद्धि उल्टी हो गई है, उसे क्या सुधार लेगा। तो इसलिए बात सबसे पहली है कि जब बच्चा स्कूल जाता है, तो स्कूल के क्या नियम हैं, सारे नियमों को अपने स्वभाव में ढाल ले। और मास्टर क्या कहते हैं, उसको सुने, तो गुरु शिष्य के भीतर उतर जाता है। जब सुनने की इच्छा हो जाती है। सुनने लायक हो जाता है, तो ज्ञान और बढ़ जाता है, जब नदी को समुद्र मिल जाता है, तो नदी पूरी हो जाती है। जब शब्दों को भाव मिल जाता है, तो शब्द बन जाते हैं।

Tuesday, December 14, 2010

ज्ञान की शुरूआत होती है, सुनने की इच्छा से.......



अब इसमें सबसे पहले चीज आती है, सुनने की इच्छा। पिछले गुरूपूर्णिमा पर्व पर यही कहा था कि ज्ञान की जो शुरूआत होती है, वो सुनने की इच्छा से होती है। और जिसकी सुनने की इच्छा नहीं है, जिसको सुनने की इच्छा नहीं है, उसकी सारी बुद्धि उल्टी। क्योंकि जब आदमी सुनता है, तभी बोलना सीखता है, तभी उसके अन्दर कोई चीज आती है और सुनना नहीं जानते तो तुम कुछ सीख नहीं पाओगे और कुछ ऐसा हो जाऐगा, जिससे सुनने की चाहत ही नहीं होती। और सुनना ही चाहता है, बोलना नहीं चाहता तो उसकी इच्छा ही नहीं है, तो ज्ञान कहाँ से शुरू हुआ? हमारे यहाँ ज्ञान की जो शुरूआत है 'श्रवण' से है।


'श्रवण' का अर्थ है सुनना। पहले लोग सुनते थे। अब लोग सुनते ही नहीं हैं, इसलिए बोलते नहीं हैं। कोई बोलना जानता है? नहीं जानता। कोई नहीं बोलना जानता। बोलने की मालुम कब पड़ती है? जहाँ खाने पीने की, लेने-देने की, देखी-सुनी बात नहीं हो। उसके बारे में बात कही जाती है। खाने की, पीने की, लेने की, देने की, देखी, सुनी बाते हैं। धर्म क्या है? नीति क्या है? धर्म दिखेगा नहीं, सुनी हुई चीज है, धर्म के बारे में तुम जानते हो? नहीं जानते। कोई जानता है? सुना जरूर है। किसी से पूछो धर्म क्या है, तो कोई बता सकेगा? क्यों कि ये सुनने से आता है। ये महापुरूषों के पास बैठने से आता है, ये उनकी सेवा करने से आता है। सुनने की इच्छा सब बदल देती है। शुरूआत लेकर आती है। तुम्हारी जिन्दगी किस के लिए है, ये तुम्हारे लिए अहम चीज है। सुनने की इच्छा, लेकिन मेरे मन के भीतर ऐसे कपड़े हैं, मेरे मन के भीतर ऐसी दीवार बनी हुई है, मेरे मन के भीतर ऐसी चीजें भरी पड़ी हैं, जो कहती हैं कि,÷÷मैं जिस बात को कहुँगा वही सही है। और मैं नहीं कह पाया तो बहुत गलत हो जाऐगा।'' ये जो आदमी के अन्दर उल्टी चीज हैं, ये जो आदमी के अन्दर उल्टा वहम है, ये जो आदमी के अन्दर अपने को श्रेष्ठ योनी मान लेने की बात है। जब तक ये आग्रह नहीं जाऐगा तब तक ज्ञान की श्रेणी में प्रवेश नहीं कर सकते हो, चाहे तुम जज हो, कलैक्टर हो, प्ण्।ण्ै हो, च्ण्ब्ण्ै हो, प्रॉफेसर हो, प्रिंसीपल हो, हो सकता है कि तुमने पूरा देश ही टॉप किया हो और तुम संसार के पहले आदमी हो, लेकिन यहाँ उसका कोई महत्व नहीं है। तुम संसार के सबसे बड़े आदमी संसारी चीजों के लिए हो सकते हो, लेकिन जिन्दगी के बारे में कुछ नहीं जानते हो। हम बहुत बड़े वैज्ञानिक होते हैं, हम बहुत बड़े डॉक्टर होते हैं, हम बहुत बड़े प्रॉफेसर होते हैं, लेकिन जब अपनी समस्या आती है, तो फेल हो जाते हैं। ये जो हम पढ़ रहे हैं। बहुत सालों से पढ़ रहे हैं, लेकिन किसी वैज्ञानिक ने ैनबपकम ;आत्महत्याद्ध किया, माने कोई वैज्ञानिक अपने आप मर गया। वैज्ञानिक जो प्रकृति की बड़ी-बड़ी चीजों को जानते हैं, जिन्हें हम नहीं जानते। उन्होंने डवइपसम चीवदम बनाए, रेडियो बनाए, टी।वी सैट बनाए, और फोन बनाए, चन्द्रमा पर पहुँच गए। जो लोग चन्द्रमा पर पहुँच गये वो खोपड़ी कभी नहीं पहुँच पाती। क्यों? जान जाईए। ये बात बुद्धि की है, ये बात दिमांग की है, ये बात समझ की है। श्रवण की इच्छा। जिसके अन्दर श्रवण की इच्छा नहीं है, वो अपनी जिन्दगी के हर पहलू पर फेल होगा। चाहे कितना ही बड़ा अफसर हो, कितना भी बड़ा प्ण्।ण्ै हो। सुनने की इच्छा होती है, सही होती है, सही बुद्धि होती है, तो सुन भी सकता है और सुना भी सकता है। ऐसे कितने लोग हैं जो बोलना जानते हैं? नहीं जानते। सुनी हुई बातों को सुनाना जानते हैं। जो धर्म की चीज है, उसके बारे में बोल सकते है हैं? जिन्दगी की समस्या को नहीं सुलझा सकते। बड़े-बड़े ऊँचे मण्डलेश्वर हैं, महामण्डलेश्वर हैं, साधु हैं, महात्मा हैं, सब बड़े संयम नियम से रहते हैं। लेकिन अपने दिमांग के आगे सरैण्डर हो जाते हैं, फेल हो जाते हैं। दिमांग ऐसा बबण्डर बना देता है कि बड़े-बड़े योगी बड़े-बड़े ज्ञानी- ध्यानी की नींद नहीं, जिन्दगी बरबाद कर देता है। क्यों? कहाँ कमी रह गई। सुनने की कमी रह गयी, सुना, पर पूरा नहीं सुना। बहुत सुना, इसलिए बहुत समझ गए, लेकिन पूरा नहीं सुना इसलिए फेल हो गए। सुनने की इच्छा, सुनने की इच्छा होगी तो बुद्धि सही होगी और भुलाने की इच्छा विपरीत बुद्धि के बीच है।


Sunday, December 5, 2010

बीमारी से ज्यादा उसकी बजह को जानना जरूरी है।

बीमारी को जानना जरूरी नहीं हैं, बीमारी की बजह को जानना जरूरी है। हम लोग क्या करते हैं, बीमारीयों को जानते रहते हैं और बीमारी की बजह को नहीं जान पाते, ऐसे ही आज कल के डॉक्टर क्या हैं, जो मशीन बता देती है ये रोग है, उसी का इलाज करते हैं, लेकिन उसकी बजह नहीं जानते हैं, तो डॉक्टर के पास जाते रहते हैं, रोगी बनकर दवा खाते रहते हैं। थोड़ी देर के लिए कहता है कि दवा खाई तो बड़िया रहा, ठीक रहा। और दवा बन्द कर दी तो फिर बीमार होगया।

क्यों? रोग को देखा, उसकी बजह को नहीं देखा। रोग जान लिया रोग की बजह का नहीं जाना। हर माँ-बाप यही करता है कि अगर बच्चे के अन्दर खराब आदत हैं तो खराब आदत को लेकर माँ लड़ती है, उसको सुधारती है। पिता भी यही करता है, टीचर भी यही करता है। आज कल के सुधारने वाले लोग हैं, जो अपने आप को कहते हैं,"हम गुरू हैं, हम सुधारक हैं या हम धार्मिक लोग हैं वो सब गन्दी आदत को पकड़े हुए हैं। उसकी बजह को नहीं पहिचानेंगे तब तक ये आदतें नहीं जा सकती। तुम्हारे घर में पानी आ रहा है और तुम उलीचते रहो। ये ऐसा पानी है जो आना बन्द नहीं होगा। उल्टी बुद्धि आना बन्द नहीं होगी, तुम बन्द हो जाओ, वो अच्छी रहेगी। घर में जो पानी आ रहा है, आता रहेगा, कब तक उलीचोगे? तुम उलीचोगे और थक जाओगे और तुम जरा भी हारे, थके, सोऐ, तो तुम्हारे घर में पानी भर जाऐगा, दीवार गिर गई, छत गिर गई।

पानी आऐ नहीं वो बात करो। पानी का आना रूकना चाहिए। पानी आ रहा है, कोई बात नहीं है। पानी कहाँ से आ रहा है? क्यों आ रहा है। उस बात को जानना जरूरी है। पानी कहाँ से आ रहा है? पानी जब आता है, तो कभी कभी मालुम पड़ता है कि यहाँ से आ रहा है और कभी कभी मालुम नहीं पड़ता कहाँ से आ रहा है। अब तो खैर लोग पाईप लाइन से पानी बनाते हैं, लेकिन जब मैड़ बाँध कर पानी लगाने जाते हैं तो ऐसा होता था कि पानी एक खेत दूर जा कर फूट रहा है, तो जो पानी फूटने की वजह है, वो एक खेत पीछे है। जहाँ से पानी फूट रहा है, वहाँ से बन्द कर दिया, तो दूसरी जगह, फिर तीसरी जगह वहाँ से बंद किया, तो चौथी जगह, पता चला कि पूरी मैड़ तोड़ दी। अब मैड़ ही तोड़ दी तो क्या करोगे? पूरे घर को साफ कर दो, तब भी बंद नहीं होगा, मालुम पड़ा कि यहाँ से पानी जा रहा है। उल्टी बुद्धि कहाँ से आ गयी? जो लोग कहते हैं तुझ में बुद्धि नहीं है, सुधर जा। जो कह रहा है, वो खुद ही समझदार नहीं है, खुद ही सुधरा हुआ नहीं है। जो लोग गुरू बनते हैं, सिखाने वाले बनते हैं। मम्मी पापा हैं, जो खुद ही बिगड़ जाते हैं, खुद ही बिगड़े हुए हैं, तुम्हें क्या सुधारेंगे, बजह नहीं जानते। बजह न जानना ही विपरीत बुद्धि है। और बजह न जानना, केवल 'मैं' को बड़िया मानना, मैं जो सोचता हूँ बढ़िया है, मैं जो कहता हूँ बढ़िया है। मेरी बात को तुम समझते नहीं हो, मेरी परिस्थिती को तुम समझते नहीं हो, मैं ऐसा क्यों हो गया हूँ, तुम्हें पता नहीं। हमने अपनी जिन्दगी खराब कर ली अब पता नहीं खोपड़ी खराब करोगे, जिन्दगी खराब करोगे।

Tuesday, November 16, 2010

संत किसी भी रूप में मिल सकते हैं.......



कैसे पहचानोगे तुम? वो ही जब चाहेगा तभी तुम पहिचान पाओगे और नहीं चाहेगा तो तुम हजार किताबें पढ़ों, हजार चक्कर लगाओ नहीं पहिचान पाओगे। जिसके हाथ में बर्फ की सिल्ली है, तो वह आग की गर्मी क्या होती है कैसे जान पाऐगा? वो कहीं भी मिल सकते हैं, किसी भी रूप में मिल सकते हैं। संत मिल जाए तो, उसके कपड़ों पर मत जाना, उसके नखड़ों पर मत जाना, उसकी जगह पर मत जाना। तुम लोग ऐसी जगहों पर बहुत जाते हो। अगर मन्दिर में कोई बैठा है तो मान लेते हो कि कोई साधु ही होगा, कोई संत ही होगा। और तुम उसके पास जाते हो तो जो तुम्हारे हाथ हाथ मे है वो भी चला जाता है। तीर्थों में सोचते हो यहाँ तो अच्छे लोग रहते होंगे। तुम जगह देखते हो, तुम नाम देखते हो, तुम रूप देखते हो, तुम भेद देखते हो, भीतर क्या है? उसको नहीं देख सकते हो। उसको नहीं पहिचान पाओगे। इसलिए जो संत होते हैं, किसी मत के नहीं होते, धर्म के नहीं होते, किसी सम्प्रदाय के नहीं होते, किसी पंथ के नहीं होते। उन की जब कृपा होगी तो उनको तुम पूजोगे, लेकिन पूजने के लिए बात यही है, वहाँ तुम्हारे दिमांग में जो बैठा हुआ है, उसे बीच में मत लाना। अगर तुम्हारा दिमांग बीच में आ गया, तो तुम्हारी जिन्दगी का बहुत बड़ा खजाना था, उसे अपने आप खो दिया। फिर पता नहीं तुमको कितने जन्मों तक जुटाना पड़े, बात समझने की है, बात तपिस की है।


कृष्ण कहते हैं,"कपड़े उतारे हुए हो तो आ जाओ।'' लेकिन ये कपड़े दिमांग के होते हैं। दिमांग के कपड़े क्या हैं? वेदांत की भाषा में इसको अध्यास कहते हैं, शरीर का अध्यास। पतंजली इसको प्रत्यय या क्लेश भी कहती है। बात प्रत्यय की है। मानों ५ तरह के कपड़े हैं दिमांग में, या अगर बीमारी की कहो तो डॉक्टर से ५ तरह के रोग हैं। विपर्यय पहली बीमारी, पहला कपड़ा है। विपर्यय कहते हैं- उल्टी buddhi विपरीत बु(,ि उल्टी सोच। उल्टी सोच की बजह क्या होती है, वो अब जानना जरूरी है।

Thursday, November 11, 2010

बर्फ ओढ़ कर आग की तपिश नहीं मिलेगी........



लेकिन गर्मी कब मिलेगी? जब हम सामान्य रूप में जाऐंगे। आग के पास जाऐं और बर्फ ओढ़ कर बैठ जाऐं तो आग की तपिश कहाँ से मिलेगी? नहीं मिलेगी। जो आग की ताप है, टेम्प्रेचर है, वो बर्फ से ठण्ड़ा हो जाता है, बेजान हो जाता है। तुम बर्फ की सिल्ली लेकर गये और आग के पास बैठ गए तो कहेंगे कि आग ने तो कुछ नहीं किया हम तो ठण्डे ही रहे। ऐसे ही तुम किसी सन्त के पास में गए, किसी महापुरूष के पास में गए वो कोई भी हो सकते हैं, उनका कोई सम्प्रदाय नहीं होता, मजहब नहीं होता, कोई मत नहीं होता, कोई भेष नहीं होता कोई देश नहीं होता।


कोई ये कहे साधु तो गेरुए में ही मिलेंगे, नहीं, पेंट-सर्ट में भी रह सकता है, ट्रैक सूट में भी रह सकता है, सफारी सूट में भी रह सकता है, सलवार सूट में भी रह सकता है, नंगा भी रह सकता है, पागल भी रह सकता है। कलारी पर भी मिल सकता है, कोठे पर भी मिल सकता है। तुमने कथा सुनी होगी कि कोठे पर कोई सन्त रहता था, उसको वैश्या कहते थे लोग। लोगों की निगाहें उसी जगह पर ही होती हैं, भीतर नहीं होती, कोठे पर रहती थीं। वैश्याओं में रहती थी, वैश्या नहीं थी, कोठे वाली नहीं थी। उसके भीतर कोई कपड़ा नहीं था, मन पर कोई कवर नहीं था, कुछ नहीं था। जैसे तुम किसी शीशे के सामने हरा फूल रख दो, पत्ता रखोगे तो तुम कहोगे, "शीशा हरा है।'' शीशा हरा नहीं है, जो शीशे के पास में जो हरा पत्ता रखा हुआ है, हरा कपड़ा रखा हुआ है उसका हरा रंग है, शीशे का हरा रंग नहीं है। जैसे कोई संत कोठे पर रहता है तो वो कोठे वाले, कोठे वाले हैं। संत कोठे वालों में से नहीं हैं। उसमें उसका कोई भी रंग रूप, कोई भी लक्षण अवस्था, दोष, कुछ भी नहीं है।

Sunday, November 7, 2010

Who is Rudra?



Parma Bhagawat Divya Rudra is a divine personality whose dynamic philosophy endeares Him to masses wherever he goes. The good news is that he seldom stays at one place thus his mobility is a boon for the people belonging to different places where he goes to bless them with his divine presence and preachings.
His mobility is something visible to ones physical eyes but the equipoise and stillness within Him are seen only by His observant disciples who see Him with the eyes of ‘love’ or ‘gyan’.
He took his bodily form on 19th May 1958 at the Holy land of Braj in India. He took birth to continue His spiritual journey and to spread ight and peace. This became evident during His childhood only. When He was just six He came in touch with a saint to whom He used to go to offer his service. That saint used to say,”Bako bai mai hi mil jaego” (Everything has come out of Infinity and will return to Infinity). These mysterious words set Him on a quest for the Truth. That saint also made Him vow never to marry and never to enter a job. One day that holy saint left Him and Maharaj ji could never see him again but He always kept His vows. He has always been a thoughtful person having a keen insight into the innermost chambers not only of His divine self but also of the people around Him. This is what makes Shri Rudra, an Ahwan Akhara saint, a true Guru for a worthy seeker.
It is literally impossible to limit his teachings in words but He himself has termed that all that he says is aimed at teaching His humble disciples to learn the ‘Art of Dying’. Now, it may seem curious to some but here is a subtle message in it- if you remember that you have to die one day, you will know how petty the world and the worldly wealth are and this will certainly reap within you the divine fruit of vairagya, giving you peace of heart and mind and eventually letting you die in perfect peace remembering Him alone and attaining salvation.
This is just one gem of wisdom that comes from Him and He keeps showering so many everyday in His spiritual discourses, which appeal not only to heart but also to mind and intellect of the listeners, whom he lovingly calls ‘Shravaks’. We can only pray to the Holy Lord that His divine messages may benefit one and all. May all be influenced by the divine teachings of Guru and remain in the secure sphere of His pure thoughts forever………..

Tuesday, November 2, 2010

ख्वाब में भी बताते हैं

कैसे सुधरोगे? तुम तो बेकार हो बिल्कुल। इसलिए अपने दिमांग को बीच में मत लाना, कभी कोई महापुरूष आऐ तो अपने आप को खतम कर लेना। ऐसा नहीं कर सकते तो कम से कम-कम से कम फॉलो अनुसरण करना, पीछे चलना। वो क्या कहते हैं, समझ में नहीं आए तो चरण पकड़ लेना विनती करना, वो तुम्हें बता देंगे। और वो तुम्हें जुवान से नहीं बताऐंगे, कई तरीके से बताऐंगे-वो आँखों से भी बताते हैं, इशारों से भी बताते हैं, सोते हुए भी बताते हैं, बैठे हुए भी बताते हैं, ख्वाब में भी बताते हैं, नजदीक से भी बताते हैं, बहुत दूर से भी बताते हैं, उनकी हर अदा हमारे लिए शिक्षा होती है, अगर मन उसका अनुसरण कर सके, अगर उनको फॉलो कर सके। ये तुम्हारे लिए बहुत सकून की चीज होती है, और अगर तुम ऐसा कर सके और किसी महापुरूष की चरण की धूल भी मिल गयी तो तुम्हारे जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाऐगा, क्योंकि आग के पास जाते हैं तो अपने आप गर्मी मिलती है, बात सही है।

Thursday, October 28, 2010

जो हम अपने लिए चाहते हैं, वो दूसरे के लिए भी करें.......

लेकिन तुम ये नहीं सोचते कि ये फूल भी एक जिन्दगी है। इसकी भी कोई अहमियत है। जितना मैं अपने लिए फूल को चाहता हूँ, कि मेरी जिन्दगी के लिए जरूरी है। अपनी जिन्दगी के लिए किसी दूसरे की जिन्दगी को खराब करना, गुलाम करना, और किसी भी तरह उसको खराब करना, नुकसान पहुँचाना.............................
सोचना पडेगा कि अगर मेरे साथ ऐसा हो तो कैसा हो? मन यहाँ भी खतम नहीं होता, यहाँ भी कपड़े नहीं उतारता। हमें मर जाने दो, हमें तो बस यह फूल चाहिए। फिर क्या करोगे? लोग कहते हैं कि हमें वो चाहते हैं जो हम अपने लिए चाहते हैं, वो दूसरे के लिए भी करें। ये तो समझदार आदमी की बात है। हम अपने लिए बुरा नहीं चाहते तो दूसरे के लिए बुरा नहीं सोचते। कॉमनसैन्स की बात होती है।
अब कॉमन सैन्स रहा कहाँ? आदमी कहता है कि मैं चाहे मर जाऊँ, लेकिन ये चाहिए। मन दूसरे को मार सकता है, और मर जाने के लिए तैयार है, दूसरों को मारने के लिए तैयार है। उन लोगों के लिए गुरू का कोई मतलब नहीं। और जब मन मर जाने को तैयार है, दूसरों को मारने के लिए तैयार हो, खुद को मारने के लिए तैयार हो, उन लोगों के लिए जिन्दगी का मक्सद ही खतम हो गया। मन में फूल को लेकर एक कवर आया, कपड़ा आया, एक दीवार बनी। उसके पहले विचार कहां थे? उससे पहले मन कहां था? वहाँ जाने के लिए बहुत बड़ी बुद्धि चाहिए, बहुत बड़ा तप चाहिए, बहुत बड़ी तैयारी चाहिए।
इसीलिए तो गुरू के पास जाते हैं, लेकिन तप ने के लिए नहीं जाते हैं। इसीलिए इन महापुरुषों ने गुरूपूर्णिमा अषाढ़ की रखी कि पहले तप चाहिए, पहले आग चाहिए। कैसी आग? ऐसी आग नहीं जो तुम्हें जलाऐ या किसी का घर जलाऐ। ऐसी आग, जिससे पानी बरसे। ऐसी आग जिससे ठण्डी हवाएं चलें। ऐसी आग जिससे प्रकृति पूरे शवाब पर और सुन्दर दिखाई दे। ऐसी आग, ऐसी चिन्गारी। उसको तप कहते हैं। वो महापुरूष धन्य हैं, वो धन्य है, जिसके अन्दर इतनी आग होती है। जिसके अन्दर इतनी तपिस होती है, जिसके अन्दर इतनी हीट होती है, ओजस होती है, ऊर्जा होती है, शक्ति होती है, पावर होती है, वो इस संसार में धरती के लिए वरदान होते हैं। और सच कहा जाऐ तो भगवान से भी बडे+ होते हैं, ऐसे महापुरूषों की जीवनियाँ पढ़ोगे तो तुम्हें सुधरने की जरूरत नहीं है।
क्या करोगे? कैसे सुधर सकते हो? तुम न सुधरने को जानते हो और न बिगड़ने को जानते हो। अगर तुम सुधरने को जानते हो तो बिगड़ते ही नहीं। अगर तुम बिगड़ते ही रहे हो तो न तुम बिगाड़ को जानते हो और न सुधार को ही जानते हो।

Sunday, October 17, 2010

दर्द दिमांग में कपड़ा बन कर बैठ गया है.......

इस में बहुत बड़ी जानकारी और बहुत बड़ा हमारा आग्रह है और हमें लगता है कि हमने ये चीज छोड़ दी तो पूरी जिन्दगी का मकसद ही बदल जाऐगा। इतने उसमें इन्वॉलव हो गए हैं। मुझे कोई फूल प्यारा लगता है, वो फूल दिखा, फूल मन को इतना भा गया कि वोही फूल होना चाहिए। लेकिन वो फूल ऐसा है कि जो मेरे बस की बात नहीं है, जो मेरे रैन्ज में नहीं है, जो मेरे अधिकार में नहीं है, जो मेरे पावर के वश की बात नहीं है। जो उस फूल का दर्द है, वो मेरे दिमांग में कपड़ा बन कर बैठ जाएेगा। वो कपड़ा, फूल की चाहत, उसकी सुन्दरता, उसका सुकून, उसका सुख, फूल का महत्व, फूल का रंग रूप, और फूल का जो फल है, जिसको में ले लू तो मेरा ऐसा हो जाऐगा, वैसा हो जाऐगा। ये सारी चीजों को लेकर के रात की नींद, दिन का चैन खत्म, ये ऐसा कपड़ा है। और ये जो सारी चीजें हैं, खटकने की चीजें हैं। ये भी खतरनाक कपड़ा है।

Wednesday, October 13, 2010

मुंह में नमक का डेल है तो मिठास नहीं आ सकती.....

मेरा मन कहीं अटका हुआ है, मेरे मुंह में कोई नमक का डेल है तो उस से मिठास नहीं आ सकती, लेकिन नमक की डली को फैंक दोगे तो मिठाई की मिठास लेने के लिए कोशिश थोड़े ही करनी है। मिठाई तो मुँह में जाऐगी, अपने आप पता चलेगा। कितनी टेस्टी है, कितनी बड़िया है, कितनी आनन्ददायक है, कितनी स्वादिष्ट है, अपने आप पता चल जाऐगा। दिक्कत नमक की डेली को फैंकने की है, दिक्कतें दिमांग के कपड़ों को उतारने की हैं। जिसे पतंजली कहते हैं - योगश्चित्तश्यवृत्ति निरोधः। आम बोलचाल में सुख देव जी ने परीक्षित को समझाया कि ये कपडे+ उतारना।

पतंजली कहते हैं कि ये कपड़े क्या उतारना है? ये दिमांग में जो वृत्तियां हैं, वृत्तियां क्या हैं- जो चीज हमारे दिमाग को आवृत्त कर लेती है, ढक लेती है। हमारे दिमाग के ऊपर कोई चीज आ जाती है, तो दिमाग उसी चीज को देखता है और दिमांग उसी में फँस जाता है। सफेद कपड़े को तुम किसी रंग में डालो तो कपड़ा रंग में ढ़ल जाऐगा, रंग कपड़े में ढ़ल जाएगा। वो क्या था? उसको कौन बताएगा? ऐसे ही हमारा दिमांग होता है। दो तरह के रंग होते हैं दिमांग में eक , जिस को हम चाहते हैं, हमारा मन चाहता है। dउसरे जिस को हम नहीं चाहते। २ तरह के ही रंग हैं, दो तरह के कपड़े। एक जो हमारे मन को अच्छी लगती हैं, उसको चिपकना कहते हैं। और दूसरी वो जो हम को अच्छी नहीं लगती हैं, उसके जो विरोध की चीजें हैं उसको द्वेष कहते हैं। तो हमारा जो जीवन है, हमारा जो मन है, हमने जो कपड़े पहन रखे हैं। हमने चिपकने के लिए पहन रखे हैं, या खटकने के लिए पहन रखे हैं। चिपकने और खटकने के कपड़े हैं तो फिर जिन्दगी में चैन की चीज कहाँ से आई? और शान्ती की चीज कहाँ से आ जाऐगी? वास्तविक चीज कहां से आएगी। जिन्दगी का उद्देश्य किस के लिए है? कहाँ से आ जाऐगा? नहीं आयेगा। चिपकने को भी उतार दें और खटकने को भी उतार दें। और उतारना ऐसे ही नहीं। इन कपड़ों को उतारना कोई ऐसी बात नहीं है, लेकिन मन में जो कपड़े पहन रखे हैं, उनको उतारना। मन में जो कपड़े पहन रखे हैं चिपकने और खटकने के वही जो राग है।

Wednesday, October 6, 2010

गुरू एक मिठास की तरह से है........

तुम अपने मुँह में नमक की डली दबाओ और मिठाई खाओ तो मिठास मिल जाऐगी? नहीं मिलेगी। गुरू एक मिठास की तरह से है। गुरू की जो वाणी है, अमृत की तरह से होती है। संतों की जो वाणी है अमृत है। उस मिठास के लिए जो तुम्हारे मुँह में नमक है, उसे थूकना पडेगा। क्या तुम इसके लिए तैयार हो। अगर तुम ऐसा कर सकते हो तो गुरू के पास जाने के लिए न धन की जरूरत है और न किसी सिफारिश की जरूरत है, न किसी सुन्दरता की जरूरत है।

दक्षिण में एक संत हुए थे पीपा महाराज। उन के तो बाजू ही नहीं थे, घुटने से नीचे पाँव नहीं थे। शक्ल बहुत खराब थी, जैसे किसी खाली डिब्बे को उठा कर रख दो वहीं रखा रहेगा। उसे उठा कर रख दिया, वो वहीं है। क्योंकि हाथ नहीं सरक नहीं सकते, पाँव नहीं हैं खिसक नहीं सकते। तो उनका नाम रख दिया पीपा महाराज। लेकिन उनके पास वो चीज थी जो है असाढ़ की गर्मी। वो कपड़े उतारना जानते थे। कपड़े उतार के नंगे रहते थे। दिमांग में न अंश था न कुल था, न कुटुम्ब था, कुछ नहीं था। ये भी नहीं था कि मैं आदमी की सन्तान हूं। कुछ नहीं। और हम, चीजों को पकड़ते हैं जब हम मैं को लेकर के शरीर और संसार को जोड़ देते हैं, तभी आप देख रहे होंगे कि मैं किसी को देख सकता हूँ और मेरी आँखें किसी को देखती हैं। पहले कहुँगा कि मेरा मन किसी को पकड़े। तो मैं कुछ पहने हुआ हूं, फंसा हुआ हूं।

Tuesday, October 5, 2010

गुरू पूर्णिमा के लिए असाढ़ की पूर्णिमा को ही क्यों चुना?

देखिये गुरू पूर्णिमा के लिए असाढ़ की पूर्णिमा को ही क्यों चुना, कोई और पूर्णिमा क्यों नहीं चुनी गई। शरद पूर्णमा को भी तो मना सकते थे। फर्स्ट क्लास मौसम होता है। न सर्दी होती है, ना गर्मी होती है और उसमें न कीचड़ होती है। साफ रास्ते होते हैं, हरियाली होती है, बढ़िया मौसम होता है। शरद को नहीं चुना। और किसी मौसम की पूर्णिमा को नहीं चुना इसी को क्यों चुना? इसमें खास बात है। इसको चुना है तो इसके पीछे भी एक मकसद है। इस पूर्णिमा को गर्मी होती है, बादल भी होते हैं, भीषण गर्मी, भीषण बरसात, दोनों साथ-साथ। ये जो गर्मी है, वो ज्ञान का और त्याग का सिंम्बल है, प्रतीक है। ये जो अभी कपड़े उतारने की बात कही थी, वही बात है। गर्मी आते ही आदमी कपड़े उतार देता है, कम से कम कपड़े पहनता है और सोचता है कि नंगे बदन रहूँ, और पानी में उतर जाऊँ। गर्मी का, पानी का बहुत ही अच्छा ताल मेल है। असाढ़ का महीना है, इस समय इतनी गर्मी है कपड़े उतारने के लिए, दिमांग की सारी बातों को खत्म करने के लिए। अगर हम दिमांग में कुछ पकड़ करके लाते हैं, कुछ आग्रह करके जाते हैं, तो कहेंगे कुछ नहीं मिला। तुम कहोगे कि हम गुरू के पास जाते हैं, तो क्यों नहीं मिलेगा? तर्क दोगे कि आग के पास कैसे भी जाऐं, गर्मी लगती ही है। सही है। रोशनी के पास जाओ तो रोशनी मिलती ही है। बिल्कुल सही बात है।

Sunday, October 3, 2010

दिमांग के कपड़े उतारना सीख जाओ..........

वहां के लिए तुम्हें अपने कपड़े उतारने होंगे। सारे कपड़े उतार दो सारे। जो शरीर पर कपड़े पहने हो ये भी उतार दो, दिमांग के कपड़े भी उतार दो। दिमांग के कपड़े उतारना सीख जाओगे, तो उनकी शरण में पहुँचकर अपनी जिन्दगी का जो उद्देश्य है उसको पा लोगे। लेकिन हम कपड़े उतारने के लिए तैयार नहीं होते, क्योंकि जब से ये हमारी जिन्दगीयाँ शुरू हुई हैं, तब से हम २१ वीं शदी में आये तब तक हमने कपड़े को पहनना, कपड़े को पकड़ना, कपड़े का कपड़े का फैशन, यही हमारी जिन्दगी की एक नियति बन गयी है। दिमांग में सारे के सारे कपड़ों के दलदल को भर लिया है। ये नहीं चलेगा। जब तक ये दिमाग के कपड़े नहीं उतरेंगे, अपने जीवन के लक्ष्य को नहीं पा सकोगे। तुमने सुना था कथा में, भगवान के ध्यान के लिए गोपियाँ जाया करती थीं, स्नान करने के लिए। तो उसमें चीरहरण का प्रसंग आता है कि गोपियों ने कपड़े उतार दिये और भगवान श्री उनके कपड़े ले गए। उन्होंने श्री कृष्ण से कपड़े मांगे तो श्री कृष्ण ने कहा, ÷÷मेरे पास में आओ।'' वो बात ऐसी नहीं है, जो उन्होंने शरीर के कपड़े उतारे थे, बात समझने की है। उन्होंने दिमांग के कपड़े उतारे थे। और दिमांग के कपड़े उतारना, यही जिन्दगी का एक सबसे फर्स्ट स्टैप पहला कदम होता है।

Monday, September 27, 2010

जिन्दगी तुम्हारी किसके लिए है......

पर्व क्यों बनया गया? पर्व इसलिए है कि जिन्दगी तुम्हारी किसके लिए है। जिन्दगी कैसे चल रही है? वहां दिमांग की जरूरत है। वहाँ तुम्हारी जरूरत है। जिन्दगी किसके लिए होनी चाहिए? वहाँ तुम्हारी अहमियत मालुम पड़ती है कि तुम हो या नहीं। तुम क्या सोचते हो? क्या सोचना है? क्या सोचते हो, से बात नहीं है। क्या सोचना चाहिए, बात ये है। क्या सोचना चाहिए उसके लिए हमें महापुरूषों की शरण में जाना चाहिए। ये परम्परा है ये ज्तंकपजपवद है। जो परम्परा के साथ जुड़ते हैं, उनको जिन्दगी का जो उद्देश्य है, जिन्दगी क्या है? जिन्दगी जीने का जो आनन्द है, जो तरीका है, वो क्या है? वो उन महापुरूषों की शरण में जाने से मिलेगा। वहाँ उन महापुरूषों की शरण में जाने के लिए ये जो तुम्हारे पास किसी दिखावे की जरुरत नहीं है। उनकी शरण में जाने के लिए, उन तक पहुंचने के लिए न कोई ड्रैस काम करेगी, न तुम्हारा अंग, वंश, कुटुम्ब, धर्म, परिवार, खानदान, जाति, रिश्ता, नाता, पढ़ाई-लिखाई, सुन्दराता, कुरूपता, आँख, नाक, कुछ भी नहीं चलेगा। क्या चलेगा?

Wednesday, September 15, 2010

प्राणी का अर्थ क्या है.......

जितने भी शरीरधारी हैं, उनको प्राणी कहते हैं। प्राणी का अर्थ है- जिसके अंदर जान होती है, जिसके अंदर प्राण होता है। जिन्दगी तो किसी भी रूप में हो सकती है और जिन्दगी के लिए लोग कुछ भी करते हैं। चौरासी लाख तरह के प्राणी होते हैं, सब अपनी तरह से जीते हैं। जिन्दगी के लिए जो करना है, उसमें सोचने की जरूरत नहीं है। जैसे पानी का थ्सवू ;बहावद्ध अपने आप नीचे की तरफ होता है। पानी को कोई कुछ भी करे लेकिन वो नीचे को ही चलेगा। कोई कहे कि मैंने पानी को नीचे की गति दी है, तो कहोगे कि पानी का तो स्वभाव है, कि वह नीचे की तरफ जाएगा। ऐसे ही कोई कहे कि मैंने जिन्दगी के लिए ऐसा किया-वैसा किया, तो ये तुमने कुछ नहीं किया। ये तो होना ही था। छोटे-छोटे कीड़े-मकौडे से लेकर बडे+-बड़े विद्वान तक कैसे जीते हैं? कैसे खाते हैं? कैसे पीते हैं। उसमें कोई खास अहमियत की बात नहीं होती। उसमें तुम कहीं नहीं हो ये तुम क्या खाते हो, क्या पीते हो, क्या पहनते हो। ये कोई महत्व की चीज नहीं है। ये सारी भोग की चीजें हैं। इसमें दिमांग लगाने की कोई जरूरत ही नहीं है। ये अपने आप होता है।

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