आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Monday, August 31, 2009

सिद्धियों का दुरुपयोग करने व व्यर्थ प्रदर्शन करने पर साधन भ्रष्ट होने का भय रहता है।

तिब्बत में भी बौद्ध भिक्षुक तथा लामाओं के जीवन में ध्यान-साधना का महत्वपूर्ण स्थान है। इस रहस्यमयी विज्ञान को वहाँ बहुत मान्यता दी जाती है। वहाँ के साधुगण स्वेच्छा से एकान्त की अभिलाषा के कारण एक ऐसे कक्ष में प्रविष्ट हो जाते है, जहाँ की दीवारें छः फीट चौड़ी, पत्थर से बनी होती हैं जिससे उसके भीतर कोई आवाज न पहुँच सके। सन्यासी के भीतर जाने के बाद कक्ष का मुंह भारी पत्थर से बंद कर दिया जाता है, जहां भीतर घुप्प अंधेरा और शान्ति होती है। यह ऐसा स्थान हो जाता है, जहाँ सन्यासी ध्यान व चिन्तन-मनन में लीन हो जाता है। दिन में एक बार भोजन भीतर सरका दिया जाता है। यहाँ से कोई भी सन्यासी ३ वर्ष, ३ माह व ३ दिन के समय से पूर्व इस भौतिक स्थूल शरीर में बाहर नहीं निकल सकता। जब उसके निकलने में सिर्फ एक माह का समय शेष रहता है तो कक्ष की छत में एक छोटा सा छेद किया जाता है, जिसे प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा बड़ा किया जाता है, जिससे कि थोड़ा-थोड़ा प्रकाश भीतर जाने लगे और धीरे-धीरे सन्यासी की आँखे रोशनी की अभ्यस्त होने लगें अन्यथा वह बाहर निकलते ही तेज+ रोशनी के अचानक आँखों पर पहुँचने से अन्धा हो सकता है। सबसे अधिक हैरानी की बात यह है कि वह सन्यासी अधिकांशतः कुछ समय पश्चात ही पुनः उसी कक्ष में प्रवेश कर जाते हैं और शेष जीवन एकान्त में ध्यानस्थ रह कर व्यतीत करते हैं। दरअसल उन्हें अंदर ध्यानस्थ रहने के दौरान इस प्रकार का अभ्यास हो जाता है कि इस भौतिक शरीर को इधर-उधर घुमाने और इन्द्रियों का प्रयोग करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। वे वहाँ बैठे-बैठे ही बाहर के जगत को सूक्ष्म शरीर के माध्यम से जान सकते हैं तथा विचार प्रक्षेपण करके किसी तक भी पहुँचकर उससे कुछ भी करवा सकते हैं। ध्यान में ऐसी अनेकों रहस्यमय चीजें हैं जो रोमांचित और चमत्कृत कर देने वाली हैं। परन्तु सन्त जन व मुनि इनमें न फँस कर अपने अन्तिम लक्ष्य आत्मानुभूति व ब्रह्मानिष्ठा की ओर अग्रसर रहता है। ये सब तो सिर्फ प्रलोभन व भटकाने वाली चीजें हैं। इनसे साधक की ब्रह्मजिज्ञासा व दृढ़ता की परीक्षा होती है। साथ ही इन सिद्धियों का दुरुपयोग करने व व्यर्थ प्रदर्शन करने पर साधन भ्रष्ट होने का भय रहता है। अतः अत्यधिक सावधान रहकर साधना करें। ये साधक है इसमें ही फंस गए, अटक गए तो लक्ष्य तक पहुंचना असंम्भव हो जाएगा। सबको गुरु की कृपा व आशीष प्राप्त हो। इसी आशा व विश्वास के साथ- ।

Tuesday, March 31, 2009

मंत्रों के उच्चारण करने पर निकलने वाली ध्वनि के साथ गमन कर,दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करती है

आंतरिक विधुत धारा विज्ञान के अनुसार जिस भी शब्द का उच्चारण हम लोग करते हैं,वह इस ब्राह्मंड में तैरने लगता है। उदाहरण के लिए एक रेडियो स्टेशन पर किसी भी गीत की पंक्ति का अंश बोला जाता है तो वह उसी समय वायुमंडल में फैल जाता है। तथा विश्व के किसी भी देश,किसी भी कोने में श्रोता यदि चाहे तो उसके रेडियो के माध्यम से उस गीत की पंक्ति का अंश सुन सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि रेडियो में सूई उसी फ्रीक्वैंसी पर लगाने की जानकारी हो। इस प्रकार ग्राहक और ग्राह्य का आपस में पूर्ण संपर्क आवश्यक है, उसी प्रकार मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तो मंत्र उच्चारण से भी एक विशिष्ट ध्वनि कंपन बनता है जो कि संपूर्ण वायु मंडल में व्याप्त हो जाता है। इसके साथ ही आंतरिक विधुत भी तरंगों में निहित रहती है। यह आंतरिक विधुत, जो शब्द उच्चारण से उत्पन्न तरंगों में निहित रहती है, शब्द की लहरों को व्यक्ति विशेष या संबंधित देवता,ग्रह की दिशा विशेष की ओर भेजती है।अब प्रश्न यह उठता है कि यह आन्तरिक विधुत किस प्रकार उत्पन्न होती है? यह बात वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मान ली गई है कि ध्यान,मनन,चिन्तन आदि करते समय जब व्यक्ति एकाग्र चित्त होता है,उस अवस्था में रसायनिक क्रियायों के फलस्वरूप शरीर में विधुत जैसी एक धारा प्रवाहित होती है(आंतरिक विधुत) तथा मस्तिष्क से विशेष प्रकार का विकिरण उत्पन्न होता है। इसे आप मानसिक विधुत कह सकते हैं। यही मानसिक विधुत (अल्फा तरंगें) मंत्रों के उच्चारण करने पर निकलने वाली ध्वनि के साथ गमन कर,दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करती है या इच्छित कार्य संपादन में सहायक सिद्ध होती है। यह मानसिक विधुत(उर्जा)भूयोजित न हो जाए,इसीलिए मंत्र जाप करते समय भूमी पर कंबल,चटाई,कुशा इत्यादि के आसन का उपयोग किया जाता है।

Tuesday, March 3, 2009

यन्त्र ग्रहों की स्थिति को भी दर्शाते हैं

यन्त्र कागज, पत्थरों, धातुपत्र आदि पर बनाए जा सकते हैं। ये यन्त्र ग्रहों की स्थिति को भी दर्शाते हैं तथा उन पर ध्यान लगा कर ग्रहों की अनुकूलता प्राप्त की जा सकती है। ग्रहों का हमारी भावनाओं तथा कर्मों पर प्रभाव पड़ता है। विभिन्न यन्त्रों को वेदों में बताए गए काल में तथा निश्चित तरीकों से बनाया जाता है। यन्त्र को आध्यात्मिक तकनीक भी कहा जाए तो उचित ही होगा, क्योंकि यह हमारे शरीर तथा मन 'तन्त्र तथा मन्त्र ' की शक्तियों को सही दिशा देकर उनका सदुपयोग करने में सहायक होते हैं। यन्त्रों से बहुमूल्य ऊर्जा के अनावश्यक क्षय से बचा जा सकता है। कुछ यन्त्र, ब्रह्माण्ड, चेतना तथा इष्ट देवता की शक्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। यन्त्र में देवताओं का वास होता है। यह देवताओं के आह्नान में सहायक होते हैं। हिन्दू संस्कृति में कई अवसरों पर घर-घर में रंगोली, अल्पना, चौक, मण्डल, कलम आदि पवित्र ज्यामितीय आलेखनों के रूप में यन्त्रों का निर्माण होता रहता है। इस प्रकार ये पूजा, यज्ञ तथा साधना का अभिन्न अंग हैं।

Monday, March 2, 2009

यन्त्र का शाब्दिक अर्थ है 'मशीन' अथवा कोई 'चिन्ह'

यन्त्र का शाब्दिक अर्थ है 'मशीन' अथवा कोई 'चिन्ह' जो कि मन की एकाग्रता में सहायक हो। परम्परागत रूप से आध्यात्म में इनका प्रयोग मन को संतुलित तथा एकाग्र करने हेतु होता है। यन्त्रों को धारण किया जा सकता है, बनाया जा सकता है अथवा इन पर ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है। कहते हैं इनका जादुई ज्योतिषीय तथा आध्यात्मिक प्रभाव पड़ता है। यन्त्र शब्द संस्कृत मूल 'यम्‌' से बना है जिसका अर्थ है 'नियन्त्रित करना।' यन्त्र वह जो काबू करे। यह हमारे भीतर तथा बाहर की ऊर्जा व शक्तियों पर हमें नियन्त्रण दिलाने में सहायक होता है। यह पकड़ने वाले यन्त्र के समान किसी धारण के सार को पकड़ने या धारण करने अथवा मन को किसी, विचार विशेष में एकाग्र करने (उसे पकड़ने) में सहायक हो सकता है। एक आलेखन के रूप में यह एक चिन्ह है, जो कि तावीज+ो पर खोदा जाता है। इनमें जादुई शक्ति होती है ऐसी मान्यता है। यन्त्र तैयार करते समय कुछ ज्यामितीय आकृतियां तथा चिन्हों का प्रयोग होता है। कमल का फूल चक्रों का प्रतीक है। इसका प्रत्येक दल उस चक्र विशेष से सम्बन्धित मनोवृत्ति का द्योतक होता है। एक बिन्दु सृष्टि के आरम्भ बिन्दु को दर्शाता है। षट्कोण जो कि दो विपरीत त्रिकोणों से बनता है, शिव तथा शक्ति के सन्तुलन को अर्थात्‌ अन्तर्मुखता-बहिर्मुखता कर्म तथा विचारशीलता में सन्तुलन का प्रतिनिधित्व करता है। स्वास्तिक (जैसा कि सभी जानते हैं) सौभाग्य, कल्याण, समृ(ि तथा आध्यात्मिक उन्नति का सूचक है। इनके अतिरिक्त यन्त्रों को बनाने में बीज मन्त्रों का प्रयोग भी अति महत्वपूर्ण है। ये बीजमन्त्र देवनागरी लिपि के अक्षर हं,ै जो कि अलग-अलग चक्रों तथा उनसे सम्बन्धित मूलवृत्तियों पर प्रभाव डालते हैं।

Sunday, February 22, 2009

आत्मा'' तथा "श्वास'' हेतु एक ही मूल इब्रानी शब्द प्रयोग में लाया जाता है।

इसरायली परमेश्वर को एक संपोषक के रूप में देखते हैं जिसने अपनी सामर्थ से सम्पूर्ण सृष्टि को रचा तथा वह उसकी चिंता करता है। भजन ८ः४-५ तथा १०४ः१०-३० में भजनकार अपने प्रशंसा गीत में परमेश्वर को संपोषक मानता है। संसार को बनाकर केवल उसे ऐसे ही नहीं छोड़ा है परन्तु वह उसे निरंतर संभाले हुए है। ÷÷तू पशु के लिए घास और मनुष्य के लिए वनस्पति उपजाता है, जिससे मनुष्य धरती से भोजन वस्तु उत्पन्न करें।'' उत्पत्ति के प्रथम अध्याय में तीसरे दिन परमेश्वर ने वनस्पतियों तथा वृक्षों को उपजने की आज्ञा दी। इसी सत्य को भजन के उपरोक्त पद में बताया गया है। यहाँ पर जंगली पशुओं तथा मनुष्य दोनों के लिये परमेश्वर ने वनस्पतियों तथा पेड़ पौधों को उपजाया है। ÷÷उपजाना'' हेतु मूल इब्रानी शब्द का अर्थ है ÷÷खेती करना''। तात्पर्य यह है कि मनुष्य का कार्य है खेती करना, नाश करना नहीं तथा परमेश्वर मनुष्य एवं पशुओं का समान रूप से संपोषक है। भजन १०४ः३० में भजनकार एक गम्भीर सत्य को प्रगट करता है जिसमें परमेश्वर सभी जीवों की रखवाली करते हैं। "आत्मा'' तथा "श्वास'' हेतु एक ही मूल इब्रानी शब्द प्रयोग में लाया जाता है। उक्त पद में अर्थात्‌ परमेश्वर का आत्मा के द्वारा पशु तथा वनस्पतियाँ बनाये जाते हैं। यह विचार भी बताया है कि परमेश्वर संपोषक है तथा वह इस प्रक्रिया को निरंतर करता है। "सब कुछ परमेश्वर के आत्मा द्वारा सृजा गया है जो निरंतर पृथ्वी के प्राकृतिक जीवन को साल दर साल नया करता है'' तात्पर्य यह कि परमेश्वर का हस्तक्षेप नियनित रूप से प्रकृति में है अतः हमें प्रकृति का आदर करना चाहिए तथा परमेश्वर की तरह प्रकृति का सम्मान कर उसकी देखभाल करना चाहिए।

Saturday, February 21, 2009

ब्रह्‌माण्ड को समझना है तो पिण्ड को समझो।

हर मत की अपनी पूजा पद्यति अलग हो सकती है, लेकिन सभी में कुछ निश्चित शारीरिक क्रियाएं अवश्य हैं। ये शारीरिक क्रियाएं क्यों सभी में हैं? विचारशील प्राणी इसकी तरफ आकर्षित अवश्य होता है। जिज्ञासा स्वाभाविक रुप से उत्पन्न होती है। कहीं न कहीं इन क्रियाओं के द्वारा शरीर को यंत्रवत किया जाता है। यंत्रवत किया जाना या यंत्र का बनाया जाना बहुत अलग नहीं हो सकता। मनीषियों ने बताया कि मनुष्य का शरीर ब्रह्‌माण्ड की इकाई है। ब्रह्‌माण्ड को समझना है तो पिण्ड को समझो। ब्रह्‌माण्ड की क्रियाविधि समझनी है तो पिण्ड की क्रिया विधि को समझो। ब्रह्‌माण्ड को संतुलित रखना है तो पिण्ड को संतुलित रखो। ईश्वर की सत्ता को विश्व का कोई भी धर्म इंकार नहीं करता। कोई उसे किसी रूप में स्वीकार करता है तो दूसरा किसी अन्य रूप में।

यंत्र की शक्ति को भी कोई धर्म या पंथ अस्वीकार नहीं करता। बस रूप बदलता है। कोई इस शरीर को ही यंत्र मानता है तो कोई कायनात को। सभी धर्मों के मानने वालों के चिह्‌न भी हैं। वे अलग अलग हो सकते हैं। नियंत्रण के औजार के रूप में यंत्र की सम्प्रभुता सभी मतों में दृष्टिगोचर होती है। हिन्दू धर्म सर्वाधिक प्राचीन होने के कारण इसमें यंत्रों के प्रयोग का सर्वाधिक उल्लेख मिलता है। इसमें प्रयुक्त यंत्रों का प्रयोग न केवल आध्यात्मिक वरन भौतिक उन्नयन के लिए भी होता है। इसी क्रम में विभिन्न मतों के विचार प्रस्तुत हैं।

Tuesday, February 3, 2009

हीलिंग अँगरेजी शब्द है जिसका मतलब स्वस्थ मन, स्वस्थ तन प्रदान करना है।

वस्तुतः हीलिंग अँगरेजी शब्द है जिसका मतलब स्वस्थ मन, स्वस्थ तन प्रदान करना है। कई व्यक्ति कहते हैं इस शब्द को बदल दें, क्योंकि बहुतों को इसका मतलब समझ नहीं आता है। लेकिन हमने शब्द पर ध्यान नहीं देकर उसकी शक्ति, उसके कार्य पर ध्यान दिया। आखिरकार शब्द कुछ भी हो, काम ऊर्जावान एवं सिद्धि प्रदायक होना चाहिए। जब मंत्र हीलिंग के लिए व्यक्ति विशेष को हीलिंग चेम्बर में ध्यान लगवाकर बैठाया या लिटाया जाता है, तब उसके शरीर की अंदरूनी शक्ति को डाउजिंग द्वारा जाँच कर, उसकी परेशानी को परख एवं समझकर मंत्र शक्ति का प्रयोग किया जाता है। मंत्र हीलिंग और डाउजिंग एस्ट्रोलॉजी एकदूसरे के पर्याय ही हैं। डाउजिंग एस्ट्रोलॉजी से जहाँ संभावनाओं को तलाशा जाता है, उनके समाधान ढूँढे जाते हैं वहीं मंत्र हीलिंग से सभी समाधान किए जाते हैं। ठीक उसी तरह ईश्वर एक है, रूप अनेक हैं।

Sunday, February 1, 2009

धर्म या अध्यात्म की शक्ति सर्वोपरि है, जो अपने सही कर्म करवाती है।

अभिमंत्रित, मंत्रोपचारित पेंडुलम के द्वारा की जाने वाली हाउजिंग ही यहाँ आपकी मदद कर सकती है। यह आपके लिए अति सूक्ष्म एक्सरे मशीन का कार्य करती है। व्यक्ति आपके सामने हो या न हो, डाउजिेग के माध्यम से उसके गर्भ में आने से लेकर वर्तमान एवं भविष्य की स्थिति तक की संपूर्ण जानकारी निकाली जा सकती है। यदि जन्म है, मृत्यु है, आकाश है, पृथ्वी है, विज्ञान है तो ये सब भी हैं। डाउजिंग एस्ट्रोलॉजर एवं आध्यात्मिक मंत्र साधक के लिए अनहोनी को होनी करना असंभव नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि धर्म या अध्यात्म की शक्ति सर्वोपरि है, जो अपने सही कर्म करवाती है। बिना धर्म तो कर्म अपूर्ण है। एक बार स्थितियों की गहराई तक पहुँचते ही कार्य शुरू किया जा सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि भूतप्रेत, तंत्रमंत्र कुछ नहीं होता, किसी ने देखा है क्या? लेकिन देखा तो ईश्वर को भी नहीं है, परंतु उन पर भी सभी की अटूट श्रद्धा है। देखा तो हवा को भी किसी ने नहीं है, लेकिन महसूस तो सभी करते हैं। मंत्रों का प्रभाव मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्ति के प्रभाव का आधार मंत्र ही तो है क्योंकि बिना मंत्रसिद्धि यंत्र हो या मूर्ति अपना प्रभाव नहीं देती। मंत्र आपकी वाणी, आपकी काया, आपके विचार सभी को प्रभावपूर्ण बनाते हैं। इसलिए हीलिंग को मंत्रों से जोड़कर उसे सर्वशक्तिदायक बनाया।

Thursday, January 29, 2009

काया नश्वर है किंतु मंत्र अजरअमर है।

मंत्र हीलिंग अर्थात आध्यात्मिक चिकित्सा की शरण में आने वाला परेशानी अथवा रोगमुक्त अवश्य ही हो जाता है। मंत्रों की आराधना के लिए सात्विकता, शुद्धता, पवित्रता को अति जरूरी विधा माना गया है। इसमें स्थान एवं मुनि की शुद्धि का ध्यान अवश्य रखना होता है। मंत्र हीलिंग भी शुद्ध अध्यात्म है। काया नश्वर है किंतु मंत्र अजरअमर है। मंत्रों का प्रभाव दिलदिमाग, वायुआत्मा तक होता है। जब मंत्रों का उच्चारण करते हैं, उनकी ध्वनि को कानों से सुनते हैं तो शरीर का रोमरोम असीम शक्ति और शांति का अनुभव करता है। क्यों? क्योंकि मंत्रों में ब्रह्मांड की शक्ति निहित है। मंत्र हीलिंग की आध्यात्मिक चिकित्सा हमेशा याद रखें अपनी आस्था का केंद्र न बदलें। अपने विश्वास को कायम रखें। अपना इष्ट जरूर जानें, अपनी पूजा प्रार्थना को सही रूप, सही आकार दें। इसी में मदद मिलेगी आपको डाउजिंग एस्ट्रोलॉजी से। मंत्र हीलिंग से आप लाभ प्राप्त कर सकते हैं माइग्रेन, तनाव, अनिद्रा, दमा, ब्लड प्लेटिलेटस, डिप्रेशन, ऊपरी हवा, पुराने दर्द एवं अन्य पारिवारिक परेशानियों में।

Tuesday, January 20, 2009

हुजुर ने बिस्मिल्लाह पढ़कर ताले को हाथ लगाया, दरवाजा खुल गया।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने शबे मेराज में चार (४) नहरें देखीं, एक पानी की, दूसरी दूध की, तीसरी शराब की और चौथी शहद की। आपने जिब्रीले अमीन से पूछा ये नहरें कहाँ से आ रही हैं। हजरत जिब्रील ने अर्ज किया, मुझे इसकी ख़बर नहीं। एक दूसरे फ़रिश्ते ने आकर अर्ज की कि इन चारों का चश्मा मैं दिखाता हूँ। एक जगह ले गया, वहाँ एक दरख्त था, जिसके नीचे इमारत (मकान) बनी थी और दरवाजे पर ताला लगा था और उसके नीचे से चारों नहरें निकल रही थीं। फ़रमाया दरवाजा खोलो अर्ज की इसकी कुंजी मेरे पास नहीं है, बल्कि आपके पास है। हुजुर ने बिस्मिल्लाह पढ़कर ताले को हाथ लगाया, दरवाजा खुल गया। अंदर जाकर देखा कि इमारत में चार खंभे हैं और हर खंभे पर बिस्मिल्लाह लिखा हुआ है और बिस्मिल्लाह की मीम से पानी, अल्लाह की ह से दूध, रहमान की मीम से शराब और रहीम की मीम से शहद जारी है। अंदर से आवाज आई ऐ मेरे महबूब! आपकी उम्मत में से जो शख्स बिस्मिल्लाह पढ़ेगा, वह इन चारों का मुस्तहिक़ होगा। (तफ़सीरे नईमी जि. १, स. ४३)

Monday, January 19, 2009

जो शख्स बिस्मिल्लाह पढ़ता हो तो अल्लाह तआला उसके लिए दस (१०) हजार नेकियाँ लिखता है

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया कि जो शख्स बिस्मिल्लाह पढ़ता हो तो अल्लाह तआला उसके लिए दस (१०) हजार नेकियाँ लिखता है और शैतान इस तरह पिघलता है, जैसे आग में रांगा। हर जीशान (अहम) काम जो बिस्मिल्लाह से शुरू न किया जाए, वह नातमाम (अधूरा) रहेगा और जिसने बिस्मिल्लाह को एक बार पढ़ा, उसके गुनाहों में से एक जर्रा भर गुनाह बाक़ी नहीं रहता और फ़रमाया जब तुम वुजू करो तो बिस्मिल्लाह वलहमदुलिल्लाह कह लिया करो, क्योंकि जब तक तुम्हारा वुजू बाक़ी रहेगा, उस वक्त तक तुम्हारे फ़रिश्ते (यानी किरामन कातिबीन) तुम्हारे लिए बराबर नेकियाँ लिखते रहते हैं। हजरत इब्ने अब्बास से रिवायत है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया की कोई आदमी जब अपनी बीवी के पास आए तो कहे बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ऐ अल्लाह हमको शैतान से महफूज रख और जो तू मुझे अता फ़रमाए उससे भी शैतान को दूर रख और कोई औलाद हो तो शैतान उसे भी नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा (बुख़ारी शरीफ जिल्दे अव्वल सफ़ा २६)।

Saturday, January 17, 2009

मंत्र की सच्चाई आखिर है क्या जिससे सत्य जीवन व्यतीत किया जाये।

कालांतर में इसरायिलयों ने इस मंत्र को न केवल उच्चारण तथा जाप किया अपितु अपने माथे पर एक डिबिया में रखकर बांधना, तथा बाजुओं पर ताबीज+ चौड़ी करके बांधना आरंभ किया। परंतु एक विशेष बात "मन में रखना'' पूर्णतः दरकिनार कर दिया फलतः मूलतंत्र जानकर, जपकर, उच्चारण करके भी गलतियाँ, बुराईयाँ तथा पाप-दर-पाप करते गये तथा यह सब आडम्बर हो गया और सत्य जीवन के मार्ग से भटक गये। तब प्रश्न उठता है कि मंत्र की सच्चाई आखिर है क्या जिससे सत्य जीवन व्यतीत किया जाये। प्रभु यीशु मसीह ने उपरोक्त मंत्रों को नया आयान तथा वास्तविकता प्रदान की। उन्होंने कहाः "तू अपने प्रभु, अपने परमेश्वर को सम्पूर्ण मन, सम्पूर्ण प्राण, सम्पूर्ण बुद्धि एवं सम्पूर्ण शक्ति से प्रेम कर तथा अपने समान अपने पड़ोसी को प्रेम कर। यही जीवन जीने का 'मूल मंत्र' नई आज्ञा है। ईश्वरीय मंत्र हमारे जीवन का सम्पूर्ण आधार है। इनके माध्यम से न केवल ईश्वरीय रहस्यों का पता चलता है वरन्‌ सत्य जीवन जीने की कला भी आती है परंतु यह स्वयं से नहीं हो सकता जब तक परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त न हो। अनुग्रह प्राप्त करने हेतु हमें परमेश्वर पर निर्भर होना पड़ेगा। निर्भरता से तात्यपर्य है अपने आपको सम्पूर्ण रीति से परमेश्वर को सौंप देना। सौंपना अर्थात्‌ मन, प्राण, बुद्धि, शक्ति से परमेश्वर को प्रेम तथा अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम है।

Friday, January 16, 2009

उहापोह में वह ईश्वरीय मंत्रों का उच्चारण एवं जाप करता है।

वर्तमान युग में प्रत्येक मनुष्य अपने चहुँमुखी विकास हेतु कुछ न कुछ चाहता है जिसके माध्यम से वह न केवल इस संसार में बंिल्क परलोक में भी सुख, समृद्धि तथा दुःख रहित जीवन व्यतीत करें, इस उहापोह में वह ईश्वरीय मंत्रों का उच्चारण एवं जाप करता है। यद्यपि वह भरपूर यत्न करता है कि इनके द्वारा सत्य जीवन जीने की कला सीख लें तथा उसका मार्ग सुधर जाये परंतु ऐसा है नहीं क्योंकि इसमें उसका स्वयं का प्रयास ही होता है। पवित्र बाइबल के पुराने विधान में परमेश्वर ने प्रत्येक यहूदी को एक व्यवस्था मूसा के द्वारा सौंपी जिससे वह सत्य जीवन जियें यह जीवन जीने का मूलतंत्र था। जिसे "शीमा'' कहते हैः "हे इस्त्राइल, सुन, यहोवा हमारा परमेश्वर है, यहोवा एक ही है, तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन और अपने सारे जीव, और अपनी सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना। और ये आज्ञाऐं मूलमंत्र जो मैं आज तुझको सुनाता हूँ, वे तेरे मन में बनी रहेऋ और तू उन्हें अपने बाल बच्चों को समझाकर सिखाया करना, और घर में बैठे, मार्ग पर चलते, लेटते, उठते इनकी चर्चा किया करना, और इन्हें अपने हाथ पर चिन्हानी करके बांधना, और यह तेरी आँखों के बीच टीके का काम दे। और इन्हें अपने-अपने घर की चौखट की बाजुओं और फाटक पर लिखना''

Thursday, January 15, 2009

मंत्र की वास्तविक सफलता गुरु कृपा में ही निहित है।

गतांक se आगे-------

मंत्र सिद्धि के उपरांत उसका प्रयोग साधक पर निर्भर हो जाता है। वह चाहे उसका सदुपयोग करे चाहे दुरपयोग। मंत्र तो उसको विस्तारित करेगा। इसीलिए भी शायद हमारे मनीषियों ने सावधान किया कि मंत्र की वास्तविक सफलता गुरु कृपा में ही निहित है। कुछ लोग मंत्र को किसी देवता का गुणानुवाद भी मानते हैं। इस आधार पर अगर हम देखें तो पाएंगे कि दुनिया में ऐसा कोई मजहब नहीं जो किसी न किसी का गुणानवाद न करता हो। तो क्या हर मजहब, हर पंथ मंत्र की सामर्थ्य को स्वीकार कर चल रहा है। हमारे एक सुधी इंटरनेट पाठक ने इस पर बड़ा व्यावहारिक उदाहरण देकर हमें समझाने का प्रयास किया। उसे भी यहां लिख देना समीचीन ही होगा। उन्होंने कहा कि हमारा शरीर ब्रह्‌माण्ड है। इसकी संरचना यंत्र है। इसके संचालित होने की क्रिया विधि की जानकारी होना तंत्र है। और उसका क्रियाशील होना मंत्र है। बात शुरू में तो समझ में नहीं आई लेकिन सोचने पर अनुभव हुआ कि वह शायद ठीक ही तो कह रहा है। हम भली प्रकार जान लें कि यह शरीर है। हम इसके सभी फंक्शन्स के भी जानकार हो जाएं। इस प्रकार हम ज्ञानी डाक्टर हो सकते हैं। लेकिन अगर हम उसका संचालन नहीं जानते तो तो उस यंत्र और तंत्र की जानकारी किस काम की। विषय काफी विशाल है। इसलिए हम विभिन्न धर्माचार्यों एवं विद्वानों के विचारों को इस अंक में प्रकाशन के साथ सुधी पाठकों से भी उनके विचारों की अपेक्षा के साथ कर रहे हैं।

Wednesday, January 14, 2009

तंत्र की उपयोगिता मंत्र एवं यंत्र पर निर्भर है।

पिछले अंक में तंत्र पर चर्चा के दौरान ही यह अनुभव होने लगा था कि तंत्र का ज्ञान बिना मंत्र के पूर्ण नहीं है। तंत्र की उपयोगिता मंत्र एवं यंत्र पर निर्भर है। मंत्र शब्द मन्‌ एवं त्र का युग्म है। मन्‌ अर्थात विचार एवं विश्वास तथा त्र अर्थात विस्तार। इस प्रकार शाब्दिक दृष्टि से मंत्र का अर्थ हुआ किसी विचार या विश्वास को विस्तार देना।

हम जानते हैं कि विचार की कोई सीमा नहीं होती। विचार तो अनंत तक हो सकता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि मंत्र अनंत तक विस्तारण योग्य विचार या विश्वास है। कुछ विचारकों ने मंत्र को मन का औजार भी कह कर परिभाषित किया है।

सामान्य प्रचलन में हर नेता तथा शिक्षक अपने अनुयायियों को कुछ मंत्र देने की बात कहता है। इस प्रकार इसे हम किसी क्रिया को पूर्ण करने का सरल एवं सटीक तरीका भी कह सकते हैं। कई लोग इसे किसी गुरु द्वारा कान में फूंके गए किसी वाक्य या श्लोक के रूप में मानते हैं। प्रश्न है कि आखिर मंत्र क्या है? क्या है इसकी शक्ति जो इसे हर सफल व्यक्ति अपने अनुचरों को इसे देना चाहता है।

अति प्राचीन काल से हमारे मनीषी स्रुतियों तथा धार्मिक गं्रथों में लिखी गई पद्यमय पंक्तियों को जिन्हें रिचा कहते थे को ही मंत्र के रूप में परिभाषित करते रहे हैं। ये रिचाएं मंत्र के रूप में यूं ही स्वीकार नहीं की गई हैं। वास्तव में प्राचीन ग्रंथों की प्रत्येक रिचा स्वयं में किसी विचार या विश्वास का विस्तार है। सनातन परम्परा के अनुसार 'मंत्र मूलम्‌ गुरु कृपा' का अर्थ है कि गुरु की कृपा ही मंत्र का मूल है। इसका अर्थ हुआ कि वह प्रकाश पुंज जो हमें घोर अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, उसके अनुग्रह के परिणाम स्वरूप हमें मिलने वाला उसका हर वाक्य मंत्र है। और मंत्र वह शक्ति से जिससे हर मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। ----- शेष कल -----

तंत्र की उपयोगिता मंत्र एवं यंत्र पर निर्भर है।

पिछले अंक में तंत्र पर चर्चा के दौरान ही यह अनुभव होने लगा था कि तंत्र का ज्ञान बिना मंत्र के पूर्ण नहीं है। तंत्र की उपयोगिता मंत्र एवं यंत्र पर निर्भर है। मंत्र शब्द मन्‌ एवं त्र का युग्म है। मन्‌ अर्थात विचार एवं विश्वास तथा त्र अर्थात विस्तार। इस प्रकार शाब्दिक दृष्टि से मंत्र का अर्थ हुआ किसी विचार या विश्वास को विस्तार देना।

हम जानते हैं कि विचार की कोई सीमा नहीं होती। विचार तो अनंत तक हो सकता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि मंत्र अनंत तक विस्तारण योग्य विचार या विश्वास है। कुछ विचारकों ने मंत्र को मन का औजार भी कह कर परिभाषित किया है।

सामान्य प्रचलन में हर नेता तथा शिक्षक अपने अनुयायियों को कुछ मंत्र देने की बात कहता है। इस प्रकार इसे हम किसी क्रिया को पूर्ण करने का सरल एवं सटीक तरीका भी कह सकते हैं। कई लोग इसे किसी गुरु द्वारा कान में फूंके गए किसी वाक्य या श्लोक के रूप में मानते हैं। प्रश्न है कि आखिर मंत्र क्या है? क्या है इसकी शक्ति जो इसे हर सफल व्यक्ति अपने अनुचरों को इसे देना चाहता है।

अति प्राचीन काल से हमारे मनीषी स्रुतियों तथा धार्मिक गं्रथों में लिखी गई पद्यमय पंक्तियों को जिन्हें रिचा कहते थे को ही मंत्र के रूप में परिभाषित करते रहे हैं। ये रिचाएं मंत्र के रूप में यूं ही स्वीकार नहीं की गई हैं। वास्तव में प्राचीन ग्रंथों की प्रत्येक रिचा स्वयं में किसी विचार या विश्वास का विस्तार है। सनातन परम्परा के अनुसार 'मंत्र मूलम्‌ गुरु कृपा' का अर्थ है कि गुरु की कृपा ही मंत्र का मूल है। इसका अर्थ हुआ कि वह प्रकाश पुंज जो हमें घोर अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, उसके अनुग्रह के परिणाम स्वरूप हमें मिलने वाला उसका हर वाक्य मंत्र है। और मंत्र वह शक्ति से जिससे हर मनोवांछित फल प्राप्त किया जा सकता है। ----- शेष कल -----

Friday, December 19, 2008

शाक्त तन्त्र ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य ६४ तन्त्र ग्रन्थों की भी सूची मिलती ह

एक एक अङक में आठ आठ ग्रन्थ है। ६४ भैरवागमों की चर्चा के बाद ६४ शाक्तागमों की भी चर्चा यहाँ प्रासंगिक है। जगद्गुरु शंकराचार्य ने भी आनन्दलहरी (सौन्दर्यलहरी) में इनका संकेत दिया है
इन ६४ शाक्त तन्त्रों के नाम महामाया तन्त्र, योगिनीकाल, तत्त्वसम्वर, सिद्धभैरव, वटुक भैरव, कंकाल भैरव आदि है। इनके विषय अन्यथा दर्शन (जैसे घट का कुत्ता के रूप में दिखलायी पड़ना), योगिनीसमूह का दर्शन, एक तत्त्व को दूसरे तत्त्व के रूप में देखना (जैसे पृथिवी तत्त्व को जलतत्त्व के रूप में देखना इसी तन्त्र का प्रभाव था कि युधिष्ठिर के यज्ञ में दुर्योधन को जल की जगह पृथिवी तथा पृथिवी की जगह जल दिखलायी दिया था) पादुकासिद्धि, सम्भोगयक्षिणी की सिद्धि, मारण आदि हैं। ६४ शाक्त तन्त्र ग्रन्थों के अतिरिक्त अन्य ६४ तन्त्र ग्रन्थों की भी सूची मिलती है। वे हैं काली, तारा, मुण्डमाला, निर्वाण, शिवसार आदि। ये सभी शाक्त तन्त्र जागतिक सिद्धि अथवा ऐहिक ऐश्वर्य के लाभ के लिये हैं।
शाक्ततन्त्रों के अतिरिक्त शुभागम पत्र्चक की भी चर्चा मिलती है। वे हैं वशिष्ट संहिता, सनक संहिता, सनन्दन संहिता, सनत्कुमार संहिता और शुक संहिता। ये संहितायें समय मार्ग से सम्बद्ध हैं।

Thursday, December 18, 2008

तन्त्रसाहित्य का विशाल भण्डार था भारत में

प्रस्तुति :-आयुष्मान

शैव तन्त्र की तीन शाखायें हैं भेदवादी, भेदाभेदवादी और अभेदवादी। इनमें से प्रथम का प्रचलन शैव सिद्धान्त के नाम से तमिलनाडु में है। दूसरी शाखा वीर शैव के नाम से कर्णाटक में क्षीण दशा में है। तीसरी शाखा का प्रचलन काश्मीर में हुआ। यद्यपि कुछ लोग इसका मूल मध्य प्रदेश में मानते हैं। अभेदवादी शैव दर्शन को त्रिक दर्शन या प्रत्यभिज्ञा दर्शन के नामों से भी जाना जाता है।

आज तक की प्राप्त सूचनाओं के आधार पर लगभग २०० प्राचीन तन्त्र ग्रन्थों का नाम मिलता है। इनमें से भी बहुत से उपलब्ध नहीं हैं। वाराही तन्त्र के अनुसार यहां के तान्त्रिक ग्रन्थों में ९५७९५० श्लोक मिलते हैं। प्राचीन काल में भारत वसुन्धरा पर तन्त्रसाहित्य का विशाल भण्डार विद्यमान था। भेदप्रधान शैवागमों की संख्या १०, भेदाभेदप्रधान शैवागमों की १८ और अभेदवादी शैवागमों की संख्या ६४ है। इन ६४ आगमों का वर्गीकरण अष्टकों में हुआ है। आठ अष्टकों वाले इस भैरवागम के अष्टकों के नाम निम्नलिखित हैं१. भैरवाष्टक २. यामलाष्टक ३. मत्ताष्टक ४. मङ्गलाष्टक ५. चक्राष्टक ६. बहुरूपाष्टक ७. वागीशाष्टक ८. शिखाष्टक।

Tuesday, December 16, 2008

तंत्र में भी आडम्बर घर करता जा रहा है।


अत्रि मुनि के तीन पुत्र थे दुर्वाशा, दत्तात्रेय और चन्द्रमा। ये तीनों क्रमशः शिव, विष्णु और ब्रह्मा के अंश थे। मुनि ने इन तीनों को तीन प्रकार के तन्त्रों की दीक्षा दी थी। दुर्वाशा को शैव तन्त्र, दत्तात्रेय को अघोर तन्त्र और चन्द्रमा को वैष्णव तन्त्र की दीक्षा दी गयी। इन में से चन्द्रमा की तन्त्र परम्परा आज विद्यमान नहीं है।

प्राचीन काल में शैव, शाक्त, पाशुपत, भागवत, लकुलीश, गाणपत्य, पांचरात्र आदि तन्त्रों का प्रचलन इस देश में था। इनके अतिरिक्त बौद्ध और जैन तन्त्र भी इस देश में प्रचलित थे। कालक्रम के प्रभाव से बौद्ध तन्त्र भारत के बाहर चला गया और शैव आदि में से अनेक तन्त्रों की परम्परा उच्छिन्ना हो गयी। सम्प्रति केवल शैव और शाक्त तन्त्र ही जीवित हैं। इनमें भी आडम्बर घर करता जा रहा है।

तन्त्र का आविर्भाव और उसकी विधायें

वेद अनादि और अपौरुषेय हैं। ये महात्मा विष्णु के निःश्वास हैं ÷यस्य निःश्वसितं वेदाः' प्रारम्भ में वेद एक ही था। कालान्तर में शिष्यों की सुविधा को ध्यान में रखकर इसके तीन भाग किये गये ऋग, यजुः और साम। इन तीनों के समूह को त्रयी कहा गया। अथर्व वेद का संकलन बाद में हुआ। वेदों की भाँति तन्त्र भी अपौरुषेय हैं। प्रारम्भ में ये ध्वनि रूप में प्रकट हुये। बाद में परमेश्वर ने अपने लीलास्वातन्त्र्य के कारण अपने को उमापतिनाथ एवं उमा के रूप में अवतारित कर इस शास्त्र को प्रश्न और उत्तर के रूप में विस्तारित किया। इस प्रकार यह शिवमुखोक्त शास्त्र कहलाने लगा। यह तन्त्र शास्त्र भी पहले एक ही था किन्तु आधारभेद के कारण इसकी अनेक विधायें हो गयीं। इस अवतार क्रम में यह शास्त्र ऋषियों को प्राप्त हुआ और वे ही इसके प्रयोक्ता हुए। शैव आदि रहस्यशास्त्र अर्थात्‌ तन्त्रशास्त्र सत्ययुग आदि में महात्मा ऋषियों के मुख में विद्यमान रहा करते थे। वे ही लोग अनुग्रह भी करते थे। कलियुग के प्रारम्भ में जब वे शास्त्र दुर्गम होने लगे और सिमट कर कलापि ग्राम में रह गये अन्यत्र उच्छिन्न हो गये तब कैलास पर्वत पर घूमते हुए भगवान्‌ श्रीकण्ठनाथ ने अनुग्रह के लिये अपने को पृथिवी पर अवतीर्ण किया और ऊर्ध्वरेता दुर्वाशा को आज्ञा दी कि यह शास्त्र उच्छिन्ना न हो इसलिये रहस्य शास्त्र का वैसा प्रचार करो। अत्रि मुनि के तीन पुत्र थे दुर्वाशा, दत्तात्रेय और चन्द्रमा। ये तीनों क्रमशः शिव, विष्णु और ब्रह्मा के अंश थे। मुनि ने इन तीनों को तीन प्रकार के तन्त्रों की दीक्षा दी थी। दुर्वाशा को शैव तन्त्र, दत्तात्रेय को अघोर तन्त्र और चन्द्रमा को वैष्णव तन्त्र की दीक्षा दी गयी। इन में से चन्द्रमा की तन्त्र परम्परा आज विद्यमान नहीं है। प्राचीन काल में शैव, शाक्त, पाशुपत, भागवत, लकुलीश, गाणपत्य, पांचरात्र आदि तन्त्रों का प्रचलन इस देश में था। इनके अतिरिक्त बौद्ध और जैन तन्त्र भी इस देश में प्रचलित थे। कालक्रम के प्रभाव से बौद्ध तन्त्र भारत के बाहर चला गया और शैव आदि में से अनेक तन्त्रों की परम्परा उच्छिन्ना हो गयी। सम्प्रति केवल शैव और शाक्त तन्त्र ही जीवित हैं। इनमें भी आडम्बर घर करता जा रहा है।

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