आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Wednesday, November 14, 2012

एक दीप जलाना ही होगा


दीपावली के पावन पर्व पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। दीपावली का पर्व, पर्वों का समूह है तथा भिन्न भिन्न आधारों पर भिन्न भिन्न सम्प्रदायों द्वारा एक ही स्वरूप से मनाया जाने वाला त्यौहार है। दुनिया भर के लोग इस स्याह रात के तिमिर को दीप जलाकर तिरोहित करते हैं।
दुनिया के सभी धर्मों में अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की बात कही गयी है। अंधकार का स्वामी शैतान माना जाता है और प्रकाश का गुरु। अंधकार झूठ का प्रतीक है और प्रकाश सत्य का। सार्वभौम जगतगुरु सूर्य अपने दैदीप्तमान प्रकाश के कारण ही सर्वत्र पूज्य है।
सूक्त वाक्य ÷तमसोमा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्ममा अमृतगमय' कहता है कि हमारी यात्रा अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर होनी चाहिए। जब जन्म है तो मृत्यु निश्चित है। अतः अमरत्व तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम जन्म को प्राप्त न हों। और बार बार जन्म लेने से बचना तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम स्वयं पूर्ण प्रकाशित न हों। पूर्ण प्रकाशित होकर ही स्वयं को उस दिव्य प्रकाश में समा पाना सम्भव है।
दीपावली के पर्व पर हम केवल दरवाजों पर दीप ही नहीं जलाते वरन अपने घरों की सफाई भी करते हैं। हमारे घरों में जमे हुए कबाड़ को निकालकर इस दिन हम बाहर फैंक देते हैं। दीपावली की रात्रि में पूजन के उपरांत प्रातः पौ फटने से पहले हमारे घरों की माताएं सूप को पीटकर आवाज देती हैं कि लक्ष्मी का आगमन हो रहा है अतः दरिद्र तू चला जा।
कचरा निकलने पर ही मां लक्ष्मी घर में प्रवास करती हैं। दीप जलने से   अंधकार भाग जाता है। यह व्यवस्था जिस प्रकार घर में है ठीक उसी प्रकार हमारे अंदर भी है। अंदर अगर पूवाग्रहों का कचरा भरा है तो मां लक्ष्मी कहां निवास करेंगी। पहले हमें अपने अंदर से कचरा निकालना होगा। यह कचरा है हमारे संस्कारों का। कई लोग कहते हैं कि ये संस्कार तो हमें विरासत में मिले हैं या कि हमने बड़े जतन से एकत्रित किए हैं, इन्हें कैसे निकाल दें। क्या घर में से जो कबाड़ निकाला है, वह भी जतन से ही एकत्रित किया था। हमें आगे बढ़ना है, प्रकाश लाना है तो एक दीप जलाना ही होगा.................................संजय भइया

Friday, November 21, 2008

कल्याण का मार्ग सत्य का अनुसरण ही है।

ईशोपनिषद् में भक्त समस्त प्राणिमात्र का पोषण करने वाले सत्य स्वरूप सर्वेश्वर, जगदाधार परमेश्वर से कहता है कि हे सत्य स्वरूप! आपका श्रीमुख स्वर्णिम, ज्योतिर्मय सूर्य मण्डल रूप पात्र से ढका हुआ है। अपने सत्यनिष्ठ भक्त की मनोकामना पूर्ति हेतु आप अपने सच्चिदानन्द स्वरूप को निरावरण कर प्रत्यक्ष प्रकट करें:

'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्‌। तत्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥'

सत्ता मात्र 'सत्‌' है। इसके अतिरिक्त प्रकृति और प्रकृति का कार्य क्रिया और पदार्थ है, वह 'असत्‌' न कभी था, न है और न कभी रहेगा और 'सत्‌' का कभी भी अभाव नहीं होता। 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।' अतः मानव को विवेकपूर्वक अपने तन, मन एवं बुद्धि का प्रयोग करना चाहिए। स्वेच्छाचार पतन की ओर ले जाता है, सदाचार नैतिकता का आधार है। कल्याण का मार्ग सत्य का अनुसरण ही है।

प्रस्तुति : -परमजीत

Thursday, November 20, 2008

आनंद प्रतिगामी है सत्य का

उपनिषद इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं: 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' अर्थात्‌ ब्रह्म सत्य स्वरूप, ज्ञान-स्वरूप एवं अनन्त है और जब ब्रह्म 'रसो वै सः' है, परिपूर्ण आनन्द है तब सत्य का आश्रय परिपूर्ण आनन्द ही प्रदान करेगा अन्यथा कुछ भी नहीं, जो हमारी खोती जा रही शांति वापस ला सकता है। सत्य परमात्मा तत्व है।

तत्व के संबंध में कहा गया हैः 'अनारोपिता कारं तत्वम्‌' उसका कोई रूप नहीं होता। स्वर्ण आभूषणों का तत्व नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह आभूषणों से पूर्व टुकड़े के रूप में होता है। तत्व एक देशीय पदार्थ न होकर सर्वव्यापी तथा दृष्टि से परे होता है तथा अनुभवजन्य होता है। वैसे ही सत्य भी अनुभवजन्य है। जैसे आत्मा की सत्ता सदैव एवं सर्वथा अनुभव की जाती है किंतु उसका दर्शन संभव नहीं है, वैसे ही सत्य एक सुनिश्चित शक्ति सम्पन्न सिद्धान्त है जो सम्पूर्ण सृष्टि रूपी विराट शरीर का संचालक हृदय है। समय पर रितुओं का आना, वृक्षों का पुष्पित और फलित होना, सूर्य चन्द्रादि सहित सभी ग्रहों और आकाश गंगाओं का अपनी अपनी कक्षाओं में रहना आदि परम सत्य का ही प्रत्यक्ष दर्शन है। जन्म और मृत्यु दोनों ही शाश्वत सत्य पर ही आधारित हैं।

मंत्र द्रष्टा आचार्य अपने शिष्यों से संवाद के मध्य 'रितं वदिस्यामि, सत्यं वदिस्यामि' कह कर सत्य की परम सत्ता को ही पुष्ट करते हैं। 'रितं तपः, सत्यं तपः, स्वाध्यायां तपः' परम तप का द्योतक है। मुण्डकोपनिषद में 'सत्यमेव जयते नानृतं', सत्य के समक्ष असत्य को धराशायी करता है। यही तो देश का आस्था वाक्य है।

प्रस्तुति : -संगीता जोशी

Wednesday, November 19, 2008

सत्य की सत्ता सार्वभौमिक व सर्वोपयोगी है

सत्य की सत्ता सर्वोपरि है। आस्तिक या नास्तिक सभी इसे स्वीकारते हैं। सत्य की खोज, मानव की चिर पिपासा बनी हुई है। सभी धर्म, सभी विचारक सत्य के अन्वेषण हो ही अभीष्ट मानते हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् की श्रुति 'असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतमगमय' २०वीं सदी में मार्गदर्शन का अद्भुत कारण बनी। तीनों ही महावाक्य सत्य की ओर ही इंगित करने वाले हैं। ज्योति और अमृत भी सत्य का ही स्वरूप है। महात्मा गांधी ने 'असतो मा सद्गमय' से प्रकाश पाकर 'सत्य एवं अहिंसा को अपनाया। इसी के बल पर उन्होंने महाशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को पूर्णतः छिन्न-भिन्न कर डाला था। न केवल भारतवर्ष अपितु अनेक राष्ट्र सत्य और अहिंसा के आश्रय से योरोपीय देशों की सैंकड़ों वर्षों की पराधीनता से मुक्त हो गए। यह सत्य की महिमा है।

प्रस्तुति : -आशीष

शांति एवं आनन्द निहित है सत्य के आश्रय में

श्रुतियां मुक्त कंठ से सत्य की प्रतिष्ठा करती हैं, उनका गुण-गान करती हैं। परमात्मा सच्चिदानन्द स्वरूप है। आनन्द स्वरूप परमात्मा ही एक मात्र सत्य हैः ÷एकं सद् विप्रा वहुधा वदन्ति,' विद्वान उस एक सत्य को अनेक प्रकार से परिभाषित करते हैं, उसे अनेक नामों से जानते हैं। उस एक सत्य का दर्शन, मनन एवं निदिध्यासन ही उनका प्राप्तव्य होता है। श्री मद्भागवत महापुराण के महात्म्य के प्रारम्भ में ही उसे ÷सच्चिदानन्द रूपाय विश्वोत्पत्यादि हेतवे' कह कर सम्बोधित किया गया है। इस महापुराण के प्रथम स्कन्ध में मंगलाचरण के प्रथम श्लोक में ही उस विराट् परम पुरूष, जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के उद्भव- स्थिति- संहार का कारण है, का 'सत्यं परं धीमहि' कह कर स्तवन किया गया है। वह एक ही परम सत्य है जो अपनी स्वयं प्रभा ज्योति से माया को सदैव एवं सर्वदा बाधित रखता है। आज के युग में भौतिक जीवन की चकाचौंध में वास्तविक सुख एवं शांति विलीन होती जा रही है। भौतिक दृष्टि से जो सर्वाधिक सम्पन्न राष्ट्र हैं, वहां आत्महत्याएं एवं मानसिक रोग बढ़ रहे हैं। पाश्चात्यता का अंधानुकरण कर बहुत कुछ हमारा देश भी इसी और बढ़ रहा है। ऐसे में अपने पुरातन ग्रन्थों का आश्रय एवं मान्यताओं की पुनर्स्थापना ही हमें शांति प्रदान कर सकते हैं और शांति एवं आनन्द निहित है सत्य के आश्रय में, सदाचरण में।

प्रस्तुति : -शील सारस्वत

Tuesday, November 18, 2008

जो बोले सो निहाल सत्‌ श्री अकाल

एक फिल्म देखी थी 'जो बोले सो निहाल सत्‌ श्री अकाल''। सत्य पर विगत दो माह से चर्चा करते हुए यकायक उस फिल्म का स्मृति में आ जाना दिव्य रुद्र की कृपा मानकर मैंने उस पर चिंतन शुरू किया। मैंने गौर किया पिछले कुछ अंकों से सिख धर्म के विद्वान साथियों के लेख पत्रिका में नहीं आ रहे हैं। शायद इसी ओर दिव्य रुद्र ने ध्यान आकर्षित किया है। इस फिल्म ने अंतिम चरण में फिल्म का नायक, खलनायक को इसी आधार पर पहचानता है कि वह उसके जो 'बोले सो निहाल' कहने पर प्रत्युत्तर में ÷सत्‌ श्री अकाल' नहीं कहता। यह स्थापित मान्यता है कि चलचित्र समाज का आइना होते हैं। इस वक्तव्य को फिल्म के क्लाइमेक्स में लाकर फिल्म के निर्देशक ने बताने का प्रयास किया है कि वह सच्चा सिख नहीं जो ' सत्‌ श्री अकाल' कहकर वाक्य पूरा नहीं करता। इसका अर्थ यह हुआ कि 'जो बोले सो निहाल' पूर्ण नहीं है। पूर्णता के लिए 'सत्‌ श्री अकाल' बोलना होगा। न केवल बोलना होगा बल्कि उसे स्वीकारना होगा। प्रश्न यह उठता है कि इन तीन अक्षरों के बोलने से ही क्यों यह सिद्ध हो जाता है कि वह सच्चा सिख है, अर्थात्‌ सच्चा गुरू का शिष्य है। गुरूग्रंथ साहिब को सिख धर्म के अनुयायी सम्पूर्ण ज्ञान या सम्पूर्ण गुरू मानते हैं। अर्थात्‌ उसके लिए यही वह तत्व हैं जो उनकी अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। निहाल वही है जो यह जान जाता है कि ÷सत्‌ श्री अकाल' अर्थात्‌ सत्य वह है जिसे काल नहीं खा सकता अर्थात्‌ जो समाप्त नहीं हो सकता। जो कट नहीं सकता, जो शास्वत है, जो सदा से था और सदैव रहेगा। "सत्‌ श्री अकाल'' अर्थात्‌ सत्य अविनाशी है। हम जानते हैं कि भौतिक जगत में जो कुछ दिखता है वह नाशवान है। हर किसी को काल का ग्रास बनना है। चाहे वह राम हो, कृष्ण हो, ईसा हो, मूसा हो, मुहम्मद साहिब हों, गौतम हों, महावीर हों, चाहें गुरू नानक देव। अर्थात्‌ जिस पर ये नाम के लेबिल लगे वे सभी नाशवान थे। और जिन पर आज लेबिल लगे हैं वे भी नाशवान हैं। अगर कोई अविनाशी है, काल से परे है तो वही सत्य है और वह अविनाशी 'अकाल' क्या है। क्या वह आत्मा नहीं जो सदैव सर्वदा वस्त्रों की भाँति शरीर को बदलता रहता है और शास्वत बना रहता है। जिसको काल नहीं खा सकता है। अर्थात्‌ सिख धर्म भी कहता है कि सत्य का नाश नहीं होता। तभी तो यह कहने पर पूर्णता होती है कि 'सत्‌ श्री अकाल'। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सत्य काल से परे हैं। वही शास्वत है, हमारे अंदर का आत्मा ही सत्य है। जो सत्‌ पुरख का अंश है। इस प्रकार एक सत्‌ पुरख सत्य है, जो शास्वत है। वही अविनाशी सत्य है चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारें।

Monday, November 17, 2008

अहिंसा व्रत की रक्षा करना ही सत्य का लक्ष्य

जो वस्तु जैसी देखी हो या सुनी हो, उसको वैसा ही न कहना लोक में असत्य कहलाता है, परन्तु जैन धर्म में सत्य कोई स्वतन्त्र व्रत नहीं है, बल्कि अहिंसा व्रत की रक्षा करना ही उसका लक्ष्य है। इसलिए, जो वचन दूसरों को कष्ट पहुँचाने के उद्देश्य से बोला जाता है वह सत्य होने पर भी जैन धर्म में असत्य कहलाता है। जैसे, काने पुरुषों को काना कहना यद्यपि सत्य है,किन्तु उससे उस मनुष्य के दिल को चोट पहुँचती है, या यदि चोट पहुँचाने के विचार से उसे काना कहा जाता है तो वह असत्य गिना जाएगा। इसी दृष्टि से, यदि सत्य बोलने से किसी के प्राणों पर संकट बन आता हो तो उस अवस्था में सत्य बोलना भी बुरा कहा जाएगा। किन्तु ऐसे समय असत्य बोल कर किसी के प्राणों की रक्षा करने से यदि उसके जुल्म और अत्याचारों से दूसरों के प्राणों पर संकट आने की संभावना हो तो उक्त नियम में अपवाद भी हो सकता हैऋ क्योंकि यद्यपि व्यक्ति के जीवन की रक्षा इष्ट है, किन्तु व्यक्ति के जुल्म और अत्याचारों की रक्षा किसी भी अवस्था में इष्ट नहीं है। और अत्याचारों के परिशोध के लिए व्यक्ति या व्यक्तियों की जान ले लेने की अपेक्षा उनका सुधार कर देना अति उत्तम है। यदि यह शक्य न हो तो अन्याय और अत्याचारों को सहायता देना तो कभी भी उचित नहीं है। मगर व्यक्ति सुधर सकता है, इसलिए उसे अवसर अवश्य देना चाहिए। प्राण-रक्षा के लिए असत्य बोलने के मूल में यही भाव है।
असत्य वचन के अनेक भेद हैं, जैसे
१ मनुष्य के विषय में झूठ बोलना, शादी-विवाह के अवसरों पर विरोधियों के द्वारा इस तरह से झूठ बोलने का प्रायः चलन है। विरोधी लोग विवाह न होने देने के लिए किसी की कन्या को दूषण लगा देते हैं, किसी के लड़के में बुराइयाँ बता देते हैं।
२ चौपायों के विषय में झूठ बोलना। जैसे, थोड़ा दूध देने वाली गाय को बहुत दूध देने वाली बताना, या बहुत दूध देने वाली गाय को थोड़ा दूध देने वाली गाय बताना।
३ अचेतन वस्तुओं के विषय में झूठ बोलना। जैसे दूसरे की जमीन को अपनी बताना या टेक्स वगैरह से बचने के लिए अपनी जमीन को दूसरे की बताना।
४ घूस के लोभ से या ईर्ष्या होने से किसी सच्ची घटना के विरुद्ध गवाही देना।
५ अपने पास रखी हुई किसी की धरोहर के संबन्ध में असत्य बोलना।
ये और इस तरह के अन्य झूठ वचन गृहस्थ को नहीं बोलना चाहिए। इससे मनुष्य का विश्वास जाता रहता है और अनाचार को भी प्रोत्साहन मिलता है, तथा जिनके विषय में झूठ बोला गया है उन्हें दुःख पहुँचता है और वे जीवन के वैरी बन जाते हैं। जो लोग कारबार-रोजगार में अधिक झूठ बोलते हैं और सच्चा व्यवहार नहीं रखते, बाजार में भी उनकी साख जाती रहती है। लोग उन्हें झूठा समझने लगते हैं और उनसे लेनदेन तक बन्द कर देते हैं।
बहुत से लोग झूठ बोलने की आदत न होने पर कभी-कभी क्रोध में आकर झूठ बोल जाते हैं, कुछ लोग लोभ में फँसकर झूठ बोले जाते हैं, कुछ लोग हँसी-मजाक में झूठ बोल जाते हैं। अतः सत्यवादी को क्रोध, लालच और भय से भी बचना चाहिए और हँसी-मजाक के समय तो एकदम सावधान रहना चाहिए क्योंकि हँसी-मजाक में झूठ बोलने से लाभ तो कुछ भी नहीं होता, उल्टे झगड़ा बढ़ जाने का ही भय रहता है और आदत भी बिगड़ती है।
प्रस्तुति : पं. कैलाश चन्द्र शास्त्री जैन सिद्धांताचार्य

Saturday, November 15, 2008

सत्य सौ जन्म के बाद भी प्रभाव पूर्ण

बात प्राचीन महाभारत काल की है। महाभारत के युद्ध में जो कुरुक्षेत्र के मैंदान में हुआ, जिसमें अठारह अक्षौहणी सेना मारी गई, इस युद्ध के समापन और सभी मृतकों को तिलांज्जलि देने के बाद पांडवों सहित श्री कृष्ण पितामह भीष्म से आशीर्वाद लेकर हस्तिनापुर को वापिस हुए तब श्रीकृष्ण को रोक कर पितामाह ने श्रीकृष्ण से पूछ ही लिया, "मधुसूदन, मेरे कौन से कर्म का फल है जो मैं सरसैया पर पड़ा हुआ हूँ?'' यह बात सुनकर मधुसूदन मुस्कराये और पितामह भीष्म से पूछा, 'पितामह आपको कुछ पूर्व जन्मों का ज्ञान है?'' इस पर पितामह ने कहा, 'हाँ''। श्रीकृष्ण मुझे अपने सौ पूर्व जन्मों का ज्ञान है कि मैंने किसी व्यक्ति का कभी अहित नहीं किया? इस पर श्रीकृष्ण मुस्कराये और बोले पितामह आपने ठीक कहा कि आपने कभी किसी को कष्ट नहीं दिया, लेकिन एक सौ एक वें पूर्वजन्म में आज की तरह तुमने तब भी राजवंश में जन्म लिया था और अपने पुण्य कर्मों से बार-बार राजवंश में जन्म लेते रहे, लेकिन उस जन्म में जब तुम युवराज थे, तब एक बार आप शिकार खेलकर जंगल से निकल रहे थे, तभी आपके घोड़े के अग्रभाग पर एक करकैंटा एक वृक्ष से नीचे गिरा। आपने अपने बाण से उठाकर उसे पीठ के पीछे फेंक दिया, उस समय वह बेरिया के पेड़ पर जा कर गिरा और बेरिया के कांटे उसकी पीठ में धंस गयेऋ क्योंकि पीठ के बल ही जाकर गिरा था? करकेंटा जितना निकलने की कोशिश करता उतना ही कांटे उसकी पीठ में चुभ जाते और इस प्रकार करकेंटा अठारह दिन जीवित रहा और यही ईश्वर से प्रार्थना करता रहा, 'हे युवराज! जिस तरह से मैं तड़प-तड़प कर मृत्यु को प्राप्त हो रहा हूँ, ठीक इसी प्रकार तुम भी होना।'' तो, हे पितामह भीष्म! तुम्हारे पुण्य कर्मों की वजह से आज तक तुम पर करकेंटा का श्राप लागू नहीं हो पाया। लेकिन हस्तिनापुर की राज सभा में द्रोपदी का चीर-हरण होता रहा और आप मूक दर्शक बनकर देखते रहे। जबकि आप सक्षम थे उस अबला पर अत्याचार रोकने में, लेकिन आपने दुर्योधन और दुःशासन को नहीं रोका। इसी कारण पितामह आपके सारे पुण्यकर्म क्षीण हो गये और करकेंटा का 'श्राप' आप पर लागू हो गया। अतः पितामह प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी तो भोगना ही पड़ेगा। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु को भी भोगना पड़ता है और कर्मों के ही अनुसार ही जन्म होता है।

प्रस्तुति : सुनीलदत्त शर्मा "शैलेश'' हि. इ. कॉलेज अलीगढ़

Sunday, November 9, 2008

सत्य मार्ग में आत्मसातीकरण आवश्यक

आत्मसातीकरण :- एक श्रावक को साधना के पथ पर आगे बढ़ने के लिए तथा सत्य को आत्मसात करने के लिए गुरुदेव के पावन सानिध्य में कम से कम तीन दिन रहकर अनुशासित जीवन व्यतीत करते हुए साधना करने की प्रक्रिया को सीखना होता है जिसको सीखकर निरंतर करते रहने से वह सत्य को आत्मसात करने योग्य साधक बन जाता है। यह अत्यंत ही सरल एवं सहज पद्धति है। जो श्री गुरुदेव के दीक्षित शिष्य बनना चाहें वे श्रावक बनकर साधना करते हुए सत्य को आत्मसात कर सकते हैं। आओ बढ़कर इस अवसर का लाभ उठाएं। सत्य के सागर में गोते लगाने हेतु उद्यत हों। कृपया उक्त के संदर्भ में अपने विचार संप्रेषित करें।

हमारा पता है- रुद्र संदेश १ शारदापुरम, क्वार्सी थाने के सामने, रामघाट रोड, अलीगढ़-२०२००१

Saturday, November 8, 2008

सत्य मार्ग में मनन का महत्व

२. मनन :- साधना के प्रथम चरण में इस पद्यति में प्रवेश लेकर एक माह तक गुरुदेव द्वारा विरचित ज्ञानयोग चर्चा का श्रवण करता है तथा अपना जीवन अनुशासित रखना सीखता है जिसके अंतर्गत प्रातः एवं संध्याकाल में दीप प्रज्वलित कर उसके सम्मुख बैठकर आधा घण्टा प्रातः व आधा घण्टा सायंकाल कैसेट, ब्ण्क्ण् का श्रवण या पुस्तकों का ध्यानपूर्वक पढ़ता है। रात्रि को सोने से पूर्व दस मिनट के लिए शवासन की मुद्रा में आज के दिन श्रवण किए गए ज्ञान वाक्यों का मनन करता है। एक माह के निरंतर श्रवण एवं मनन करने पर वह श्रावक बन जाता है।

Friday, November 7, 2008

सत्य मार्ग में श्रवण महत्वपूर्ण

१. श्रवण :- सर्वप्रथम पूज्य गुरुदेव सत्य का प्रकटीकरण वेदों, उपनिषदों, पुराणों, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब आदि ओल्ड टेस्टामेण्ट, न्यूटेस्टामेण्ट के आधार पर अपने प्रवचनों के माध्यम से करते हैं। गुरुदेव स्पष्ट रूप से कहते हैं कि सत्य वह है जो किसी से कटे नहीं। जिसे सभी ग्रंथ अकाट्य रूप से स्वीकार करें, वही सत्य है।

Thursday, November 6, 2008

सत्य मार्ग साधना का परिचय

भारतीय सनातन परम्परा एक ऐसी गार्मेन्ट शॉप है जहाँ हर किसी के लिए उपयुक्त वस्त्र उपलब्ध हैं। यहाँ कोई बाध्यता नहीं कि आपको एक निश्चित साइज का कपड़ा ही पहनना पड़े। यदि आपके अंदर समर्पण का भाव है तो श्रीमद् भगवतगीता में भगवान श्रीकृष्ण द्वारा बताया गया भक्ति योग आपके लिए उपलब्ध है। जी हाँ! अगर आप समर्पण को अंधविश्वास मानते हैं। आपके अंदर जानने की प्रवृत्ति है तो आइए ज्ञान योग में आपका स्वागत है और अगर आप ज्ञान और भक्ति को फिजूल मानते हें और कर्म पर विश्वास करते हैं तो सहजरूप से आप कर्मयोग को अपनाएं।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि उक्त तीनों में से किसी एक योग को धारण करने वाला व्यक्ति शेष दो को स्वतः प्राप्त कर लेता है और यही सत्य मार्ग है जो हमारे पूज्य गुरुदेव ने आदि गुरु से प्राप्त किया। उसे आज के परिवेश में परिमार्जित कर जन सामान्य के लिए, अपने गुरुदेव की आज्ञा से प्रकटीकरण कर दिया है। सत्यमार्ग साधना तीन चरणों में होती है-

१। श्रवण २. मनन ३. आत्मसातीकरण

Monday, November 3, 2008

सत्य का ज्ञान क्या है- जैसा गुरुदेव ने बताया

हमारे तथा सत्य के बीच सिर्फ एक अज्ञान का ही आवरण है। इस बात को दर्शाने के लिए एक कथा गुरु कहते हैं जो इस प्रकार हैं- एक राजा था। उसका एक राजकुमार था जो बाल्यावस्था में ही यात्रा के दौरान राजा-रानी से बिछुड़ गया। भटकते-भटकते वह एक ऐसे स्थान पर पहुँच गया जहाँ एक कबीला रहता था। कबीले के सरदार की दृष्टि उस पर पड़ी तो उसने उसे पालने की ठानी। उधर राजा ने उसको बहुत खोजा पर असफल रहा। अब तो राजकुमार वहीं पलने लगा और खुद को कबीले का ही सदस्य समझने लगा। राजा बूढ़ा हो चला था। उसे अपने राज्य के उत्तराधिकारी को एक बार पुनः खोजने की इच्छा जाग्रत हुई और एक अन्तिम प्रयास के लिए उसने अपने मन्त्रियों को आदेश दिए। अब राजा के आदमी पूरे राज्य में चप्पे-चप्पे पर पूछताछ करने लगे। एक आदमी उस कबीले तक भी पहुँचा वहाँ उसकी दृष्टि उस राजकुमार पर ही पड़ी जो कबीले की वेशभूषा में भी अन्य कबीले के सदस्यों से भिन्न दिख रहा था तो उत्सुकतावश राज्य के उस आदमी ने कबीले के सरदार से उसके बारे में पूछा तो सरदार ने सच-सच बता दिया कि वह किन परिस्थितियों में कब उसे मिला था। राजकुमार उस समय जो कपड़े पहने हुए था, वह भी दिखा दिया। अब तो राजा को भी वहाँ बुला लिया गया। राजा के संदेह करने पर उस सरदार ने राजकुमार जब उसे मिला था तो जिन वस्त्राभूषणों को धारण किए था, वह सब उसे दिखा दिए। अब राजा को और राजकुमार को भी उस पर भरोसा हो गया। राजकुमार जो अब तक कबीले के संस्कारों के कारण स्वयं को कबीले का सदस्य मानता था, वह अब समझ गया था कि वह तो असल में राजकुमार है। पढ़ने सुनने में यह किसी हिन्दी फिल्म की कहानी की तरह ही लगेगी परंतु यह ÷कथा' है। अपने स्वरूप के ज्ञान की जो कि बस अज्ञान के आवरण के हटने से स्वतः प्राप्त हो जाता है। हमारी आत्मा जब इस संसार में शरीर धारण करके आती है तो समझो कि कबीले में आ गया-राजकुमार। अब संसार में नाम, रूप, कुल, गोत्र, संस्कार ये सब ही हमें हमारी पहचान लगने लगते हैं दूसरों की भी यही पहिचान हम जानते हैं। पर हम तो हैं ही 'राजकुमार' वह सत्‌चित्‌ आनन्द स्वरूप आत्मा जो अजर अमर अविनाशी है। बस उस राजकुमार के समान इस 'सत्य' का विस्मरण हो गया है पर जब गुरु के ज्ञान का प्रकाश फैलता है तो हमें हमारे पुराने कपड़े दिखाए गए मानें। वह हमें यह निश्चय पक्का करा देते हैं कि हम हैं ही आत्मा और हर तरफ, हर जगह है ही 'राजा' परमात्मा की सत्ता। सत्य तो स्वतः सिद्ध है, सदा है, अक्षर है, बस उसका विस्मरण हो गया है।

आइए गुरु की शरण में चलें जो अज्ञान के आवरण को हटाकर हमें हमारे स्वरूप का स्मरण करा दें, तो हम भी अर्जुन की तरह कह सकें- स्मृतिर्लब्धा नष्टों मोहः अर्थात्‌ मुझे अपने स्वरूप का स्मरण हो गया है और मेरा मोह, अज्ञान नष्ट हो गया है।

Saturday, November 1, 2008

बापू के जीवन की सत्य की पहली जीत

सत्य की ताकत को महात्मा गांधीजी ने अपने बचपन में ही अनुभव कर लिया था। सत्य के प्रयेग नामक पुस्तक में अपने संस्मरणों में उन्होंने स्वीकार किया कि बचपन में उन्होंने एक बार चोरी की। उन्होंने अपने भाई का सोना चुरा लिया था। कोमल हृदय पर इस पाप का इतना बोझ पड़ा कि वे विचलित रहने लगे।

उन्होंने एक पत्र लिखकर इस सत्य को अपने पिता को लिखकर दे दिया। प्रारम्भ में उने पिता कुछ नाराज अवश्य हुए लेकिन पुत्र के सत्य को स्वीकारने के इस साहस को देखकर उन्होंने गांधीजी को क्षमा कर दिया और सत्य को साथ रखने के कारण ही बापूजी राष्ट्रपिता बने। http://rudracomputereducation.blogspot.com/

Tuesday, October 28, 2008

काण्ट ने भी माना था कि जगत सत्य नहीं

काण्ट ने वास्तविक स्वरूप और दृश्य भाग में अंतर माना है। काण्ट ने बुद्धि के तार्किक विश्लेषण द्वारा अपने समय के आदेशवाद तथा संशयवाद का खंडन करके स्वतंत्र परिणाम निकाला था कि संसार जो काल, कारण तथा दिक्‌ से विशिष्ट है, कोई तात्विक सत्यता नहीं रखता, वहाँ यह भी माना है कि इस संसार की कम से कम दृश्य रूप में एक सत्ता है जो व्यावहारिक दृष्टि से सत्य है। जगत्‌ न तो मायारूप ही कहा जा सकता है और न यह वास्तव में ब्रह्म से भिन्न है। कार्य कारण का संबंध एकत्व प्रमाणित करता है। विश्व सत्यतः ब्रह्म है।

ब्रह्म संसार और व्यक्तिगत आत्मा की भाँति स्वयं अपनी इच्छा से प्रकट होता है और उसके सहज गुण में कोई विकार नहीं होता। वही जगत्‌ का समवायि (वास्तु'' तथा निमित्त दोनों ही कारण है। पक्षपात तथा अत्याचार का दोष ब्रह्म पर आरोपित नहीं किया जा सकता क्योंकि बल्लभाचार्य ने जीव को ब्रह्म से भिन्न माना है। उनका कथन है कि जीव जब माया के बंधन से मुक्त हो जाता है तो ब्रह्म के साथ एक हो जाता है।

Thursday, October 23, 2008

जो निराकार है वह सत्य है।

सत्य एक है। भिन्नता और अनेकता केवल भ्रममात्र हैं। पृथ्वी पर भिन्नता, अनेकता नहीं है। जो यहाँ झूठी भिन्नता अर्थात अनेकता देखता है वह मृत्यु के बाद मृत्यु को प्राप्त होता है अर्थात बार-बार मरता है। इस अप्रमेय और ध्रुव सत्‌ को केवल एकत्व के रूप में देखना चाहिए। वास्तव में देखने वाला केवल 'सर्व' को देखता है और सर्वशः सर्व को प्राप्त करता है।''

वही एक सत्य ब्रह्म है जो अभिन्न और एक है। जब मनुष्य इस ज्ञान को भूल जाता है कि सब कुछ निश्चय ही एक ब्रह्म है तब यह रूपात्मक जगत्‌ या निकृष्ट ब्रह्म सत्य प्रतीत होने लगता है, जहाँ प्रत्येक वस्तु भिन्न और पूर्ण सत्तात्मक प्रतीत होने लगती है-तात्पर्य यह है कि यह माया या भ्रम है।

इसीलिए मैत्रेयी उपनिषद् दोनों ब्रह्म के विषय में साफ़ साफ़ कहती हैं, "ब्रह्म के निश्चय दो रूप हैं- एक साकार और दूसरा निराकार। जो साकार है वह असत्य है और जो निराकार है वह सत्य है।

प्रस्तुति : सुमित्रा सिंह

Sunday, October 19, 2008

सत्यः जिसको जानने से जो मालूम नहीं है वह भी मालूम हो जाता है

जब श्वेतकेतु अपने गुरु के यहाँ से अभिमान और आत्म-संतोष से भरा तथा अपने को विद्वान्‌ समझता हुआ घर लौटा तब उसके पिता ने पूछा कि क्या तुम्हारे गुरु ने तुम्हें उस अंतिम सत्‌ का ज्ञान कराया "जिसको सुनने से जो सुनाई नहीं पड़ता, वह भी सुनाई दे जाता है, जिसके ऊपर विचार करने से जिसका विचार नहीं किया था, वह भी विचार में आ जाता है जिसको जानने से जो मालूम नहीं है वह भी मालूम हो जाता है''

श्वेतकेतु ने अपना अज्ञान साफ़-साफ़ स्वीकार कर लिया और पिता से प्रार्थना की कि बताइए वह परम ज्ञान क्या है। तब उसके पिता आरुणि ने कहा कि "जिस प्रकार एक मिट्टी के ढेले का ज्ञान प्राप्त करने से मिट्टी की बनी हुई सब वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि अन्य सब केवल विकार मात्र हैं उनमें केवल नाम और रूप का अंतर है, आधार सबका मिट्टी ही हैं जिस प्रकार एक लोहे के टुकड़े के ज्ञान से लोहे की बनी हुई सब वस्तुओं का ज्ञान हो जाता है, क्योंकि अन्य सब विकारमात्र हैं उनमें केवल नाम और रूप का अन्तर है, आधार सबका केवल लोहा है जिस प्रकार एक कैंची का ज्ञान प्राप्त कर लेने से पक्के लोहे की बनी हुई सब चीजों का ज्ञान हो जाता है- क्योंकि अन्य सब विकारमात्र हैं उनमें केवल नाम और रूप का भेद है और सबका आधार पक्का लोहा है तो उसका पूर्ण ज्ञान हो जाता है, क्योंकि सबका आधार केवल ब्रह्म है जो स्वानुरूप, आत्मस्थ और आत्म-ज्ञात है।'' उपर्युक्त वाक्य का भाव यह है कि प्रत्येक वस्तु जिसका अस्तित्व है, ब्रह्म है और satya है।।

प्रस्तुति : खुशबू choudhary

Friday, October 17, 2008

निरपेक्ष ही केवल सत्य है


भारतीय विचार-धारा का मूल आधार यह है कि विश्व एक हैऋ इसके भीतर या बाहर किसी प्रकार की विभिन्नता नहीं है। कठोपनिषद् में कहा है कि "जो इस संसार में विभिन्नता अथवा अनेकत्व देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को जाता है। अभिन्नता अथवा एकत्व केवल उच्च स्तर की बुद्धि द्वारा ही देखा जा सकता है।'' ब्रह्म की संपूर्ण सत्ता सर्वत्र एक समान है और इसके किसी एक अंग का ज्ञान प्राप्त करना संपूर्ण के ज्ञान प्राप्त करने के समान है। इस प्रकार निरपेक्ष ही सत्य है।


प्रस्तुति : आशीष

Thursday, October 16, 2008

मुंडकोपनिषद् के अनुसार सत्य





मुंडकोपनिषद् में बृहद्रथ पूछता है, "इस दुर्गन्धपूर्ण और जो मल-मूत्र, वायु, पित्त, कफ का एक ढेर मात्र है, और जो अपने ही अस्थि, चर्म, स्नायु, मज्जा, मांस, वीर्य, रक्त, श्लेष्म और अश्रु से नष्ट हो जाता है, उस सारहीन शरीर को अभिलाषाओं की पूर्ति से क्या लाभ है? यह शरीर काम, क्रोध, लोभ, भय, नैराश्य, द्वेष, प्रिय से पार्थक्य, अप्रिय से मेल, भूख, प्यास, जरा, मृत्यु, रोग और दुःख से ग्रस्त है। इसकी अभिलाषाएं पूरी करने से क्या लाभ? निश्चय ही यह समस्त ब्रह्म जगत्‌ नाशवान्‌ है। कीड़े और पंतगों तथा घास और वृक्षों को देखो, वे केवल नष्ट होने के लिए पैदा होते हैं। इनकी तो बात ही क्या है? बड़े-बड़े समुद्र सूख जाते हैं, पर्वत चूर-चूर हो जाते हैं, ध्रुव अपने स्थान से डिग जाता है, पर्वत-मालाएँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं, पृथ्वी जल-मग्न हो जाती है और स्वयं देवतागण भी अपने स्थान से हट जाते हैं।''


प्रस्तुति : राम मूर्ती सिंह मुरादाबाद

Monday, October 13, 2008

कठोपनिषद के अनुसार शास्वत ही सत्य है।

कठोपनिषद् (१. १. २८) विचारपूर्ण ढंग से पूछता है- "कभी जराग्रस्त न होने वाले अमीरों के समीप पहुँचकर और उनके जीवन का उपभोग करके इस लोक में रहने वाला कौन जराग्रस्त मनुष्य होगा (जो केवल शारीरिक वर्ण के राग से प्राप्त होने वाले) सौन्दर्य और प्रेम के सुखों की चिंता से पूर्ण जीवन में सुख मानेगा?'' उसी भाव से कठोपनिषद् एक क्षण भर की अमर जीवन की चिंता के सामने इन्द्रिय सुख से पूर्ण एक दीर्घजीवन की निंदा करता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि शास्वत ही सत्य है।

प्रस्तुति : जन्मेजय

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