हज एक ऐसी पूजा है, जिसमें शारीरिक क्षमता व आर्थिक क्षमता का होना अनिवार्य है। ये दोनों जिस किसी मुसलमान के पास हो, उसके लिए हज करना अनिवार्य है। कोशों में हज का अर्थ "किसी बड़े मक़सद का इरादा करना है।'' जिसके अन्तर्गत कुछ महत्वपूर्ण कार्य महत्वपूर्ण समय में किए जाने होते हैं। उम्रभर में एक बार हर मुसलमान (मर्द हो या औरत ) को हज करना अनिवार्य है, पर इसके लिए भी कुछ नियम हैं कि किन लोगों पर हज फ़र्ज है- जो लोग ख़ुदा को खुश रखना चाहते हैं और जो हज के स्थान तक पहुँचने की क्षमता रखते हैं। एक मुसलमान का बालिग़, आक़िल, आजाद होना और आर्थिक रूप से सम्पन्न होना हज की अनिवार्य शर्तें हैं। अगर कोई शख्स अपाहिज या फालिज है या इतनी उम्र हो चुकी है कि (जईफी) बुढ़ापे के कारण सवारी पर बैठ नहीं सकता, ऐसे लोगों पर ये भी फजर् नहीं है कि अपने बदले किसी अन्य से हज करने के लिए कहें और स्वयं तो उन पर क़र्ज़ है ही नहीं। यदि कोई अन्धा है पर सवारी अर्थात् रुपया ख़र्च करने की क्षमता है, परन्तु उसे कोई साथ नहीं मिल पाता तो उस पर न तो हज की अनिवार्यता है, न अपने बदले किसी से हज करवाना। यदि महिला हज कर रही है तो उसके साथ उसके पति का होना या किसी महरम (वो शख्स जिससे निकाह होने वाला है, जो कि आक़िल (अक्ल वाला) बालिग़ होना अनिवार्य है। ) मनुष्य को हज पर जाने से पहले अपने कर्जों को चुका दिया जाना चाहिए, गुनाहों से तौबा की जाए, नीयत में मुहब्बत हो और अत्याचारों से दूर रहता हो, जिससे लड़ाई झगड़ा हो, उससे सफ़ाई कर ले, जो इबादतें रह गई हैं, उन्हें पूरा कर ले। ख़ुद को नुमाइश, अहंकार से दूर रखें, हलाल कमाई हो। किसी नेक आदमी को हमसफ़र बनाए ताकि जहाँ वह भटके, वह बताता रहे कि सही क्या है? इस्लाम के फ़र्ज़ नमाज , रोजा और जकात की भांति 'हज' भी अत्यन्त महत्वपूर्ण फ़र्ज़ है।
प्रस्तुति : डा- शगुफ्ता नियाज़
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Saturday, April 11, 2009
इस्लाम में हज है तीर्थ यात्रा
Tuesday, January 20, 2009
हुजुर ने बिस्मिल्लाह पढ़कर ताले को हाथ लगाया, दरवाजा खुल गया।
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने शबे मेराज में चार (४) नहरें देखीं, एक पानी की, दूसरी दूध की, तीसरी शराब की और चौथी शहद की। आपने जिब्रीले अमीन से पूछा ये नहरें कहाँ से आ रही हैं। हजरत जिब्रील ने अर्ज किया, मुझे इसकी ख़बर नहीं। एक दूसरे फ़रिश्ते ने आकर अर्ज की कि इन चारों का चश्मा मैं दिखाता हूँ। एक जगह ले गया, वहाँ एक दरख्त था, जिसके नीचे इमारत (मकान) बनी थी और दरवाजे पर ताला लगा था और उसके नीचे से चारों नहरें निकल रही थीं। फ़रमाया दरवाजा खोलो अर्ज की इसकी कुंजी मेरे पास नहीं है, बल्कि आपके पास है। हुजुर ने बिस्मिल्लाह पढ़कर ताले को हाथ लगाया, दरवाजा खुल गया। अंदर जाकर देखा कि इमारत में चार खंभे हैं और हर खंभे पर बिस्मिल्लाह लिखा हुआ है और बिस्मिल्लाह की मीम से पानी, अल्लाह की ह से दूध, रहमान की मीम से शराब और रहीम की मीम से शहद जारी है। अंदर से आवाज आई ऐ मेरे महबूब! आपकी उम्मत में से जो शख्स बिस्मिल्लाह पढ़ेगा, वह इन चारों का मुस्तहिक़ होगा। (तफ़सीरे नईमी जि. १, स. ४३)
Monday, January 19, 2009
जो शख्स बिस्मिल्लाह पढ़ता हो तो अल्लाह तआला उसके लिए दस (१०) हजार नेकियाँ लिखता है
रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया कि जो शख्स बिस्मिल्लाह पढ़ता हो तो अल्लाह तआला उसके लिए दस (१०) हजार नेकियाँ लिखता है और शैतान इस तरह पिघलता है, जैसे आग में रांगा। हर जीशान (अहम) काम जो बिस्मिल्लाह से शुरू न किया जाए, वह नातमाम (अधूरा) रहेगा और जिसने बिस्मिल्लाह को एक बार पढ़ा, उसके गुनाहों में से एक जर्रा भर गुनाह बाक़ी नहीं रहता और फ़रमाया जब तुम वुजू करो तो बिस्मिल्लाह वलहमदुलिल्लाह कह लिया करो, क्योंकि जब तक तुम्हारा वुजू बाक़ी रहेगा, उस वक्त तक तुम्हारे फ़रिश्ते (यानी किरामन कातिबीन) तुम्हारे लिए बराबर नेकियाँ लिखते रहते हैं। हजरत इब्ने अब्बास से रिवायत है रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम ने फ़रमाया की कोई आदमी जब अपनी बीवी के पास आए तो कहे बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम ऐ अल्लाह हमको शैतान से महफूज रख और जो तू मुझे अता फ़रमाए उससे भी शैतान को दूर रख और कोई औलाद हो तो शैतान उसे भी नुकसान नहीं पहुँचा सकेगा (बुख़ारी शरीफ जिल्दे अव्वल सफ़ा २६)।
Friday, October 10, 2008
इस्लाम में सत्य नेकी का रास्ता
१। सत्य (सिदक़) बोल और बात में होना चाहिए।
२। सत्य (सिदक़) इरादों में होना चाहिए।
३. सत्य (सिदक़) निश्चय और संकल्पों में होना
4। सत्य (सिदक़) वायदों को पूरा करने में होना चाहिए।
५। सत्य (सिदक़) ज्ञान में होना चाहिए।
६। सत्य (सिदक़) धार्मिक स्थानों में होना चाहिए।
इन सब अवसरों पर सत्य को अपनाने वाला ही सादिक़ (सत्यवादी) है। अबू अली दक़काक सिदक् को मन की माँगों से पाक रहना बताते हैं। जुनून मिजी सिदक़ (सत्य) को उसी समय पूर्ण मानते हैं जबकि साधक अपनी सच्चाई में एकनिष्ठ हो। अशरफ अली थानवी के अनुसार साधक जिस स्थिति में भी हो, वह चरम उत्कर्ष को पहुँची हुई हो, उसमें कमी न हो। यही सिदक् (सत्य) है। इसी से जो चरम उत्कर्ष को पहुँचा हुआ साधक होता है, उसको सिद्दीक (सत्यवादी) कहते हैं।
प्रस्तुतिः- डॉ. शगुफ्ता नियाज प्राध्यापिका,वीमेन्स कालिज, ए.एम.यू. अलीगढ़
Saturday, September 20, 2008
वैराग्य : इस्लाम की खानकाही व्यवस्था
सूफियों के नजदीक (वैराग्य) खानकाही व्यवस्था का जो महत्व है, उससे किसी को इन्कार नहीं हो सकता। खानकाहें इसी के प्रशिक्षण के लिए होती थीं।
हजरत मुहम्मद के समय एक चबूतरा बना हुआ था। इसे सुफ्फ़ कहते थे। यह स्थान उन लोगों के लिए मुख्य था, जो साधना में लगे रहते, शिक्षण प्रशिक्षण में व्यस्त रहते और जिनका काम यह था, कि सीखें और सिखाएं। ये लोग दुनिया के मामलों से अलग होकर आत्म संयम और मनोनिग्रह के कार्य करते और उसी की दीक्षा लेते। सादा जीवन और उच्च विचार वाले ये लोग, प्रेम का संदेश प्रसारित करने वाले ये उद्गम स्रोत, ही सूफियों की खानकाह का रूप धारण करने का कारण बने हैं।
सुफ्फ़ और खानकाह में कितनी एकरूपता है इसका उल्लेख सुहारावर्दी ने इस प्रकार किया है, कि "वह हर समय अपनी खानकाह में रहते थे और उसकी ख़बरगीरी करते थे।''
खानकाह सूफ़ियों की ऐसी जगह है जहाँ बूढ़े, जवान सभी होते हैं। बूढ़ों को ख़ुदा की खद के लिए एकान्त चाहिए होता है, जो खानकाह में मिल जाता है। जवान के स्वभाव से एकान्तवास अगर मेल नहीं खाता तो वहाँ रहने से उसे ऐसा प्रशिक्षण मिल जाता है कि धीरे धीरे वह भी एकान्तवास में रुचि लेने लगता है।
डॉ. रामपूजन तिवारी के अनुसार "खनकाह में रहने वाली तीन श्रेणियाँ थीं।
१. अहले खिदमत, २. अहले सोहबत और ३. अहले खलवत।
इसमें पहली श्रेणी के लोग वहाँ सेवा धर्म का पालन करते और इस प्रकार से जीवन यापन करते कि वे आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होते रहें और दूसरी श्रेणी के योग्य बन जाएं। जो नयी उम्र के हैं उनके लिए सोहबत की आवश्यकता है और बूढ़ों के लिए ख़लवत ;एकांत सेवनद्ध की आवश्यकता समझी जाती है।
उत्तरी भारत में अजमेर से लेकर बंगाल तक खानकाहों की पूरी एक पट्टी विकसित हुई जहाँ से धर्म प्रचारक, सूफ़ी प्रशिक्षण प्राप्त कर मीलों तक फैल जाते, छोटी छोटी ख़ानकाहें बनाते और अपने उत्तम चरित्र का विकास करते।
कालांतर में ये ख़ानकाहें अपनी आत्मा खोती चली गयीं। अब तो ये खानकाहें किसी पीर की समाधियाँ हैं या ऐश परस्ती के अड्डे। अब अन्य हर वस्तु की तरह उनमें भी विधिवत ह्रास आ चुका है
प्रस्तुति : डॉ. शगुफ्ता नियाज+ प्राध्यापिका, वीमेन्स कालिज, ए.एम.यू. अलीगढ़
Thursday, August 14, 2008
ज्ञान का महत्त्व शिक्षा से बहुत ऊंचा है
ज्ञान शब्द अपने आप में परिपूर्ण है। संसार में अगर चारों ओर गहरी दृष्टि से देखा जाए तो यह संसार ज्ञान का समुद्र है। मानव चाहे तो इसमें गोता (डुबकी ) लगाए और ज्ञान प्राप्त कर ले। जो जितनी गहरी डुबकी लगाता है, वह उतना ही ज्ञान प्राप्त कर सकता है और गहरी डुबकी लगाने के लिए लम्बी साँस रोकने की आवश्यकता होती है। बस यही रहस्य जीवन में इस संसार में रहकर ज्ञान प्राप्त करने का है, कि जो जितनी मेहनत करेगा वह उतना ही सफल होगा। पर यह ज्ञान चीज क्या है और हमें प्राप्त कहाँ से होता है? ज्ञान कितने प्रकार का होता है अथवा ज्ञान का प्रयोग किस तरह होता है, यह अपने आपमें महत्वपूर्ण है। ज्ञान अगर न होता तो मानव, मानव न होकर क्या होता?.................शायद जानवर भी ना होता क्योंकि जानवर भी अपने मतलब का ज्ञान रखते हैं। जब से खुदा ने संसार की रचना की साथ-साथ ज्ञान भी दिया। मानव की इच्छाओं के साथ-साथ ज्ञान का महत्व बढ़ता गया। ज्ञान की कोई सीमा नहीं है और ना ही ज्ञान प्राप्त करने की कोई आयु आँकी गई है। ज्ञान हर व्यक्ति को प्राप्त भी नहीं होता, केवल किताबें पढ़ लेना या डिग्रियाँ प्राप्त कर लेना ज्ञान नहीं है।
ज्ञान का महत्व शिक्षा के स्तर से बहुत ऊँचा है। ज्ञान मानव की पूरी ज़िन्दगी को ही बदल कर रख देता है, उसके सोचने समझने का ढंग ही बदल जाता है, ज्ञान वह शक्ति है जिसके द्वारा मानव सात परदों के पीछे छिपे रहस्य को भी पा लेता है, ज्ञान के द्वारा ही मानव ने अपने असतित्व की क्रिया को समझा। मानव जिस तरह वजूद (अस्तित्व) में आता है, वह एक बहुत ही बदतरीन (कलुषित) हालत होती है। क़ुरआन में अल्लाह ने ज्ञान और मानव के अस्तित्व के बारे में जगह-जगह बात की है और बताया है कि मैंने ही तुमको पैदा किया और मैं ही तुम्हें ज्ञान देता हूँ। सूरह अल अलक़ ० (ब्ींचजमत ९६ फनतंद) "पढ़ो अपने रब के नाम के साथ जिसने पैदा किया, जमे हुए लोथड़े से मानव की संरचना, पढ़ो और तुम्हारा रब बड़ा करीम (करम ÷मेहरबानी' करने वाला) है, जिसने कलम के जरिए (द्वारा) से इल्म (ज्ञान) सिखाया, इंसान (मानव) को वह ज्ञान दिया जिसे वह नहीं जानता था''................................. यह अल्लाह का बड़ा करम है कि उस हक़ीर तरीन (निम्नतम) हालत से इब्तदा (प्रारंभ) करके उसने मानव को ज्ञानी बनाया जो मखलूक़ात की बुलन्द तरीन सिफ़त (जीवीयों का सर्वश्रेष्ठ गुण) है, और केवल ज्ञानी ही नहीं बनाया बल्कि उसको क़लम के प्रयोग से लिखने की कला बताई जो बड़े पैमाने पर ज्ञान की अशाअत (प्रसार) तरक्क़ी और पीढ़ियों द्वारा उसकी सुरक्षा एवं उन्नति का जरिया बना। अगर वह (अल्लाह) निवीन द्वारा मानव को क़लम और किताबत (लिपि) की कला का यह ज्ञान न देता तो मानव की इलमी क़ाबलियत (ज्ञानपरक योग्यता) ठिठुर कर रह जाती और उसके फलने, फूलने, फैलने और एक पीढ़ी का ज्ञान दूसरी पीढ़ी तक पहुँचने और आगे ज्+यादा तरक्की करते चले जाने का अवसर ही न मिलता। वास्तव में मानव बेइलम (अज्ञानी) था उसे जो कुछ भी ज्ञान प्राप्त हुआ। अल्लाह के देने से प्राप्त हुआ, उसी ने जिस मरहले (चरण) पर मानव के लिए ज्ञान के जो द्वार खोलने चाहे वह उस पर खुलते चले गए। जिन-जिन वस्तुओं को भी मानव अपनी इलमी दर्याफ़त (ज्ञानी खोज) समझता है वास्तव में वह पहले उसके ज्ञान में न थी। अल्लाहताला ने जब चाहा उनका ज्ञान उसे दिया, बिना इसके कि मानव यह महसूस (प्रतीत) करता कि यह ज्ञान उसे कौन दे रहा है। ज्ञान के द्वारा ही मानव ने बड़ी-बड़ी खोज की, वह ज+मीन के नीचे, आकाश के ऊपर और समुद्र की तह तक पहुँच सका। ज्ञान ही हमें आत्मा, परमात्मा पर विश्वास करना सिखाता है, मरना (मौत) और फ़िर जीना, हमारे अच्छे बुरे कर्मों का फ़ल मिलना, यह सब हमें शिक्षा से प्राप्त होता है। परंतु इन पर विश्वास ज्ञान द्वारा ही होता है। ज्ञान के द्वारा ही मानव चाँद पर पहुँचा, और ज्ञान द्वारा ही मानव भगवान, ईश्वर या ख़ुदा तक पहुँचता है, शर्त यही है कि ज्ञान किस प्रकार का है और उसका प्रयोग किस तरह किया जाता है। यूँ तो आज के संसार में हर व्यक्ति ज्ञानी है पर जो ज्ञान मानवता के काम आए और ईश्वर, ख़ुदा या भगवान जो ज्ञान देता है वही शुद्ध ज्ञान है।
हजरत अली (क।) का वक्तव्य है कि जिस व्यक्ति ने मुझे एक शब्द भी पढ़ा दिया मैं उसका दास हूँ। वह चाहे तो मुझे आज+ाद कर दे या बेच दे।
इमाम शाफ़ई (रह।) का प्रवचन है कि जो व्यक्ति उदासीनता और संतोष के साथ ज्ञान प्राप्त करना चाहे वह कदापि सफल नहीं हो सकता। केवल वह व्यक्ति सफल हो सकता है जो विनम्रता और विपन्नता के साथ ज्ञान प्राप्त करे।
बुखारी शरीफ़ में मुजाहिद (रह।) द्वारा उल्लिखित है कि जो व्यक्ति पढ़ने में लज्जा अथवा दंभ करे वह कदापि ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता।
प्रस्तुतकर्त्ता : इज़हार उल हक अलीगढ
