आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.
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Wednesday, November 14, 2012

एक दीप जलाना ही होगा


दीपावली के पावन पर्व पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। दीपावली का पर्व, पर्वों का समूह है तथा भिन्न भिन्न आधारों पर भिन्न भिन्न सम्प्रदायों द्वारा एक ही स्वरूप से मनाया जाने वाला त्यौहार है। दुनिया भर के लोग इस स्याह रात के तिमिर को दीप जलाकर तिरोहित करते हैं।
दुनिया के सभी धर्मों में अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की बात कही गयी है। अंधकार का स्वामी शैतान माना जाता है और प्रकाश का गुरु। अंधकार झूठ का प्रतीक है और प्रकाश सत्य का। सार्वभौम जगतगुरु सूर्य अपने दैदीप्तमान प्रकाश के कारण ही सर्वत्र पूज्य है।
सूक्त वाक्य ÷तमसोमा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्ममा अमृतगमय' कहता है कि हमारी यात्रा अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर होनी चाहिए। जब जन्म है तो मृत्यु निश्चित है। अतः अमरत्व तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम जन्म को प्राप्त न हों। और बार बार जन्म लेने से बचना तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम स्वयं पूर्ण प्रकाशित न हों। पूर्ण प्रकाशित होकर ही स्वयं को उस दिव्य प्रकाश में समा पाना सम्भव है।
दीपावली के पर्व पर हम केवल दरवाजों पर दीप ही नहीं जलाते वरन अपने घरों की सफाई भी करते हैं। हमारे घरों में जमे हुए कबाड़ को निकालकर इस दिन हम बाहर फैंक देते हैं। दीपावली की रात्रि में पूजन के उपरांत प्रातः पौ फटने से पहले हमारे घरों की माताएं सूप को पीटकर आवाज देती हैं कि लक्ष्मी का आगमन हो रहा है अतः दरिद्र तू चला जा।
कचरा निकलने पर ही मां लक्ष्मी घर में प्रवास करती हैं। दीप जलने से   अंधकार भाग जाता है। यह व्यवस्था जिस प्रकार घर में है ठीक उसी प्रकार हमारे अंदर भी है। अंदर अगर पूवाग्रहों का कचरा भरा है तो मां लक्ष्मी कहां निवास करेंगी। पहले हमें अपने अंदर से कचरा निकालना होगा। यह कचरा है हमारे संस्कारों का। कई लोग कहते हैं कि ये संस्कार तो हमें विरासत में मिले हैं या कि हमने बड़े जतन से एकत्रित किए हैं, इन्हें कैसे निकाल दें। क्या घर में से जो कबाड़ निकाला है, वह भी जतन से ही एकत्रित किया था। हमें आगे बढ़ना है, प्रकाश लाना है तो एक दीप जलाना ही होगा.................................संजय भइया

Sunday, November 30, 2008

प्रार्थना कैसे, क्या तथा क्यों करें?

देवेश :- हम सभी के भीतर एक दिव्यता विद्यमान है, जिसे प्रार्थना के द्वारा जागृत किया जा सकता है।

अतुल :- उपरोक्त मतों से दो विचारधाराएं देखी जा सकती हैं- द्वैत तथा अद्वैत। द्वैतवादी मानते हैं कि हमें एक व्यक्ति के रूप में भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए। प्रार्थना कैसे, क्या तथा क्यों करें? इस पर उनके अपने-अपने मत हैं। जबकि अद्वैतवादी स्वयं तथा भगवान में भेद नहीं समझते। तत्वदृष्टि से देखें तो हमारी आत्मा भी परमात्मा का ही अंश है, ऐसा वे मानते हैं। इस प्रकार प्रार्थना का उनके लिए कोई महत्व नहीं। प्रश्न यह उठता है कि अद्वैतवादी को यह ज्ञान कैसे होता है कि द्विव्य या परमात्मा तथा उसकी आत्मा एक ही है तथा ऐसा पूर्ण बोध होने से पूर्व वह क्या करता है? उत्तर- कहा जाता है कि या तो तुम कर सकते हो...... या जान सकते हो.... जब आप जानते हैं तो यह सिर्फ जानना ही होता है जो शेष रहता है तथा जिसे जाना जाए, वह खो जाता है।............... तो आप कुछ न करें................. बस रहें। यह मेरी व्यक्तिगत राय है।

Friday, November 28, 2008

प्रार्थना की आवश्यकता ही कहाँ रह जाएगी?

उस्मान :- आध्यात्मा हमें प्रार्थना करना नहीं सिखाता बल्कि हमें अद्वैत की ओर ले जाता है। जब आप अपने तथा भगवान में कोई भेद नहीं जानेंगे तो प्रार्थना की आवश्यकता ही कहाँ रह जाएगी?
पूजा चौधरी :- व्यक्ति को प्रार्थना ऐसे करनी चाहिए जैसे सब कुछ भगवान पर निर्भर है तथा काम ऐसे करना चाहिए जैसे सब कुछ उसी पर निर्भर है। जिस प्रकार दिन भर शरीर पर जमी धूल, मिट्टी, पसीना तथा गन्दगी को हम साबुन, पानी आदि से धो डालते हैं उसी प्रकार मन के विकारों तथा ashuddhiyon से मुक्त करने हेतु सौभाग्य से प्रार्थना नामक कीटाणुनाशक vishanaashaka उपलब्ध है।

Thursday, November 27, 2008

प्रार्थना हमें हमारे अहंकार से मुक्त करेगी

हमें अपना तन, मन व धन सर्वस्व प्रभु के श्री चरणों में अर्पित कर देना चाहिए तथा उनसे प्रार्थना करनी चाहिए कि ''हे प्रभु! हम सेवकों का सब कुछ आपकी सेवा में समर्पित है, आप खुशी से जो भी चाहें, वह सेवा हमसे ले सकते हैं। हमें न तो सांसारिक सुख चाहिए और न ही हमें अधिकार या पद की इच्छा है। हम सिर्फ आपको प्रसन्न करना चाहते हैं। हम अपना जीवन कायरों की भाँति नहीं जीना चाहते, ना ही हम जंगली पशुओं की भाँति मरना चाहते हैं। आप हमें अपनी सेवा तथा शरण में ले लें। ताकि हम आपकी सेवा करते हुए मुक्ति पा सकें।'' यह प्रार्थना हमें हमारे अहंकार तथा सांसारिक सुख भोग की इच्छा से मुक्त करेगी तथा उस प्रभु की दया तथा कृपा का पात्र बना देगी।
प्रस्तुति : डा. रतन सैनी

Wednesday, November 26, 2008

कृतज्ञ हृदय की भावाभिव्यक्ति ही सच्ची प्रार्थना है।

:- प्रार्थना भगवान से तुरंत सम्बन्ध स्थापित करवाती है। यह भगवान से वार्ता करने तथा उनके आशीषों के लिए उनको धन्यवाद देने का एक माध्यम है। यह न मांगने के और न ही उनसे अपने कष्टों को हरने के उद्देश्य से की जाए। परन्तु कलियुग में प्रार्थना की यही अधोगति हो गई है। एक कृतज्ञ हृदय की भावाभिव्यक्ति ही सच्ची प्रार्थना है। यह उस भावना से तुलनीय है, जब आपके हृदय में मौन भावातिरेक हो, आँखें नम, हाथों में कम्पन, काँपते होंठ हों जैसे- जब आप किसी परम प्रिय से लम्बे अन्तराल के बाद मिलते हैं। इस क्षण सब कुछ निशब्द ही, स्वतः ही कह दिया जाता है तथा आप उसे करीब पाकर स्वयं को भाग्यशाली मानते हैं। ''प्रार्थना सदा हमारी कृतज्ञता की भावना का स्वतः प्रवाह हो... हमारे अस्तित्व से.... न कि मन से।''

प्रस्तुति : अतुल

Tuesday, November 25, 2008

भाग्य परिश्रम तथा क्रियाओं से निर्धारित होता है।

मनुष्य का प्रारब्ध उसके कर्मों से तथा भाग्य उसके परिश्रम तथा क्रियाओं से निर्धारित होता है। जब हम प्रार्थना करते हैं तो ऊर्जा तथा ज्ञान के अनन्त स्रोत से हमारा सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तथा हमें उनसे आशीष तथा मार्गदर्शन प्राप्त होता है। पूर्व कर्मों पर बहुत अधिक आश्रित होने पर हम उन्नति नहीं कर सकते। अतः स्वयं के लिए तथा दूसरों के लिए प्रार्थना करो।

प्रस्तुति : सुभाष

Monday, November 24, 2008

हिमवंत जी की टिप्पणी

पिछले चिठ्हे पर आई भाई हिमवंत जी की टिप्पणी मे उन्होने एक सुंदर सुझाव दिया है कि :
1। सकाम तथा निष्काम भाव से प्रार्थना करने में क्या अंतर है।?....
2। तथा क्या मन्नत मनौती माँगना उचित है ?
इन बिंदुओं पर चर्चा की जाए... उनके सुझाव पर उनको साधुवाद देते हुए में आप सभी से इस विषय पर आपके विचार आमंत्रित करता हूं ...

प्रार्थना बुरे कर्मों को निष्क्रिय कर देती है।

प्रार्थना न तो भगवान को प्रभावित करती है और न ही इससे उनका निर्णय बदलता है। प्रार्थना तो भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की अभिव्यक्ति है। यदि लगा- तार प्रार्थना की जाए तो यह हृदय परिवर्तन करती है। फिर जो कुछ भी हो, व्यक्ति शान्तिपूर्वक सह लेता है। इस प्रकार यह व्यक्ति को कर्म के चक्र से मुक्त कर देती है। कर्म का नियम जैसे को तैसा का नियम नहीं है। प्रार्थना आपके कर्म को बदल सकती है क्योंकि यह स्वयं में एक अच्छा कर्म है। वह बुरे कर्मों को निष्क्रिय कर देती है।

प्रस्तुति : जयदेव

प्रार्थना का उद्देश्य स्वयं की सहायता करने को उद्यत होना


कर्म का नियम कदाचित यह सुनिश्चित करता है कि आप अपने कर्मों का फल पाएं। यह कहता है कि कुछ भी पूर्व निर्धारित नहीं है। आपका भविष्य आपके अभी के तथा पूर्व के कर्मों पर आधारित होगा। जहाँ तक प्रार्थना का प्रश्न है मेरे विचार में प्रार्थना का उद्देश्य सिर्फ यही है कि हम स्वयं अपनी सहायता करने को उद्यत हों तथा कुछ सकारात्मक वचनों को बोलकर हम बेहतर तथा आशान्वित महसूस करते हैं तथा अधिक कुशलता से कर्म करने लगते हैं।

प्रस्तुति : प्रीतम

Saturday, November 22, 2008

प्रार्थना का महत्व

प्रार्थना शब्द दो शब्दों के योग से बना है प्रार तथा धना। प्रार का अभिप्राय प्राप्त करने से है तो धना का धन से। धन क्या है? सामान्य व्यवहार में हम रुपये, पैसे, सम्पत्ति को धन समझते हैं लेकिन क्या यह वास्तविक धन है? धन वह है जो सदैव आबश्यकता पड़ने पर काम आवे। क्या रुपया या सम्पत्ति सदैव काम आ सकती है? शायद नहीं। तो फिर ऐसा कौन सा धन है जो सदैव काम आ सके।

वह केवल ज्ञान है जो सदैव साथ रहता है और कभी भी काम में आ सकता है। ज्ञानीजन सर्वदा और सर्वत्र पूज्यनीय होते हैं। विश्व के समस्त धर्मों, मतों एवं सम्प्रदायों में प्रार्थना का विधान है। उसके रूप अलग-अलग हैं। देश काल परिस्थिति के अनुसार प्रार्थना का स्वरूप बदलता है। भाषा और लिपि के अनुसार शब्द बदलते हैं लेकिन प्रार्थना तो सभी करते हैं। गोस्वामी जी ने मानस में कर्म की प्रधानता कही तो श्री कृष्ण ने गीता में अर्जुन को कर्मयोगी बनने के लिए प्रेरित किया, बुद्ध व्यक्तित्व के उन्नयन के लिए कर्म पर बल देते हैं तो मुहम्मद साहब, मूसा, ईसा भी विश्व को कर्म प्रधान मानते हैं। धर्मग्रंथों में लिखा है कि ईश्वर ने सर्वप्रथम मानव को कर्म करने के लिए धरा पर भेजा। चाहे कहीं वह सजा के रूप में ही क्यों न हो। गीता में भगवान ने भक्तों के चार प्रकार बताए हैं। भक्तों की यह चार श्रेणियां उनके द्वारा भगवान के सम्मुख की जाने वाली प्रार्थना, याचना या विनती के आधार पर की हैं।

आर्त भक्त दैहिक, दैविक या भौतिक कष्टों से आर्त होकर भगवान की शरण हो कष्टों के निवारण हेतु प्रार्थना करते हैं, वहीं अर्थार्थी परिवार की सुख समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। जिज्ञासु भक्त उनके स्वरूप के ज्ञान हेतु सन्मार्ग पर लगाने की प्रार्थना करते हैं जबकि इन सबमें श्रेष्ठ ज्ञानी भक्त भगवान को सर्वाधिक प्रिय हैं जो आत्मज्ञानी होने के कारण स्वयं भगवत स्वरूप होते हैं, उन पर तो भगवत्‌ कृपा की वर्षा स्वयं ही होती है।

सभी धर्मों में प्रार्थना पर विशेष बल दिया जाता है। प्रार्थना में लोगों के विश्वास का अंदाज विभिन्न धर्मों के प्रार्थना स्थलों पर आने वाले लोगों की संख्या से लगाया जा सकता है। यह स्थापित सत्य है कि उद्देश्य कुछ भी हो, उसकी प्राप्ति के लिए हमें भगवान के अलावा किसी का आधार नहीं है। उसकी कृपा से क्या सम्भव नहीं - गूंगा वाचाल हो जाए, लंगड़ा भी पर्वत को लांघ जाए। लोगों का विश्वास है कि प्रभु के प्रति श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करने पर वह सुनते हैं और इच्छित फल प्रदान करते हैं।

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