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Tuesday, November 11, 2008

घर में इस प्रकार बनाएँ पूजा स्थल

1। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य और कार्तिकेय की मूर्तियों का मुंह पश्चिम दिशा की ओर होना चाहिए। गणेश, कुबेर, दुर्गा और भैरव का मुंह दक्षिण की तरफ़ हो एवं हनुमान का मुंह नैरित्य दिशा की तरफ़ होना चाहिए।

2। उग्र देवता जैसे काली की स्थापना घर में न करें। इसके अलावा घर में संगमरमर की मूर्ति न रखें।

३. पूजा स्थल में भगवान या मूर्ति का मुख पूर्व, पश्चिम या दक्षिण की तरफ़ होना चाहिए। मूर्ति का मुख उत्तर दिशा की ओर नहीं होना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में उपासक दक्षिणामुख होकर पूजा करेगा, जोकि उचित नहीं है।

४. पूजाघर के आस पास, ऊपर या नीचे शौचालय वर्जित है, पूजाघर में और इसके आस पास पूर्णतः स्वच्छता तथा शुद्धता होना अनिवार्य है।

५. रसोईघर, शौचालय, पूजाघर एक दूसरे के पास न बनाएं। घर में सीढ़ियों के नीचे पूजा घर नहीं होना चाहिए।

6। मूर्ति के आमने-सामने पूजा के दौरान कभी नहीं बैठना चाहिए। बल्कि सदैव दाएं कोण में बैठना उत्तम होता है।

७. पूजन कक्ष में मृतात्माओं का चित्र वर्जित है। किसी भी श्रीदेवता की टूटी-फूटी तस्वीर व सौंदर्य प्रसाधन का सामान, झाडू व अनावश्यक सामान पूजाघर में न रखें।

8. पूजाघर के द्वार पर दहलीज ज+रूर बनवानी चाहिए। द्वार पर दरबाजा लकड़ी से बने दो पल्लों वाला हो तो उत्तम होता है।

वास्तु के अनुसार पूजा स्थल

१। पूजा स्थल के लिए भवन का उत्तर-पूर्व कोना सबसे उत्तम होता है, पूजा स्थल की भूमि उत्तर-पूर्व की ओर झुकी हुई और दक्षिण-पश्चिम से ऊंची हो, आकार में चौकोर या गोल हो तो सर्वोत्तम होती है।

२। मंदिर के चारों तरफ़ द्वार शुभ हैं।

३। मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा उस देवता के प्रमुख दिन ही करें या जब चंद्र पूर्ण हो अर्थात्‌ पंचमी, दशमी एवं पूर्णिमा तिथि को मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा करें।

४. शयनकक्ष में पूजा स्थल नहीं होना चाहिए। अगर जगह की कमी के कारण मंदिर शयनकक्ष में बना हो तो मंदिर के चारों ओर पर्दे लगा दें। इसके अलावा शयनकक्ष के उत्तर-पूर्व दिशा में पूजा स्थल होना चाहिए।

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