आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Tuesday, March 31, 2009

मंत्रों के उच्चारण करने पर निकलने वाली ध्वनि के साथ गमन कर,दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करती है

आंतरिक विधुत धारा विज्ञान के अनुसार जिस भी शब्द का उच्चारण हम लोग करते हैं,वह इस ब्राह्मंड में तैरने लगता है। उदाहरण के लिए एक रेडियो स्टेशन पर किसी भी गीत की पंक्ति का अंश बोला जाता है तो वह उसी समय वायुमंडल में फैल जाता है। तथा विश्व के किसी भी देश,किसी भी कोने में श्रोता यदि चाहे तो उसके रेडियो के माध्यम से उस गीत की पंक्ति का अंश सुन सकता है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि रेडियो में सूई उसी फ्रीक्वैंसी पर लगाने की जानकारी हो। इस प्रकार ग्राहक और ग्राह्य का आपस में पूर्ण संपर्क आवश्यक है, उसी प्रकार मंत्रों का उच्चारण किया जाता है तो मंत्र उच्चारण से भी एक विशिष्ट ध्वनि कंपन बनता है जो कि संपूर्ण वायु मंडल में व्याप्त हो जाता है। इसके साथ ही आंतरिक विधुत भी तरंगों में निहित रहती है। यह आंतरिक विधुत, जो शब्द उच्चारण से उत्पन्न तरंगों में निहित रहती है, शब्द की लहरों को व्यक्ति विशेष या संबंधित देवता,ग्रह की दिशा विशेष की ओर भेजती है।अब प्रश्न यह उठता है कि यह आन्तरिक विधुत किस प्रकार उत्पन्न होती है? यह बात वैज्ञानिक अनुसंधान द्वारा मान ली गई है कि ध्यान,मनन,चिन्तन आदि करते समय जब व्यक्ति एकाग्र चित्त होता है,उस अवस्था में रसायनिक क्रियायों के फलस्वरूप शरीर में विधुत जैसी एक धारा प्रवाहित होती है(आंतरिक विधुत) तथा मस्तिष्क से विशेष प्रकार का विकिरण उत्पन्न होता है। इसे आप मानसिक विधुत कह सकते हैं। यही मानसिक विधुत (अल्फा तरंगें) मंत्रों के उच्चारण करने पर निकलने वाली ध्वनि के साथ गमन कर,दूसरे व्यक्ति को प्रभावित करती है या इच्छित कार्य संपादन में सहायक सिद्ध होती है। यह मानसिक विधुत(उर्जा)भूयोजित न हो जाए,इसीलिए मंत्र जाप करते समय भूमी पर कंबल,चटाई,कुशा इत्यादि के आसन का उपयोग किया जाता है।

Sunday, March 29, 2009

माँ साँसों की तरह है।

प्रेमिका छोड़कर जा सकती है, पत्नी छोड़कर जा सकती है, पुत्र और पुत्रियाँ भी छोड़कर जा सकते हैं, किंतु माँ साँसों की तरह है। माँ इस धरती का नमक है। माँ हमारी नसों में दौड़ता खून है। माँ हमारे हृदय की धड़कन है। माँ के बगैर इस ब्रह्मांड का अस्तित्व नहीं। जिन देहधारी स्त्रियों ने माँ होने का दर्द सहा है। वे जानती हैं कि जगत जननी माँ क्या होती है।
कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी माँ सती पार्वती को ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जाना जाता है। इसके अलावा भी माँ के अनेक नाम हैं जैसे दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेराँवाली आदि, लेकिन सबमें सुंदर नाम तो 'माँ' ही है।
माँ को जिसने भी जाना है, वह किसी भी 'माता की सवारी' आने वाली जगह पर नहीं जाएँगे, क्यों‍कि उस विराट शक्ति के समक्ष खड़े होने में देवताओं के दिल काँपते थे, तो उसका किसी के शरीर में आना असत्य है। सत्य के मार्ग पर चलो। सत्य यह है कि चित्त को माँ की श्रद्धा की ओर मोड़ो। माँ को अपनी अँखियों के सामने से मत हटाओ। कम से कम इन नौ दिनों में जानो कि माँ क्या है। उस माँ को भी जिसने तुम्हें ये देह दी और उस माँ को भी जिससे यह जगत जन्मा।
डूब जाओ 'माँ' के प्रेम में। जब तक डूबोगे नहीं, तब तक दु:ख और सुख के खेल में उलझे रहोगे। डूबने से ही मुक्ति मिलेगी। वेद, पुराण और गीता सभी कहते हैं कि जो इस प्रेम के सागर में डूबा है वही पार हुआ है।

प्रस्तुति : अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'

Saturday, March 28, 2009

कई जन्म से भटका हूं मैं, अब तो निज घर पाना है॥


कितने ही हमारे अपने, हमें छोड़ गये यहां पर।

कितनों को हमें छोड़कर, चले जाना है वहां पर॥

जो चले जाते है यहां से, फिर लौट कर नहीं आते।

लाख कोशिश भूलने पर, कभी दिल से नहीं जाते॥

ये दस्तूर है जहां का, इसे ऐसे ही चलते जाना है।

इस चौरासी के चक्कर में, बस आना और जाना है॥

कर लो भजन भगवान का, गर जीवन सफल बनाना है।

लालच की है ये दुनिया, मतलबी सारा जमाना है॥

बड़ी कठिन है डगर वहां की, कांटों पर चलकर जाना है।

कई जन्म से भटका हूं मैं, अब तो निज घर पाना है॥

Friday, March 27, 2009

घर में वास्तु

स्वाध्याय या अध्ययन

कक्ष वास्तु के अनुसार वायव्य, नैरित्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य स्वाध्याय कक्ष बनाना उचित है। ईशान कोण में पूर्व दिशा में पूजा गृह के साथ अध्ययन कक्ष बनाना सर्वोत्तम है।

शौचालय

वास्तु के अनुसार शौचालय हेतु नैर्)त्य कोण व दक्षिण दिशा के मध्य या नैर्)त्य कोण व पश्चिम दिशा के मध्य स्थान सर्वाधिक उपयुक्त है। शौचालय में सीट इस प्रकार होनी चाहिए कि उस पर बैठते समय आपका मुख दक्षिण या पश्चिम की ओर हो। शौचालय में एग्जास्ट फैन की स्थिति उत्तरी या पूर्वी दीवार पर लगाएँ। पानी का बहाव उत्तर-पूर्व में रखें। उत्तरी व पूर्वी दीवार क साथ शौचालय न बनाएँ।

Wednesday, March 25, 2009

शयनकक्ष की अनुकूलता

शयनकक्ष

गृहस्वामी का मुख्य शयनकक्ष भवन में दक्षिण या पश्चिम दिशा में होना चाहिए और सोते समय सिरहाना दक्षिण में और पैर उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव और सिर के रूप में मनुष्य का उत्तरी ध्रुव ऊर्जा की ऐ धारा पूर्ण कर देता है। इसी प्रकार पृथ्वी का उत्तरी धु्रव और मनुष्य के पैरों का दक्षिणी धु्रव भी ऊर्जा का दूसरी धारा पूर्ण करता है और चुम्बकीय तरंगों के प्रवेश में बाधा उत्पन्न नहीं होती है। ऐसा होने पर सोने वाले को शान्ति व गहरी नींद मिलती है जिससे बुद्धि ठीक रहती है। घर में भी सुख समृद्धि व सम्पन्नता रहती है। यदि दक्षिण दिशा में सिरहाना रखना सम्भव न हो तो सिरहाना पश्चिम की ओर रखना चाहिए। अन्य दिशाओं में पलंग और सिरहाना रखने से बुद्धि का संचालन ठीक से नहीं होता है।

Saturday, March 21, 2009

जिज्ञासा और समाधान 2

जिज्ञासा- महाराजजी नीतिवान और धर्मज्ञ भी क्यों अपने ज्ञान के विपरीत कार्य कर जाता है? धर्म के मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति परेशान रहते है और बेईमान मजे मार रहे है, ऐसा क्यों हो रहा है? -कविता उपाध्याय, अलीगढ़

समाधान- स्वभाव के कारण ऐसा हो जाता है। मनुष्य द्वारा किए गए कर्मों से उसका स्वभाव बन जाता है। उसका यह स्वभाव उससे ज्ञान के विपरीत कार्य करा देता है। इसीलिए तो गोस्वामी जी ने कर्म को प्रधानता दी है। ÷÷कर्म प्रधान विश्व रचि राखा ............... ........'' सब कुछ इस पर आधारित है। कर्म जो हो चुका वह प्रत्यक्ष में हमें नहीं दिख रहा। हमें प्रत्यक्ष में वह स्वभाव रूप में दिखता है, लेकिन उसका मूल तो कर्म ही है। प्रारब्ध को तो स्वीकारना पड़ेगा। लेकिन प्रारब्ध के मूल में भी तो कर्म ही है। इसलिए सद्कर्म करो। क्योंकि पुरुषार्थ सर्वदा श्रेष्ठ है। हमें दिखने वाली परेशानियां उसके प्रारब्ध हो सकते हैं। लेकिन पुरुषार्थ के बल पर स्वयं के तेज से प्रारब्ध को निस्तेज किया जा सकता है।

Thursday, March 19, 2009

जिज्ञासा और समाधान


जज्ञासा- महाराजजी, धर्म को लेकर बहुत सी बातें कही जाती हैं। वेद कुछ कहते हैं, लोकाचार कुछ कहता है जबकि व्यवहार में देखने पर कुछ और ही सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में क्या किया जाए। किसे वरीयता दें? -कु० पूनम नई दिल्ली

समाधान- जिनके जीवन में धर्म श्रेष्ठ है, उन महापुरुषों का संग करो। धार्मिक व्यक्ति के जीवन में इन तीनों की एकरूपता होगी। जिस के जीवन में इन तीनों की एकरूपता नहीं वह धार्मिक नहीं हो सकता। हां धर्मान्ध हो सकता है। सूक्ष्मतत्व इन्द्रियों की पकड़ से बाहर है। बुद्धि ज्ञान पर आधारित होने के कारण धर्म का निर्णय करने में सक्षम नहीं है। इसलिए सद्शास्त्र सम्मत जीवन जीने वाले सद्पुरुष का सत्संग को वरीयता दें।

जिज्ञासा- माराजश्री कृपया यह बजाएं कि आध्यात्मिकता और धार्मिकता में क्या अंतर है। -बचन सिंह तेवतिया

समाधान- मंजिल और रास्ते का। आध्यात्मिक होना लक्ष्य है जबकि धर्म के रास्ते पर चलकर व्यक्ति नैतिक होता है और वही आध्यात्मिकता सिखाती है।