खट्टे मीठे अनुभवों के साथ
गुज़री हुयी साल को अलविदा।
आओ नए साल का स्वागत करें।
दिव्या रुद्र की कृपा सब पर बरसती रहे.
खट्टे मीठे अनुभवों के साथ
गुज़री हुयी साल को अलविदा।
आओ नए साल का स्वागत करें।
दिव्या रुद्र की कृपा सब पर बरसती रहे.
शक्ति पराक्रम प्रतिमा हैं आप तो।
सद्गुणों की भावना हम में जगा दो॥
सद्गुणों की भावना हम में जगा दो।
दिशा.................................॥
शौर्य और साहस का संगम हैं आप तो।
मरुस्थल को मेरे मधुवन बना दो॥
मरुस्थल को मेरे मधुवन बना दो।
दिशा.....................................॥
दिशा हीन है हम दिशा खोजते हैं।
दृष्टि लगाए हम, तुम्हें देखते हैं॥
दिशा......................॥
धरती पे देखा मानवता लुप्त है।
पोषण ज़रा तुम उसे तो करा दो॥
पोषण ज़रा तुम उसे तो करा दो।
दिशा........................॥
अमृत कलंश है आपकी वाणी।
वाणी का अमृत हमें भी पिला दो॥
वाणी का अमृत हमें भी पिला दो।
दिशा............................॥
प्रस्तुति : अंजलि शर्मा
वैदिक काल में ऋषि मुनि ज्ञान के प्रचार प्रसार के लिए अपने आश्रम में स्कूल खोल लेते थे। वहाँ पर विद्यार्थी गुरु के परिजनों की तरह ही रहते थे। वो ज्ञान के बदले आश्रम के घरेलू काम भी किया करते थे। गुरु गृह में उन्हें च्चिक्षा के अलावा भोजन और रहने की सुविधा भी मिलती है तथा च्चिक्षा पूरी हो जाने के बाद च्चिष्य उन्हें गुरु दक्षिणा दिया करते थे। इस तरह परिवार पर आधारित च्चिक्षा साधारण तथा गुरुकुल कहलाती थी। समयान्तर यह च्चिक्षा संस्थानों में बदल गई। ऋषि मुनि समाज के साथ नदियों के किनारे रहा करते थे, बाद में ये ऋषि आश्रम विच्च्वविद्यालयों में बदल गये। आज हम यूरोप के कई विच्च्वविद्यालयों जैसे आक्सफोर्ड, केमब्रिज और सोरबोन जैसे पुराने शिक्ष्हा संस्थानों को जानते है। भारतीय विच्च्वविद्यालय जो इनसे भी ज्यादा प्राचीन थे विदेच्ची आक्रान्ता के विनाच्च के कारण जीवित न रह सकें। विध्वंस दो प्रकार का था। पहला था इन संस्थानों के मूल्यवान वस्तुओं, सोना, चाँदी की अविवेकतापूर्ण लूट। दूसरा था आक्रान्ताओं में असुरक्षा की भावना तथा उनकी यह सोच कि इन च्चिक्षा संस्थाओं का ज्ञान हमारे धर्म और विचारों को खतरा हो सकता है। इन्हीं दो कारणों से उन्होंने इन महान विच्च्वविद्यालयों को बर्बाद कर दिया।
इसरायलियों के जीवन में भजनों का विशेष महत्व था। मंदिर में बलिदान चढ़ाते वक्त गाये जाने वाले भजनों का निर्माण किया गया तथा बाद में सभागृह में भी भजनों को गाया जाता है। 'मंदिर में कुछ वाद्य यंत्र बजाने वाले थे और कुछ गायक मंडल थे......। भजनों के कुछ अंश पुरोहित गाते थे.....।
नबियों ने इसरायिलयों को सैद्धान्तिक तथा नैतिक शिक्षा प्रदान की परन्तु भजनों के माध्यम से उन्हें पापों का पश्चात्ताप, परमेश्वर के समाने तथा सताव एवं समस्या में जीवन को जीना सिखाया। इसरायली समाज एवं दिन प्रतिदिन के जीवन में भजनों का इतना महत्व था कि यह न केवल मंदिर एवं सभागृह तथा द्वितीय मंदिर में गाये जाते थे परन्तु घरों में भी ताकि बच्चे प्रारम्भ से ही इनके पवित्र शब्दों से परिचित हो जायें तथा उन्हें समझें। यद्यपि भजनों की अपनी पृष्ठ भूमि तथा संदर्भ है, कुछ भजन राजाओं हेतु रचे थे राजा मंदिर का उपासक तथा प्रबंधक था, मंदिर उपासना हेतु रचे गये।
दल दल को थल समझ रहा
गहरे में ना धँस जाना,
जब 'रुद्र' तुम्हें पुकारें तो
तुम ढूड़े से ना मिलो वहाँ।
ए मन मौजी.............॥
'रुद्र' ने तुम्हें आगाह किया
ए लव्य तू मन को सँभाल जरा,
क्यों इसको इतना बिगाड़ लिया
ना इस पर तुमने विचार किया।
एै मन मौजी..........................॥
आगरा से कु. लव्यता द्वारा प्रेषित भजन