आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Thursday, January 24, 2013

SHUBH KAMNA

ईद इ मिलाद उल नवी की सभी पाठकों को शुभ कमाना।

Monday, January 14, 2013

Happy New Year 2013


इस अंक के साथ वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित अंग्रेजी कलैण्डर के अनुसार हम नव वर्ष में पदार्पण करेंगे। नव वर्ष सुधी पाठकों के जीवन में हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण हो इस मंगल कामना के साथ पत्रिका परिवार की ओर से ढेर सारी शुभकामनाएं और महाराज जी की ओर से आशीर्वाद।
वैसे तो सबै भूमि गोपाल की, सब दिन एक समान। लेकिन जिस प्रकार हम लिखते समय कोमा और विराम लगाते हैं तथा पैरा बदलते हैं, उसी प्रकार दिन, मास और वर्ष का क्रम चलता है।
बदलता वर्ष सिंहावलोकन का समय देता है। गुजरी हुई साल में हम क्या कर सकते थे? क्या किया? जो करना चाहते थे, उसे क्यों नहीं कर पाए? ऐसे अनेकों प्रश्नों का सिंहावलोकन कर हम नये साल में नयी रणनीति बनाकर उन कामों को कर सकते हैं। पुरातन से सबक लेकर आगे की ओर बढ़ने का नाम ही जिंदगी है।
वर्ष के अंतिम दिनों में हुए एक अमानुषिक अत्याचार के विरोध में सड़कों पर उतरते जन सैलाब ने साफ संकेत दिए हैं कि हमें बहुत कुछ स्वयं को बदलने की आवश्यकता है। यह घटना वैसे तो कोई नयी घटना नहीं है। हर दिन हर स्थानीय अखबार में किसी न किसी स्थान पर समाज को शर्मशार करने वाली ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं। पाश्चात्य सभ्यता के अंधानुकरण तथा अपने सनातन दर्शन को पश्चिम के नजरिए से देखने की हमारी ललक ने हमें इस मोड़ पर खड़ा कर दिया है कि हम एक तरफ तो लिव इन रिलेशनशिप की वकालत करने लगते हैं और दूसरी ओर अरबी कबीलों के दण्ड विधान की। 
क्यों हम विचार नहीं करते अपने सनातन मूल्यों की पुर्नस्थापना की जहां स्त्री को भोग की वस्तु नहीं वरन्‌ देवी माना जाता है। अंधकार युग की कुछ घटनाओं को आधार मानकर क्यों हम अपने दर्शन से विमुख हो रहे हैं। क्यों हम संकीर्णता से नहीं निकल पा रहे हैं? क्यों हम नहीं स्वीकार करते कि हमारी संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन, वैज्ञानिक तथा शास्वत नियमों पर आधारित संस्कृति है। वह हमारे वेद ही हैं जो जगत के प्राकट्य की वैज्ञानिक अवधारणा प्रस्तुत करने में समर्थ हैं। हमारे वेदों में ही वसुधैव कुटुम्बुकम का भाव है। हमारे पूर्वजों ने ही आत्मा की निरंतरता जैसे जटिल प्रश्नों के उत्तर सहस्राब्दियों पहले प्रस्तुत कर दिए थे। हर प्रश्न का समाधान हमारी संस्कृति में है। आवश्यकता है, एक बार उसके सिंहावलोकन की। आओ इस नव वर्ष में पुराने से सीख लेकर आगे की ओर बढ़ें। अन्धानुकरण को त्याग विश्व को नयी राह दिखाएं................संजय भइया

Wednesday, December 26, 2012

बड़े दिन की हार्दिक शुभकामनाएं।


२५ दिसम्बर बड़ा दिन, प्रकाश से जगमग होते गिरिजे तथा गिरिजों में तिमिर के शमन को तथा प्रकाश के आलोक को बिखेरने के लिए स्वयं को तिरोहित करती हुईं जलती मोमबत्तियां। बहुत कुछ कह जाता है है प्रभु यीशु का यह जन्मोत्सव, जिसे दुनियां की बहुत बड़ी आबादी बड़े दिन के रूप में मनाती है। इस बड़े दिन की सभी सुधी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं।
साथियो, तुलसीदास जी मानस में लिखते हैं- बड़े भाग मानुष तन पावा.। यह मनुष्य शरीर बड़े भाग्य से मिलता है। इस जन्म को पाकर मनुष्य पूर्णता भी प्राप्त कर सकता है और सब कुछ खो भी सकता है। अन्य योनियों में यह सम्भव नहीं है। सूर्य के प्रकाशित रहने की अवधि के काल के अनुसार देखें तो इस दिन से पूर्व सबसे छोटा दिन होता है। अर्थात अंधकार की मात्रा के बढ़ने का जहां चरम आता है, प्रकाश की अवधि जब निम्नतम अवधि पर होती है। तब परमेश्वर अंधकार को तिरोहित करने के लिए अपने पुत्र को धरा पर भेजता है, इस संदेश के साथ अब बहुत हो चुका, जाओ और चहुंओर प्रकाश का आलोक फैला दो। वह आता है प्रकाश फैलाने और अंधकार से स्वयं को ओतप्रोत कर चुके हम अधम पापी जीव उसी को सलीब पर टांग देते हैं। किन्तु वह दयालु फिर भी हम अधमों के कल्याण की कामना करता है और पुनः जी उठता है।
उसको मानने वाले और न मानने वाले दानों ही उसकी पूजा तो शुरु कर देते हैं लेकिन उसके वचनों का पालन करने में बड़े कृपण बने रहते हैं, मोमबत्ती तो जलाते हैं, उसके प्रकाश को देखकर बड़े हर्ष का अनुभव भी करते हैं लेकिन मोमबत्ती के उस मर्म को नहीं समझते कि किस प्रकार हमें प्रकाशित करने के लिए उसने स्वयं को समाप्त कर लिया है। हमें वही मोमबत्ती बनना होगा। स्वयं को जलाकर किसी को राह दिखाने पर ही हम मैरी क्रिसमस कहने वाले सच्चे जीवात्मा हो पाऐंगे।
इसी मास की आखिरी तारीख को वर्ष २०१२ का अंत हा जाएगा। इस अंतिम बेला में हमें स्वयं को आइना दिखाना होगा। हम अधम हैं, पापी हैं, नीचे की ओर गिरना हमारा गुण है। जितने गिरने थे गिर लिए आओ प्रभु यीशु के जन्म का समय है बड़ा दिन है अब गिरना बंद और उठना प्रारम्भ करें तो देर नहीं है।
शेष नियमित फीचर्स एवं महाराजजी द्वारा विरचित श्रीमद् भागवत को समाहित किए यह अंक प्रतिदिन आपके जीवन में बड़ा दिन लेकर आए इसी कामना के साथ..............संजय भइया

Wednesday, November 14, 2012

एक दीप जलाना ही होगा


दीपावली के पावन पर्व पर समस्त पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं। दीपावली का पर्व, पर्वों का समूह है तथा भिन्न भिन्न आधारों पर भिन्न भिन्न सम्प्रदायों द्वारा एक ही स्वरूप से मनाया जाने वाला त्यौहार है। दुनिया भर के लोग इस स्याह रात के तिमिर को दीप जलाकर तिरोहित करते हैं।
दुनिया के सभी धर्मों में अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की बात कही गयी है। अंधकार का स्वामी शैतान माना जाता है और प्रकाश का गुरु। अंधकार झूठ का प्रतीक है और प्रकाश सत्य का। सार्वभौम जगतगुरु सूर्य अपने दैदीप्तमान प्रकाश के कारण ही सर्वत्र पूज्य है।
सूक्त वाक्य ÷तमसोमा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्ममा अमृतगमय' कहता है कि हमारी यात्रा अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर होनी चाहिए। जब जन्म है तो मृत्यु निश्चित है। अतः अमरत्व तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम जन्म को प्राप्त न हों। और बार बार जन्म लेने से बचना तब तक सम्भव नहीं जब तक कि हम स्वयं पूर्ण प्रकाशित न हों। पूर्ण प्रकाशित होकर ही स्वयं को उस दिव्य प्रकाश में समा पाना सम्भव है।
दीपावली के पर्व पर हम केवल दरवाजों पर दीप ही नहीं जलाते वरन अपने घरों की सफाई भी करते हैं। हमारे घरों में जमे हुए कबाड़ को निकालकर इस दिन हम बाहर फैंक देते हैं। दीपावली की रात्रि में पूजन के उपरांत प्रातः पौ फटने से पहले हमारे घरों की माताएं सूप को पीटकर आवाज देती हैं कि लक्ष्मी का आगमन हो रहा है अतः दरिद्र तू चला जा।
कचरा निकलने पर ही मां लक्ष्मी घर में प्रवास करती हैं। दीप जलने से   अंधकार भाग जाता है। यह व्यवस्था जिस प्रकार घर में है ठीक उसी प्रकार हमारे अंदर भी है। अंदर अगर पूवाग्रहों का कचरा भरा है तो मां लक्ष्मी कहां निवास करेंगी। पहले हमें अपने अंदर से कचरा निकालना होगा। यह कचरा है हमारे संस्कारों का। कई लोग कहते हैं कि ये संस्कार तो हमें विरासत में मिले हैं या कि हमने बड़े जतन से एकत्रित किए हैं, इन्हें कैसे निकाल दें। क्या घर में से जो कबाड़ निकाला है, वह भी जतन से ही एकत्रित किया था। हमें आगे बढ़ना है, प्रकाश लाना है तो एक दीप जलाना ही होगा.................................संजय भइया

दीप जलाएं

आओ दीप से दीप जलाएं अन्धकार का शमन कर नयी रोशनी लाएं 

Tuesday, July 24, 2012

विमोचन

महाराज जी ने कुमारी लाव्यता द्वारा बनाए गए कलेंडर का विमोचन किया इस अवसर पर रूद्र सन्देश पत्रिका के सभी साथी उपस्थित थे . 

Tuesday, October 25, 2011

Happy Dipawali


Dipawali