आधयात्मिक मूल्यों के लिए समर्पित सामाजिक सरोकारों की साहित्यिक पत्रिका.

Thursday, February 19, 2009

वैश्वीकरण के कारण भारतीय समाज के रहन सहन पर व्यापक प्रभाव पड़ा है।

वैश्वीकरण के कारण भारतीय समाज के रहन सहन पर व्यापक प्रभाव पड़ा है। बंगलौर, गुड़गांव, नौइडा आदि में बने कांक्रीट के जंगल, गगन चुम्बी इमारतें, तेज गति से भागती जिंदगी ने एक नई कार्य संस्कृति को जन्म दिया है। सामाजिक सम्बन्धों का ताना बाना काफी हद तक मशीनी हो गया है। कॉल सेन्टरों में कार्य करती महिलाओं तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के कर्मियों के उच्चीकृत हो रहे वेतनमानों से यह पुष्ट होता है कि वैश्वीकरण के कारण कर्मचारियों की प्रस्थिति में सुधार हुआ है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के विज्ञापनों आदि ने भी मध्य एवं उच्च वर्गीय समाज के रहन सहन के स्तर को उन्नत करने में मदद की है।

अपनी बात को पूर्ण करते हुए मैं यहां यह कहना आवश्यक समझता हूं कि वैश्वीकरण के कारण समाज पर पड़ने वाले प्रभावों पर व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता है। मशीनीकृत संस्कृति की ओर बढ़ रहे समाज का अध्ययन इसके अनुकूलन में मददगार साबित हो सकेगा। इसमें शक नहीं कि उदारीकरण के परिणाम स्वरूप हुए वैश्वीकरण, के कारण भारतीय समाज में खुलापन आया है। दुनिया और देश के लोगों में दूरी घटी है। सामाजिक समरसता में वृद्धि हुई है। नागरिकों का जीवन स्तर उच्चीकृत हुआ है। लेकिन यह भी सच है कि वैश्वीकरण के ही कारण परम्परावादियों का आक्रोश भी बढ़ा है। पर्यावरण पर भी वैश्वीकरण की छाया पड़ी है। प्राकृतिक सौन्दर्य को आघात लगा है तथा कृतिमता में वृद्धि हुई है, जिस पर व्यापक शोध आवश्यक है।

Monday, February 16, 2009

धारावाहिकों ने एक नए समूह को जन्म दिया है।

भारतीय समाज में अहिंसा का बड़ा महत्व है। इस अहिंसा के सिद्धांत के अंतर्गत सभी जीवों के प्रति समस्त प्रकार की हिंसा निषेध है। पिछले दशक में भारतीय समाज में हिंसक घटनाओं में वृद्धि हुई है। इसका आशय यह हुआ कि वैश्वीकरण के कारण भारत में हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। सांख्यिकीय दृष्टि से तो यही सही है लेकिन इसके साथ दूसरा पहलू यह भी है कि इससे हिंसा के स्वरूप में परिवर्तन आया है। भारतीय समाज की संरचना में विभिन्न समूहों की बड़ी भूमिका रही है। ग्रामीण एवं नगरीय दोनों ही प्रकार के समाज शास्त्रीय अध्ययन इन समूहों के अध्ययन के बिना पूर्ण नहीं हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुषों के मध्य हुक्का समूह तथा महिलाओं के पनघट एवं शौच समूह समाज को प्रभावित करते हैं। नगरीय क्षेत्रों में प्रातः भ्रमण समूह तथा महिलाओं का किटी पार्टी समूह समाज को प्रभावित करता रहा है। उपरोक्त इंगित समूहों में चर्चा का प्रमुख बिन्दु दूसरे के जीवन में तांक झांक तथा उन पर चर्चा परिचर्चा रहा है। वैश्वीकरण के दौर में इन समूहों की उपयोगिता में कमी आर्ई है। दूरसंचार तथा टी। वी. के व्यापक प्रचलन तथा इन पर आने वाले धारावाहिकों ने एक नए समूह को जन्म दिया है। दर्शकों का इन धारावाहिकों के पात्रों से बनने वाला अमूर्त सम्बन्ध एक नए समूह की संरचना करने में सफल हो गया है। वैश्वीकरण का ही प्रभाव है कि अब घरों में महिलाएं पड़ौसियों आदि के बारे में चर्चा के स्थान पर धारावाहिकों के पात्रों तथा घटनाक्रमों पर अधिक चर्चा करती हैं।

Saturday, February 14, 2009

कालांतर में संघर्ष के उपरांत सभी ने भारतीय समाज की परम्पराओं को अंगीकार किया।

भारतीय इतिहास पर दृष्टिपात करें तो हम पाते हैं कि यहां समय समय पर विदेशी आक्रांता जातियां आती रही हैं। उदाहरण के रूप में यवन, शक, हूण आदि प्रारम्भिक दौर में आए। ये अपना प्रभाव भारतीय संस्कृति पर नहीं छोड़ पाए वरन इन सभी ने भारतीय संस्कृति को अंगीकार किया। तात्कालिक रूप से निश्चित ही बाहर से आने वाला जब प्रभुत्व जमाता है तो प्रभु वर्ग से समाज प्रभावित होता है, लेकिन कालांतर में संघर्ष के उपरांत सभी ने भारतीय समाज की परम्पराओं को अंगीकार किया। सबसे बाद में आने वाले इस्लाम और अंग्रेजों का ही उदाहरण लें तो हम पाते हैं कि भारत में इन समाजों के अंदर भी जाति प्रथा लागू हो गई जो भारतीय समाज का अंग है और आज भी विद्यमान है। भारतीय संस्कृति इतनी प्राचीन और विशाल है कि इससे संगम करने वाली संस्कृति इसी को अंगीकार करती है। वर्तमान में वैश्वीकरण के कारण भारतीय संस्कृति की इस विशेषता को आघात लगा है। भारत के वैश्विक ग्राम में बदलने के कारण तथा इंटरनैट आदि के तेजी से फैलने के कारण भारतीय समाज एक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। इस पर व्यापक अनुसंधान की आवश्यकता है। बहुत से समाज वैज्ञानिक मानते हैं कि जिस प्रकार अन्य आक्रांताओं ने भारतीय संस्कृति को अंगीकार किया उसी परम्परा के अंतर्गत वैश्वीकरण की मशीनी संस्कृति भी भारतीय संस्कृति को आत्मसात कर लेगी। परन्तु कुछ समाज वैज्ञानिक मानते हैं कि इस बार ऐसा नहीं होगा। कुछ छोड़ने तथा कुछ ग्रहण करने की स्थिति के बाद ही स्थायित्व आएगा।

Friday, February 13, 2009

वैश्वीकरण ने भारतीय मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है।

वैश्वीकरण ने भारतीय मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया है। वैश्वीकरण के भारतीय समाज पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करने के लिए पहले भारतीय संस्कृति के मूल स्द्धिांतों को समझना आवश्यक है। भारतीय संस्कृति स्थायित्व लिए हुए गतिशील संस्कृति है। इसकी गतिशीलता तथा स्थायित्व दोनों ही पक्षों पर वैश्वीकरण का प्रभाव दिखाई देने लगा है। ÷पब' संस्कृति का पनपना तथा एक परम्परावादी संगठन के कार्यकर्ताओं द्वारा मंगलौर के एक पब में घुसकर वहां उपस्थित लड़के एवं लड़कियों की बर्बर पिटाई करना, इसके दोनों ही पक्षों को दर्शाती है। महाराष्ट्र सरकार द्वारा ÷लिव इन रिलेशनशिप' को कानूनी दर्जा दिए जाने को बिल पेश करना भारतीय समाज पर वैश्वीकरण के प्रभाव का ही परिणाम है। भारतीय समाज में धर्म एवं आध्यात्मिकता का प्रमुख स्थान रहा है। कानून के द्वारा व्यक्ति को बाहरी तौर पर गैर कानूनी कार्य करने से रोका जा सकता है। धर्म और आध्यात्मिकता की शक्ति ही उसे अंदर से गलत एवं समाज के प्रतिकूल कार्य करने से रोकती है। वैश्वीकरण के कारण सूचना तकनीक में आमूल चूल परिवर्तन आया है। इसके परिणाम स्वरूप एक ओर जहां कट्टरपंथियों को इंटरनैट, मोबाइल आदि संचार माध्यमों से अपनी बात को तेजी से फैलाने का मौका सुलभ हुआ है तो दूसरी ओर समन्वयवादी धार्मिक भावनाएं एवं धर्मनिरपेक्षता को भी बल मिला है। भारतीय योग एवं आध्यात्मिक प्रवचनों का बढ़ता बाजार वैश्वीकरण के कारण सम्भव हुआ है। विभिन्न धर्मों के बारे में अधिकाधिक लोगों को अधिकतम जानकारी मिलने के कारण समाज प्रभावित हो रहा है। रुद्र संदेश जैसी पत्रिकाओं के इंटरनैट संस्करणों ने भारतीय सनातन विचारों को पूरी दुनिया में तेजी से फैलाया है जिससे समाज में अन्य धर्मों के बारे में जानकारी मिल रही है। इंटरनैट पर भाषा परिवर्तक सोफटवेयर्स की उपलब्धता ने एक दूसरे धर्म की अच्छी बातों को समझने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हालांकि तंत्र मंत्र जैसी दुकानों को चलाने वालों की संख्या में भी वैश्वीकरण से उपलब्ध संसाधनों के कारण वृद्धि हुई है। लेकिन इस वृद्धि से भी हानि के साथ साथ लाभ भी हुआ है। जिस पर समाजशास्त्रीय शोध की आवश्यकता है।

Thursday, February 12, 2009

पश्चिमीकरण का बीज ही आज वैश्वीकरण के वृक्ष के रूप में खड़ा हो गया

एक समाज वैज्ञानिक के रूप में मैंने इस प्रस्तुतीकरण में वैश्वीकरण के भारतीय समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की विवेचना के लिए उपकल्पनाएं इस प्रकार निर्मित की हैं- भारतीय संस्कृति वैश्वीकरण के प्रभाव में आ गई है। सिससे समाज में गैर बराबरी बढ़ रही है, व्यक्तियों का जीवन स्तर बढ़ा है तथा जातिवादी और साम्प्रदायिक मानसिकता पर मिश्रित प्रभाव पड़ा है तथा विविध संस्कृति पर मशीनवादी संस्कृति हावी हो रही है।

भारत सरकार द्वारा २४ जुलाई १९९१ को सार्वजनिक उद्योगों के निजीकरण तथा प्रारम्भिक रूप में मूलभूत सेवाओं को भी घरेलू और विदेशी निजी पूंजी के लिए खोल देने के साथ ही वैश्वीकरण ने भारत के दरवाजे पर पहला कदम रख दिया था। इसके दस वर्ष बाद २००१ में सरकार की उदार आयात निर्यात नीति भी लागू हो गई और इस प्रकार भारत पूरी तरह अंतर्राष्ट्रीय बाजार बन गया। प्रखर अमेरिकी चिन्तक नोम चोम्स्की इस उदारवाद को जनता की कीमत पर मुनाफा के रूप में परिभाषित करते हैं। उनकी यह परिभाषा कितनी प्रासंगिक है, यह आज के समाज वैज्ञानिकों के लिए परीक्षण की वस्तु है। मानव एक गतिशील प्राणी है। आश्रम चतुष्टय के अंतर्गत जब शूद्रों को ब्राह्‌मणों के समकक्ष बनने का चस्का लगा तो देश में संस्कृतिकरण हुआ। जब ब्राह्‌मणों को शूद्र अपने बराबर आते प्रतीत हुए तो उन्होंने पश्चिम संस्कृति को अपनाकर पश्चिमीकरण करना प्रारम्भ कर दिया और समाज में संस्कृतिकरण के साथ साथ पश्चिमीकरण की तरफ दौड़ शुरू हुई। देश आजाद होने के साथ जब उंच नीच का भेद काफी कम हो गया तो संस्कृतिकरण की गति मंद हुई, लेकिन पश्चिमीकरण अपनी गति से चलता रहा। यह पश्चिमीकरण का बीज ही आज वैश्वीकरण के वृक्ष के रूप में खड़ा हो गया है। पश्चिमीकरण के लिए उत्तरदायी जहां ब्रिटिश राजशाही का वैभव था तो वैश्वीकरण के पीछे बाजार का वैभव। भारतीय संदर्भ में वैश्वीकरण, ब्रिटिश राजशाही और पश्चिमी साम्राज्यवाद में कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं है।

Wednesday, February 11, 2009

वैश्वीकरण का भारतीय समाज पर प्रभाव

किसी भी नजरिए से देखें वैश्वीकरण ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया है। इसके प्रभाव ने न केवल विश्व भर के विकसित, विकासशील एवं अविकसित देशों की आर्थिक स्थितियों को प्रभावित किया है वरन समाज को भी प्रभावित किया है। सूचना तकनीक के क्रांतिकारी परिवर्तनों तथा कामगारों की गतिशीलता एवं देशीय सीमाओं की वर्जनाओं के शिथिल होने से सामाजिक संरचनाएं प्रभावित हुई हैं। वैश्वीकरण के परिणामस्वरूप पिछले दशक में भारत में निम्न परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं-

१ सूचना तकनीक के क्षेत्र में क्रांति आई है।

२ विदेशी मुद्रा भण्डार में वृद्धि हुई है।

३ सीमाओं से बाहर पूंजी निवेश के परिणामस्वरूप वित्तीय संसाधनों का अंतर्राष्ट्रीयकरण हुआ है।

४ बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का प्रभुत्व बढ़ा है।

५ बाजार पर सरकार का अंकुश क्षीण हुआ है।

६ वस्तुओं के उत्पादन के तरीकों में अंतर आया है।

७ कुशल श्रमिकों, तकनीशियनों, प्रबंधकों की गतिशीलता में वृद्धि हुई है।

भारत सनातन परम्पराओं का देश रहा है। लम्बे समय तक मुगल एवं अंग्रजों के साम्राज्य का अंग रहने के बावजूद इसने अपनी सनातन परम्पराओं ने बनाए रखा है। वैश्वीकरण के कारण समाज में एक वर्ग ऐसा भी विकसित हुआ है जो इन परम्पराओं को सामाजिक निर्योग्यताओं के रूप में स्वीकार कर रहा है तो दूसरा वर्ग इन परम्पराओं को बचाए रखने के लिए प्रयासरत है, जिससे समाज के ढांचे में विघटन की छाया पड़ती प्रतीत हो रही है।

Tuesday, February 10, 2009

वैश्वीकरण का भारतीय सामाजिक जीवन पर प्रभाव

वैश्वीकरण शब्द का प्रयोग पिछले सत्रह वर्षों से तेजी से प्रचलन में आया है। यद्यपि इस शब्द के नामकरण को लेकर अनेक विरोधाभास भी हैैं, तथा इसे विभिन्न प्रकार से परिभाषित भी किया जाता रहा है। वैश्वीकरण का ही प्रभाव है कि आज दुनिया पूर्व की अपेक्षा अधिक जुड़ी हुई है। पहले की अपेक्षा आज के दौर में सूचना एवं धन का प्रवाह बढ़ा है। दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली कोई भी खोज शीघ्र ही दूसरे कोने तक पहुंच जाती है। वैश्वीकरण को सामान्यतः इस रूप में भी स्वीकार करते हैं कि इसके अंतर्गत एक दूसरे देश के मध्य बड़ी तादात में धन, श्रम एवं ज्ञान का आदान प्रदान अधिक तेजी के साथ बिना रोकटोक के हो सकता है। कुछ विद्वान वैश्वीकरण को अंतर्राष्ट्रीय परिवार के रूप में भी परिभाषित करते हैं। जिस प्रकार इतिहासकार समय का वर्णन करने के लिए निराशा काल, शीत युद्ध काल, अंतरिक्ष काल, भक्ति काल आदि का प्रयोग करते हैं उसी प्रकार वर्तमान समय का वर्णन करने के लिए वैश्वीकरण शब्द उपयुक्त प्रतीत होता है। वैश्वीकरण आज के राजनैतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिवेश का वर्णन करता है। कुछ विद्वान इसे भौगोलिक व्यापार का पर्यायवाची मानते हैं। वैश्वीकरण के अंतर्गत व्यापार इस प्रकार किया जाता है कि मानो कोई राष्ट्रीय सीमा रेखा न हो। इसके साथ साथ वैश्वीकरण सामाजिक अराजकता फैलाने वाले तत्वों, पत्रकारों, मजदूर संगठनों, शिक्षण संस्थाओं व अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादियों को भी कार्य करने का मौका प्रदान करता है। डा० वी सुन्दरम ने वैश्वीकरण को उपनिवेशवादी नीति का परिणाम बताते हुए अपने शोध में कहा है कि वैश्वीकरण ब्रिटिश की साम्राज्यवादी नीति का ही रूपान्तरण है। उनके अनुसार जब पश्चिम ने अपने उपनिवेश, अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका व अन्य को छोड़ा था तब द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इंग्लैण्ड की राजशाही व पश्चिम साम्राज्यवाद का अंत नहीं हुआ था। धीरे धीरे यह शूक्ष्म रूप और अधिक हानिकारिक रूप में परिवर्तित होता रहा जो वर्तमान में वैश्वीकरण के रूप में दिखाई दे रहा है।